सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   Jammu and Kashmir High Court turns 98 today.

Jammu: आज 98 साल का हो गया जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट, पहले चीफ जस्टिस लाला कंवर सेन का वेतन था 1750 रुपये

प्रवेश कुमारी, जम्मू Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 26 Mar 2026 06:02 AM IST
विज्ञापन
सार

महाराजा ने लाला कंवर सेन को हाईकोर्ट का पहला चीफ जस्टिस नियुक्त किया। वहीं, राय बहादुर लाला बोध राज साहनी और खान साहब आगा सैयद हुसैन को जूनियर जजों के रूप में नियुक्त किया गया।

Jammu and Kashmir High Court turns 98 today.
जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट आज 98 साल का हो गया। वर्ष 1928 में इसकी स्थापना हुई थी। उससे पहले जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ही न्याय प्रशासन के अंतिम प्राधिकारी हुआ करते थे। वर्ष 1889 में ब्रिटिश सरकार ने राज्य के तत्कालीन शासक महाराजा प्रताप सिंह से एक परिषद का गठन करने को कहा। इस परिषद के न्यायिक सदस्य के पास दीवानी और फौजदारी दोनों ही मामलों में अपील संबंधी सारी शक्तियां निहित थीं। जम्मू और कश्मीर दोनों प्रांत के मुख्य न्यायाधीश इस परिषद के विधि सदस्य के पर्यवेक्षण और नियंत्रण में काम करते थे।

Trending Videos


महाराजा प्रताप सिंह के बाद महाराजा के रूप में हरि सिंह ने गद्दी संभाली। वर्ष 1927 में उन्होंने एक नए संविधान को मंजूरी दी। इसके तहत विधि सदस्य के स्थान पर न्यायिक विभाग में एक पृथक मंत्रालय का गठन किया गया। इसके बाद वर्ष 1928 में हाई कोर्ट ऑफ ज्यूडिकेचर यानी हाईकोर्ट की विधिवत स्थापना हुई। यह पहला अवसर था जब हाई कोर्ट में एक चीफ जस्टिस और दो जस्टिस शामिल किए गए। लंबे समय बाद आज से 32 वर्ष पूर्व 1994 में मुबारक मंडी स्थित इसके परिसर को जानीपुर में स्थानांतरित किया गया। इसके जम्मू और श्रीनगर विंग को अब लगातार आधुनिक बनाया जा रहा है। नए चैंबर हाउसों के निर्माण के साथ ही परिसर को भी एक्सटेंशन दिया गया है।
विज्ञापन
विज्ञापन

लाला कंवर सेन बने पहले चीफ जस्टिस

महाराजा ने लाला कंवर सेन को हाईकोर्ट का पहला चीफ जस्टिस नियुक्त किया। वहीं, राय बहादुर लाला बोध राज साहनी और खान साहब आगा सैयद हुसैन को जूनियर जजों के रूप में नियुक्त किया गया। हाई कोर्ट के बैठने के सामान्य स्थान जम्मू और श्रीनगर हुआ करते थे। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा की ओर से वर्ष 1939 में संविधान अधिनियम के माध्यम से हाई कोर्ट को पर्याप्त स्वायत्तता (स्वतंत्रता) प्रदान की गई। हाई कोर्ट को अधीनस्थ अदालतों के पर्यवेक्षण और नियंत्रण संबंधी शक्तियां भी प्रदान की गईं। इसके अलावा तीन सदस्यों वाले एक न्यायिक सलाहकार बोर्ड का भी गठन किया गया। इस बोर्ड का मुख्य कार्य हाई कोर्ट के फैसलों के खिलाफ दायर दीवानी और फौजदारी अपीलों के निपटारे के संबंध में शासक को परामर्श देना था।

