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Mental Problems: मानसिक स्वास्थ्य के मामले में कई विकसित देश 'कमजोर', डॉक्टर नहीं एआई से सलाह ले रहे हैं मरीज

Sat, 25 Jul 2026 08:29 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Sat, 25 Jul 2026 08:29 PM IST
सार

वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। यूरोप के देशों में रहने वाले लोगों की तुलना में ब्रिटेन के लोग सबसे ज्यादा मानसिक परेशानियों से जूझ रहे हैं। जानिए भारत में कैसे हालात हैं?

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More than a third of UK adults have poor mental health know condition in india
मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बढ़ता खतरा - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर पिछले दशकों में चर्चा काफी तेज हुई है। स्ट्रेस-एंग्जाइटी और डिप्रेशन के मामले अब युवा आबादी को भी अपना शिकार बनाते जा रहे हैं। मेंटल हेल्थ समस्याओं को लेकर आपकी क्या सोच है? क्या आप भी मानते हैं कि दुनिया के सबसे विकसित देशों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा खुश होते होंगे? अगर हां, तो हालिया रिपोर्ट आपकी यह सोच बदल सकती है।

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आधुनिक जीवनशैली, अच्छी कमाई, बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं और तकनीक से लैस देशों में रहने के बावजूद लोग मानसिक रूप से पहले से ज्यादा परेशान हैं। अध्ययन में चौंकाने वाली बात सामने आई है कि पूरे यूरोप में ब्रिटेन  सबसे अधिक मानसिक तनाव झेलने वाला देश है। हर तीन में से करीब एक ब्रिटिश नागरिक अपनी मानसिक सेहत को लेकर परेशान है। यहां बड़ी संख्या में लोग अवसाद, चिंता और लंबे समय तक रहने वाले तनाव जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
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रिपोर्ट के मुताबिक तेजी से बदलती दुनिया, भविष्य को लेकर असुरक्षा, आर्थिक दबाव, बढ़ती महंगाई और अकेलापन लोगों के मन पर गहरा असर डाल रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के इस दौर में ये ट्रेंड भी देखा जा रहा है कि लोग अपनी परेशानी किसी डॉक्टर से साझा करने की बजाय एआई चैटबॉट्स का बहुत ज्यादा सहारा ले रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ये जोखिम भरा हो सकता है और एआई की मदद कई मामलों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को और बढ़ाने वाली हो सकती है।
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तो क्या भारत में भी मेंटल हेल्थ समस्याएं तेजी से बढ़ती जा रही हैं? यहां भी खतरा बना हुआ है?

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स्ट्रेस-एंग्जाइटी की बढ़ती समस्या - फोटो : adobe stock images

विकसित देशों की खराब मेंटल हेल्थ

करीब 18 देशों के मेंटल वेलवीइंग को लेकर किए गए विश्लेषण में पाया है कि ब्रिटेन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देश मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सबसे परेशान देखे जा रहे हैं, वहीं थाईलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे देश बेहतर मानसिक सेहत के साथ सूची में सबसे ऊपर हैं। 
 

  • रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन के हर तीन में से एक से ज्यादा वयस्क मानते हैं कि उनकी मानसिक सेहत अच्छी नहीं है। 
  • वहीं लगभग 30 प्रतिशत लोगों ने बताया कि वे बहुत ज्यादा डिप्रेशन, एंग्जायटी और स्ट्रेस महसूस करते हैं।
  • दूसरी ओर, थाईलैंड के लोगों की मानसिक सेहत सबसे अच्छी बताई गई है। इसके बाद स्विट्जरलैंड दूसरे स्थान पर रहा।
  • अमेरिका इस सूची में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रहा और 18 देशों में छठा सबसे अच्छा देश माना गया।

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मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा - फोटो : Freepik.com

सर्वे में क्या पता चला?

