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Srinagar News: हाईकोर्ट ने पीएसए की हिरासत को माना कानून का दुरुपयोग, की रद्द
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने बुधवार को पुलवामा के 25 वर्षीय युवक की पीएसए हिरासत को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने इस हिरासत को जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1978 के तहत गैर-कानूनी और कानून का दुरुपयोग माना है।
जस्टिस राहुल भारती की बेंच ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए पुलवामा के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से 30 अप्रैल, 2025 को जारी हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही युवक उमर राशिद डार के खिलाफ सरकार की ओर से बाद में दी गई मंजूरी और पुष्टि के आदेशों को भी रद्द कर दिया गया।
डार ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि इसके आधार अस्पष्ट और मनगढ़ंत थे। यह पुरानी जानकारी पर आधारित थी। विशेष रूप से 2020 में दर्ज एक एफआईआर पर। उन्होंने यह भी बताया कि 2020 में उनके खिलाफ जारी एक पिछले हिरासत आदेश को हाईकोर्ट पहले ही रद्द कर चुका था।
बेंच ने हिरासत से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करने के बाद पाया कि पुलवामा के सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस द्वारा तैयार डोजियर में एक बड़ी चूक थी। कोर्ट ने पाया कि जहां डोजियर में 2020 की एफआईआर का प्रमुखता से जिक्र किया गया था वहीं इसमें जानबूझकर डार की पिछली हिरासत और कोर्ट की ओर से उसे रद्द किए जाने की जानकारी नहीं दी गई थी।
बेंच ने टिप्पणी की कि इस चूक का मतलब जिला मजिस्ट्रेट को अधूरी और आधी-अधूरी जानकारी देना था जिससे निवारक हिरासत लागू करने के लिए आवश्यक व्यक्तिगत संतुष्टि की प्रक्रिया ही दूषित हो गई।
कोर्ट ने फैसला सुनाया कि इस तरह की जानकारी छिपाने से पूरी निर्णय लेने की प्रक्रिया ही दूषित हो गई और हिरासत कानूनी रूप से अस्थिर हो गई।
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने बुधवार को पुलवामा के 25 वर्षीय युवक की पीएसए हिरासत को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने इस हिरासत को जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1978 के तहत गैर-कानूनी और कानून का दुरुपयोग माना है।
जस्टिस राहुल भारती की बेंच ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए पुलवामा के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से 30 अप्रैल, 2025 को जारी हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही युवक उमर राशिद डार के खिलाफ सरकार की ओर से बाद में दी गई मंजूरी और पुष्टि के आदेशों को भी रद्द कर दिया गया।
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डार ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि इसके आधार अस्पष्ट और मनगढ़ंत थे। यह पुरानी जानकारी पर आधारित थी। विशेष रूप से 2020 में दर्ज एक एफआईआर पर। उन्होंने यह भी बताया कि 2020 में उनके खिलाफ जारी एक पिछले हिरासत आदेश को हाईकोर्ट पहले ही रद्द कर चुका था।
बेंच ने हिरासत से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करने के बाद पाया कि पुलवामा के सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस द्वारा तैयार डोजियर में एक बड़ी चूक थी। कोर्ट ने पाया कि जहां डोजियर में 2020 की एफआईआर का प्रमुखता से जिक्र किया गया था वहीं इसमें जानबूझकर डार की पिछली हिरासत और कोर्ट की ओर से उसे रद्द किए जाने की जानकारी नहीं दी गई थी।
बेंच ने टिप्पणी की कि इस चूक का मतलब जिला मजिस्ट्रेट को अधूरी और आधी-अधूरी जानकारी देना था जिससे निवारक हिरासत लागू करने के लिए आवश्यक व्यक्तिगत संतुष्टि की प्रक्रिया ही दूषित हो गई।
कोर्ट ने फैसला सुनाया कि इस तरह की जानकारी छिपाने से पूरी निर्णय लेने की प्रक्रिया ही दूषित हो गई और हिरासत कानूनी रूप से अस्थिर हो गई।