सुप्रीम कोर्ट ने किया 17 लंबित अपीलों का निपटारा
बोर्ड के समक्ष लंबित सभी 17 अपीलें सुप्रीम कोर्ट को हस्तांतरित कर दी गईं। उसने श्रीनगर में एक विशेष पीठ का गठन किया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश मेहर चंद महाजन, न्यायमूर्ति एसआर दास और न्यायमूर्ति गुलाम हसन शामिल थे। पहली बार ऐसा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहीं और जाकर अपीलों का निपटारा किया।

पहले चीफ जस्टिस का वेतन था 1750 रुपये
जम्मू-कश्मीर के पहले चीफ जस्टिस लाला कंवर सेन का वेतन 1,750 रुपये लगा। वहीं जस्टिस राय बहादुर बोध राज साहनी और खां साहिब आगा सैय्यद हुसैन का वेतन 1,500 रुपये लगा।

हम सभी को याद करते हैं...
यह अहम दिन है। हम इस दिन उन सभी को याद करते हैं, जिनका योगदान इसकी स्थापना में रहा है।
-निर्मल कोतवाल, अध्यक्ष, हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जम्मू

हर कदम पर लड़ी हक की लड़ाई पर बुझने नहीं दी न्याय ज्योति
एडवोकेट सूरज सिंह जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के एकमात्र दृष्टिबाधित वकील हैं। उन्हें अपनी जगह बनाने के लिए हर कदम पर हक की लड़ाई लड़नी पड़ी। लॉ में प्रवेश से लेकर सरकारी वकील के रूप में नामित होने तक सूरज ने हौसले को नहीं टूटने दिया।

मूल रूप से जिला कठुआ के थल गांव के रहने वाले सूरज सिंह पैदाइश से ही दृष्टिबाधित हैं। घरवालों को हर वक्त उनकी परवरिश को लेकर चिंता सताती। वर्ष 1990 में एक परिचित के जम्मू ब्लाइंड स्कूल का पता बताने पर पिता ने उन्हें यहां पढ़ने के लिए भेज दिया। यहां ब्रेल लिपि से पढ़ाई हो रही थी। इसके बाद 10वीं की कक्षा उन्होंने प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में उत्तीर्ण की।

11वीं-12वीं श्री रणवीर मॉडल स्कूल से पास की। इसके बाद वर्ष 2002 में मौलाना आजाद मेमोरियल यानी एमएएम कॉलेज में प्रवेश लिया। 2005 में बीए की डिग्री हासिल की। इसके बाद वे पॉलिटिकल साइंस या लॉ की पढ़ाई करना चाहते थे। उन्होंने जम्मू विश्वविद्यालय में लॉ में प्रवेश के लिए आवेदन किया। यहां प्रवेश कमेटी के सदस्यों ने उनके दृष्टिबाधित होने का मुद्दा उठाते हुए उनके आवेदन पर सवाल उठाया, लेकिन वे सबके साथ से प्रवेश पाने में कामयाब रहे। इसके बाद उन्हें सरकारी वकील बनने के लिए भी अदालत में धरना-प्रदर्शन का सहारा लेना पड़ा। सूरज चाहते हैं कि विशेष लोगों के लिए बने नियमों का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचे, खास तौर पर हाईकोर्ट में, तभी उनका भला होगा।

हर किसी को समय पर न्याय मिले, यही कोशिश रहनी चाहिए
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का लंबा सफर रहा है। हर किसी को समय पर न्याय मिले यही कोशिश रहनी चाहिए। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में भी बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। इनके पीछे जजों की कमी तो एक वजह है ही, इसके अतिरिक्त गवाहों का मौजूद न रहना, मुकर जाना, वकीलों का मुकदमों को लंबा खींचने जैसी कई वजहें शामिल हैं। निश्चित रूप से जजों की कमी बड़ी वजह है। एआई भी इन दिनों एक बड़ी चुनौती है। इसके जरिये रातों-रात एक काबिल वकील बन जाने की जल्दबाजी मुश्किलों को बढ़ाती है।
-जस्टिस (सेवानिवृत्त) विनोद चटर्जी कौल

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed