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'माइग्रेंट नहीं, नरसंहार पीड़ित': पनुन की मांग, जनगणना 2027 में कश्मीरी पंडितों को मिले Genocide Victim दर्जा

पीटीआई, जम्मू Published by: विकास कुमार Updated Sun, 17 May 2026 07:30 PM IST
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सार

पनुन कश्मीर के नए अध्यक्ष टीटो गंजू ने केंद्र की नीतियों की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि कश्मीर घाटी में अलग मातृभूमि की मांग 'गैर-परक्राम्य' है। गंजू ने तर्क दिया कि 'प्रवासी' के रूप में दर्ज करने से जबरन विस्थापन स्वैच्छिक हो जाता है। इससे उनके सभी दावे कमजोर पड़ जाते हैं। उन्होंने आंतरिक रूप से विस्थापित नरसंहार पीड़ितों के रूप में वर्गीकरण की मांग की। 

Panun Kashmir demands genocide victim status for displaced Kashmiri
जनगणना-2027 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

जम्मू और कश्मीर में जनगणना 2027 की स्व-गणना प्रक्रिया शुरू हो गई है। पनुन कश्मीर संगठन ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए 'नरसंहार पीड़ित' दर्जे की मांग की है। संगठन ने सरकार के वर्गीकरण मानदंडों पर गंभीर चिंता जताई है।

पनुन कश्मीर के नए अध्यक्ष टीटो गंजू ने केंद्र की नीतियों की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि कश्मीर घाटी में अलग मातृभूमि की मांग 'गैर-परक्राम्य' है। गंजू ने तर्क दिया कि 'प्रवासी' के रूप में दर्ज करने से जबरन विस्थापन स्वैच्छिक हो जाता है। इससे उनके सभी दावे कमजोर पड़ जाते हैं। उन्होंने आंतरिक रूप से विस्थापित नरसंहार पीड़ितों के रूप में वर्गीकरण की मांग की। इसमें मूल निवास स्थान से जुड़ाव और विशिष्ट गणना शामिल है। मौजूदा प्रशासनिक प्रथाओं को उन्होंने 'विफलता की पुनरावृत्ति' बताया। जम्मू और कश्मीर के राहत और पुनर्वास विभाग के अनुसार, 1990 में 59,764 कश्मीरी पंडित परिवार घाटी छोड़कर गए थे। इनमें से 23,313 परिवार जम्मू और कश्मीर के बाहर चले गए।

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'पनुन कश्मीर' की मांग
गंजू ने कहा कि कश्मीरी पंडितों के लिए केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे के साथ अलग मातृभूमि 'पनुन कश्मीर' की मांग न्यूनतम ढांचा है। यह संवैधानिक सुरक्षा उपायों के लिए आवश्यक है। उन्होंने 'जातिविध्वंस' (नरसंहार) की ऐतिहासिक अवधारणा का भी उल्लेख किया। गंजू ने बताया कि भारत नरसंहार पर संयुक्त राष्ट्र समझौते का हस्ताक्षरकर्ता है। हालांकि, संसद ने अभी तक घरेलू कानून नहीं बनाया है।

अधिकारों का अभाव
गंजू ने कहा कि परिणाम दिखाते हैं कि पहले जो व्यवस्था थी, उसने प्रवर्तनीय अधिकार सुरक्षित नहीं किए। उन्होंने अनुच्छेद 19, 21 और 14 का हवाला दिया। उनके अनुसार, यदि ये अधिकार कार्यात्मक होते तो विस्थापित समुदाय को सामान्य श्रेणी में नहीं माना जाता। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम जैसे कल्याणकारी कानून भी विस्थापित आबादी के साथ भेदभाव करते हैं। उन्होंने कहा कि मातृभूमि संरचना की आवश्यकता को पहचाने बिना विस्थापन सामान्य होता रहेगा।

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