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कश्मीरी पंडितों को सब कुछ अपने दम पर करना होगा : आरके भट्ट

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Srinagar, Global Kashmiri Pandit Conclave, RK BHatt, SKICC, Programme
एसकेआईसीसी में अपने विचार रखते आरके भट्ट। अमर उजाला
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- एसकेआईसीसी में आयोजित ग्लोबल कश्मीरी पंडित कॉन्क्लेव में किया आगे आने का आह्वान

अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। ग्लोबल कश्मीरी पंडित कॉन्क्लेव में कश्मीरी पंडित नेता आरके भट्ट ने कश्मीरी पंडित समुदाय की दुर्दशा, उनके पुनर्वास और राजनीतिक उपेक्षा के बारे में बताया। उन्होंने समुदाय से अपील की है कि वे पूरी तरह से सिस्टम (प्रशासन) पर निर्भर न रहें बल्कि अपने दम पर आगे बढ़ें।
कार्यक्रम में भाजपा नेता अशोक कौल, कश्मीरी ओवरसीज एसोसिएशन के अध्यक्ष उपहार कोटरू, इंटरनेशनल कोऑर्डिनेटर और ग्लोबल कश्मीरी पंडित डायस्पोरा के उत्पल कौल, कश्मीरी पंडित एसोसिएशन मुंबई के प्रेसिडेंट अश्वनी भट, ऑल माइनॉरिटी एम्प्लॉइज एसोसिएशन कश्मीर के प्रेसिडेंट संजय कौल सहित पुलिस व नागरिक प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी और बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए।
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आरके भट्ट ने कहा कि राजनीतिक दल और सिस्टम कश्मीरी पंडितों को शायद अपने मानदंडों में फिट नहीं मानते हैं जिसके कई कारण हो सकते हैं। हमें किसी राजनीतिक दल के निमंत्रण की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए कि वे कब हमसे कश्मीर लौटने के लिए कहेंगे। हमें किसी के आमंत्रण की जरूरत नहीं है। हमने जो कुछ भी किया है और जो आगे करेंगे, वह हमें अपने दम पर करना होगा।
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आज भी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लगभग 70,000 कश्मीरी पंडित कश्मीर में ही रह रहे हैं। वे वहां रहकर देश, अपने समाज और बहुसंख्यक समुदाय के विकास में किसी न किसी रूप में अपना योगदान दे रहे हैं, जिसे समझने की जरूरत है।



कश्मीरी पंडित लौटना नहीं चाहते - यह बात सरासर गलत
आरके भट्ट ने इस बात का कड़ा खंडन किया कि कश्मीरी पंडित वापस कश्मीर नहीं जाना चाहते। उन्होंने इसे एक फैलाया गया ''''मिथक'''' करार दिया। उन्होंने कहा कि जो भाई-बहन विदेश में या देश के अन्य हिस्सों में एक सुरक्षित और बेहतर जीवन जी रहे हैं, उनकी आत्मा आज भी कश्मीर के लिए तरस रही है। उन्होंने याद दिलाया कि 2008 में जब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री के साथ बैठक की थी, तब भी 15,000 लोग लिखित रूप में कश्मीर लौटने को तैयार थे, और आज यह संख्या 50,000 से अधिक है।



पूर्व उपराज्यपाल जगमोहन और बालासाहेब ठाकरे को नमन

आरके भट्ट ने कश्मीरी पंडितों के संकट काल में मदद करने के लिए पूर्व राज्यपाल जगमोहन और शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे को याद किया। उन्होंने कहा, एक ने हमें (कश्मीर में) बचाया और दूसरे ने हमें (महाराष्ट्र में) जीने का सहारा दिया। हम उनका यह अहसान कभी नहीं भूल सकते।


पुनर्वास के लिए सरकार से बुनियादी मदद की मांग
भट्ट ने स्पष्ट किया कि कश्मीरी पंडित सरकार से बड़े-बड़े महलों या मकानों की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे सिर्फ अपना वह हक मांग रहे हैं जो उनसे छीना गया था। उन्होंने कहा हमारा मकान जला दिया गया, संपत्ति लूटी गई, बाग-बगीचे उजाड़ दिए गए और जमीनों पर अतिक्रमण हो गया। ऐसे में हम कहां रहें। अगर यह कोई प्राकृतिक आपदा होती, तो हम सरकार से कुछ नहीं मांगते, लेकिन एक सोची-समझी साजिश के तहत हमें बाहर निकाला गया, इसलिए हमें वापस बसाना सरकारों की जिम्मेदारी है। उन्होंने एक कमरे के आवासों को लेकर भी नाराजगी जताई।



कम्युनिटी में हो चुनाव, थोपे हुए नेता मंजूर नहीं

विधानसभा में कश्मीरी पंडितों के लिए दो सीटों के प्रावधान का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि ढाई साल बीत जाने के बाद भी आज तक असेंबली में कश्मीरी पंडितों का कोई प्रतिनिधि नहीं है। उन्होंने मांग की कि सरकार यह तय न करे कि ये दो लोग कौन होंगे बल्कि कश्मीरी समाज के भीतर एक निष्पक्ष चुनाव होना चाहिए। कम्युनिटी जिसे चुनकर भेजेगी, वही असेंबली में उनका प्रतिनिधित्व करे।


एपेक्स कमेटी में गृह मंत्रालय का प्रतिनिधि हो शामिल

प्रशासन की ओर से एपेक्स कमेटी के गठन के आश्वासन का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि इस कमेटी में केंद्रीय गृह मंत्रालय का प्रतिनिधि होना अनिवार्य है। उन्होंने रोष व्यक्त किया कि जब भी कश्मीरी पंडितों के भत्ते, फंड या विकास की बात आती है तो स्थानीय प्रशासन कहता है कि यह पैसा दिल्ली से आएगा। उन्होंने सवाल उठाया, जब सब कुछ दिल्ली से ही होना है तो फिर हमें कश्मीर में वोट डालने के लिए क्यों कहा जाता है। हमारा गृह मंत्रालय के साथ सीधा संपर्क होना बहुत जरूरी है। आरके भट्ट ने अपने संबोधन का अंत इस संकल्प के साथ किया कि कश्मीरी पंडित एक स्वाभिमानी समुदाय है जो हर जुल्म और उपेक्षा के बाद भी अपने संघर्ष के दम पर आगे बढ़ता रहेगा।
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