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एक साल... पहलगाम: नम आंखों में गर्व की चमक, आदिल की पत्नी बोलीं- मिसाल कायम कर गया मेरा पति

फिदा हुसैन, पहलगाम Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 22 Apr 2026 06:47 AM IST
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सार

पहलगाम ने दर्द भी देखा और हौसला भी। आतंकी हमले के बाद सन्नाटा जरूर छाया, पर डर स्थायी नहीं रहा। एक साल में तस्वीर बदली है। भरोसा लौट रहा है...पर्यटक फिर आ रहे हैं। स्थानीय लोगों के चेहरे पर मुस्कान है। घोड़े वाले, गाइड, दुकानदार सक्रिय हैं। पहलगाम झुका नहीं है का संदेश और मजबूत होकर उभरा है। जो कभी खौफ की जगह थी, वही अब उम्मीद का प्रतीक बन रही है। पेश है एक रिपोर्ट...

One year on... Pahalgam: A glint of pride in moist eyes, Adil's wife says-my husband has set an example
पहलगाम हमले का एक साल। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

सैयद आदिल हुसैन शाह... बायसरन घाटी की ठंडी वादियों में यह नाम आज भी गर्मजोशी, साहस और इंसानियत की मिसाल बनकर गूंजता है। एक साल का अरसा बीत चुका है, पर पहलगाम आने वाला शायद ही कोई पर्यटक हो, जो शहीद स्मारक पर सिर झुकाते वक्त आदिल को याद किए बिना आगे बढ़ जाए।

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आदिल सिर्फ नाम नहीं, बल्कि भावना बन चुके हैं...ऐसा जज्बा, जो कश्मीर की पहचान में शामिल हो गया है। जब-जब पहलगाम का जिक्र होगा, बहादुरी के किस्सों में आदिल जी उठेंगे। लोगों को गर्व का एहसास कराएंगे। पहलगाम हमले के एक साल में क्या बदलाव आया, परिवार कैसे है...यह जानने हम उनके घर पहुंचे। चर्चा छिड़ते ही माहौल में दर्द और गर्व एकसाथ घुले नजर आए।
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पत्नी गुलनाज अख्तर की आंखें नम हो चलीं, पर, आवाज में अलग मजबूती थी...गर्व के भावों की। परिवार को मिल रहे सम्मान की। गुलनाज कहती हैं, आदिल की कमी जिंदगी भर सालती रहेगी। पर, सुकून है कि वे हमें आबाद कर गए...गर्व करने का मौका दे गए। उसकी शहादत ही अब जीने का सहारा है।

आदिल इंसानियत का सबसे ऊंचा रूप
गुलनाज उस पल को याद करते हुए भावुक हो उठती हैं, जब आदिल ने अपनी जान की परवाह किए बिना पर्यटकों को बचाने की कोशिश की। कहती हैं, यह सिर्फ बहादुरी ही नहीं थी, बल्कि इंसानियत का सबसे ऊंचा रूप था। आज भी लोग उनके लिए दुआ करते हैं। उनके साहस को सलाम करते हैं।

आदिल का नया मकान...ये दीवारें भर नहीं...शहादत की निशानी है
अनंतनाग के हपतनारड गांव में आदिल की याद को एक और सम्मान मिला है। उनके नाम पर बने नए मकान का विधिवत उद्घाटन किया गया। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने ऑनलाइन माध्यम से कार्यक्रम की अध्यक्षता की। स्थानीय लोगों ने कहा कि कि यह मकान सिर्फ चार दीवारें भर नहीं है, बल्कि शहादत की एक जीवित निशानी है।

मेहमान जो हमारा होता है, वह जान से प्यारा होता है
पहलगाम में इस तख्ती पर लिखीं यह पंक्तियां सिर्फ लाइनें भर नहीं हैं। यह पर्यटकों के लिए सुरक्षा, अपनेपन और मेहमान नवाजी का संदेश दे रही हैं।

भारत भूलता नहीं...पहलगाम बरसी पर सेना ने दहशतगर्दों को चेताया
पहलगाम हमले की त्रासद घटना की पहली बरसी से एक दिन पहले मंगलवार को सेना ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र कर दहशतगर्दों को एक बार फिर चेताया कि भारत ऐसा दुस्साहस करने वालों को कड़ा जवाब देने में सक्षम है। सेना ने सोशल मीडिया पोस्ट में अंग्रेजी शब्द क्रॉस्ड का ओ अक्षर सिंदूर की एक कटोरी की तरह चित्रित किया और नीचे सुर्ख लाल रंग में लिखा इंडिया डज नॉट फॉरगेट (भारत भूलता नहीं है)। पोस्ट में लिखा गया, जब मानवता की हदें पार की जाती हैं, तो जवाब निर्णायक होता है। न्याय किया जाता है। भारत एकजुट है। पोस्ट में एक पोस्टर भी साझा किया, जिसमें भारत के मानचित्र की छायांकित तस्वीर के साथ कैप्शन है, कुछ हदें कभी पार नहीं की जानी चाहिए। 

सोशल मीडिया ने दिखाई खुशनुमा पलों की तस्वीर...और जार-जार हो गया दिल
असावरी जगदाले के स्मार्टफोन पर दो दिन पहले सोशल मीडिया पर साझा कुछ पुरानी तस्वीरों से जुड़ा एक नोटिफिकेशन आया। ये तस्वीरें एक साल पहले परिवार के साथ पहलगाम की दिलकश वादियों में बिताए पलों की याद दिलाती थीं। आमतौर पर ऐसी पोस्ट देखकर लोग खुश हो जाते हैं लेकिन इसने असावरी को बायसरन घाटी का खौफनाक मंजर फिर से याद दिला दिया, जिसमें उनकी दुनिया उजड़ गई थी। आतंकी हमले में जान गंवाने वालों में असावरी के पिता जगदीश जगदाले और उनके सबसे करीबी दोस्त कौस्तुभ गणबोटे भी शामिल थे। असावरी की मां प्रगति जगदाले उस दिन को जीवन का काला दिन कहती हैं। प्रगति ने कहा कि उनके लिए उस सदमे को भूल पाना संभव नहीं है। असावरी के मुताबिक, पहलगाम हमले के एक साल बाद भी वह और उनकी मां कांप उठती हैं।

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