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Srinagar News: हाईकोर्ट ने बांदीपोरा के 25 वर्षीय युवक की पीएसए हिरासत की रद्द
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संवाद न्यूज़ एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने बांदीपोरा के एक युवक के खिलाफ जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत जारी निवारक हिरासत आदेश मंगलवार को को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने इस कार्रवाई को कानूनी रूप से अस्थिर और अस्पष्ट आधारों पर आधारित बताया। न्यायमूर्ति राहुल भारती की पीठ ने 25 वर्षीय एहतेशाम-उल-हक डार की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार कर लिया जिसमें उन्होंने बांदीपोरा के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से अपने नजरबंदी के आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने पाया कि 3 मई 2025 का हिरासत आदेश मुख्य रूप से बांदीपोरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) की ओर से जमा किए गए पुलिस डॉसियर पर आधारित था।
हालांकि अदालत ने पाया कि इस डॉसियर में ठोस सामग्री का अभाव था। यह काफी हद तक अस्पष्ट और अनुमानित मान्यताओं पर आधारित था। डार को इस आरोप के बाद हिरासत में लेकर जिला जेल किश्तवाड़ में रखा गया था। कहा गया था कि उसकी गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए नुकसानदेह थीं। अदालत ने पाया कि उसके खिलाफ एकमात्र विशिष्ट आपराधिक रिकॉर्ड 2020 में पुलिस थाना अरागम में दर्ज एक एफआईआर थी।
अदालत ने यह भी कहा कि उस मामले में भी अधिकारी मुकदमे की स्थिति स्पष्ट करने में विफल रहे। अदालत ने आगे यह भी कहा कि डॉसियर में 2021 में हुई पिछली हिरासत का जिक्र तो किया गया था लेकिन उस पुराने आदेश का कोई विवरण नहीं दिया गया था जिससे अधिकारियों द्वारा मामले पर ठीक से विचार किए जाने को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
अदालत ने कहा कि दस्तावेज के प्रिंट और टेक्स्ट को हूबहू उठाते हुए प्रतिवादी संख्या 2 जिला मजिस्ट्रेट बांदीपोरा ने कथित तौर पर हिरासत के तथाकथित आधारों को बांदीपोरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के मुखपत्र के रूप में अधिक तैयार किया और हिरासत का आदेश पारित कर दिया। भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकार इतना नाजुक और कमजोर नहीं है कि जम्मू और कश्मीर लोक सुरक्षा अधिनियम 1978 के तहत अधिकारियों की ओर से की गई किसी कथित सामान्य कार्रवाई के आधार पर याचिकाकर्ता के इस मौलिक अधिकार को समाप्त किया जा सके।
न्यायालय ने पूरी प्रक्रिया को अवैध घोषित कर दिया। संबंधित जेल के अधीक्षक को निर्देश दिया गया है कि वे डार को तत्काल रिहा कर दें बशर्ते कि किसी अन्य मामले में उनकी आवश्यकता न हो।
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने बांदीपोरा के एक युवक के खिलाफ जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत जारी निवारक हिरासत आदेश मंगलवार को को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने इस कार्रवाई को कानूनी रूप से अस्थिर और अस्पष्ट आधारों पर आधारित बताया। न्यायमूर्ति राहुल भारती की पीठ ने 25 वर्षीय एहतेशाम-उल-हक डार की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार कर लिया जिसमें उन्होंने बांदीपोरा के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से अपने नजरबंदी के आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने पाया कि 3 मई 2025 का हिरासत आदेश मुख्य रूप से बांदीपोरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) की ओर से जमा किए गए पुलिस डॉसियर पर आधारित था।
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हालांकि अदालत ने पाया कि इस डॉसियर में ठोस सामग्री का अभाव था। यह काफी हद तक अस्पष्ट और अनुमानित मान्यताओं पर आधारित था। डार को इस आरोप के बाद हिरासत में लेकर जिला जेल किश्तवाड़ में रखा गया था। कहा गया था कि उसकी गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए नुकसानदेह थीं। अदालत ने पाया कि उसके खिलाफ एकमात्र विशिष्ट आपराधिक रिकॉर्ड 2020 में पुलिस थाना अरागम में दर्ज एक एफआईआर थी।
अदालत ने यह भी कहा कि उस मामले में भी अधिकारी मुकदमे की स्थिति स्पष्ट करने में विफल रहे। अदालत ने आगे यह भी कहा कि डॉसियर में 2021 में हुई पिछली हिरासत का जिक्र तो किया गया था लेकिन उस पुराने आदेश का कोई विवरण नहीं दिया गया था जिससे अधिकारियों द्वारा मामले पर ठीक से विचार किए जाने को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
अदालत ने कहा कि दस्तावेज के प्रिंट और टेक्स्ट को हूबहू उठाते हुए प्रतिवादी संख्या 2 जिला मजिस्ट्रेट बांदीपोरा ने कथित तौर पर हिरासत के तथाकथित आधारों को बांदीपोरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के मुखपत्र के रूप में अधिक तैयार किया और हिरासत का आदेश पारित कर दिया। भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकार इतना नाजुक और कमजोर नहीं है कि जम्मू और कश्मीर लोक सुरक्षा अधिनियम 1978 के तहत अधिकारियों की ओर से की गई किसी कथित सामान्य कार्रवाई के आधार पर याचिकाकर्ता के इस मौलिक अधिकार को समाप्त किया जा सके।
न्यायालय ने पूरी प्रक्रिया को अवैध घोषित कर दिया। संबंधित जेल के अधीक्षक को निर्देश दिया गया है कि वे डार को तत्काल रिहा कर दें बशर्ते कि किसी अन्य मामले में उनकी आवश्यकता न हो।