गौरतलब है कि ये विश्लेषण बीमा कंपनी एएक्सए और स्थानीय मार्केट रिसर्च कंपनी ने किया। इसके लिए यूरोप, एशिया, उत्तरी अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के 18 देशों के 19,000 लोगों से बातचीत की गई। सर्वे में शामिल लोगों की उम्र 18 से 75 वर्ष के बीच थी।
 

  • सर्वे के दौरान लोगों से कई सवाल पूछे गए। उनसे यह जानने की कोशिश की गई कि वे अपनी मानसिक सेहत को किस तरह देखते हैं?
  • उनसे यह भी पूछा गया कि क्या वे एंग्जायटी, डिप्रेशन या क्रॉनिक स्ट्रेस जैसी समस्याओं से गुजर चुके हैं?
  • लोगों के जवाबों के आधार पर हर देश को एक स्कोर दिया गया।
  • इसी स्कोर से यह तय किया गया कि किस देश के लोगों की मानसिक सेहत बेहतर है और किस देश के लोग ज्यादा मानसिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं?

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एआई से ले रहे हैं मदद - फोटो : Adobe Stock

क्या है इन बढ़ते मामलों का कारण?
 

इस रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन के लोगों को सबसे ज्यादा भविष्य को लेकर अनिश्चितता परेशान कर रही है। करीब 50 प्रतिशत लोगों ने कहा कि दुनिया में तेजी से हो रहे बदलाव उनकी मानसिक सेहत पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं।

भले ही इतनी बड़ी संख्या में लोग मानसिक परेशानियों से जूझ रहे हैं, फिर भी 60 प्रतिशत लोगों ने पिछले एक साल में किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह नहीं ली। यानी अधिकतर लोग अपनी परेशानी के बावजूद पेशेवर मदद लेने से बच रहे हैं।
 

  • करीब 25 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें डर है कि अगर वे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के पास जाएंगे तो लोग उन्हें गलत नजर से देखेंगे या उनका मजाक उड़ाएंगे।


एआई पर भरोसा

रिपोर्ट में एक और दिलचस्प लेकिन चिंता बढ़ाने वाली बात सामने आई। ब्रिटेन में कई लोग मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से मिलने की बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) चैटबॉट से मानसिक परेशानियों के बारे में सलाह ले रहे हैं।
 

  • कई वैज्ञानिक अध्ययनों में पहले ही यह चेतावनी दी जा चुकी है कि स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में केवल एआई पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है। 
  • एआई कई बार गलत सलाह दे सकता है, बीमारी की सही पहचान नहीं कर पाता और यह भी नहीं समझ पाता कि कब किसी व्यक्ति को तुरंत डॉक्टर या अस्पताल की जरूरत है?
  • सर्वे में शामिल करीब 46 प्रतिशत ब्रिटिश लोगों ने कहा कि उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह लेने के लिए एआई चैटबॉट का इस्तेमाल किया है। 
  • सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि हर पांच में से दो लोगों (लगभग 40 प्रतिशत) ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में उन्हें एआई पर किसी विशेषज्ञ डॉक्टर या काउंसलर से ज्यादा भरोसा है।

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मानसिक रोगों का खतरा - फोटो : Freepik.com

भारतीयों में मेंटल हेल्थ की समस्या

भारतीय आबादी भी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही है। 
 

  • प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भी मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं तेजी से बढ़ते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले रही हैं। 
  • भारत में लगभग 15% वयस्कों को मानसिक स्वास्थ्य के लिए इलाज की जरूरत है, जिनमें डिप्रेशन और एंग्जायटी सबसे आम समस्याएं हैं। 
  • इतने बड़े बोझ के बावजूद, इलाज न मिल पाने का अंतर (ट्रीटमेंट गैप) 80% से 85% तक बना हुआ है।
  • भारतीय समाज में भी मानसिक रोगों को लेकर कलंक (स्टिग्मा) की भावना देखा जा रही है। इसके अलावा संसाधनों और विशेषज्ञों की भारी कमी भी मुश्किलें बढ़ाती जा रही है।


मनोचिकित्सकों का कहना है कि बड़ी संख्या में ऐसे भी लोग हैं जो लंबे समय से मानसिक रोगों का शिकार हैं पर उन्हें अपनी परेशानी के बारे में न तो जानकारी है और न ही उनका इलाज हो पा रहा है जो सबसे बड़ी चिंता का कारण है।  



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स्रोत: 
Mental health status of the European population and its determinants: A cross-national comparison study


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 

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