इंडोनेशिया के जावा में किवंदती है कि जब योग्याकार्ता शहर में प्लेग फैला था तो सुल्तान ने लोगों को सयूर लोदेह पकाने और 49 दिनों तक घर में रहने का हुक्म दिया था। प्लेग खत्म हो गया और तब से जो परंपरा शुरू हुई वह आज तक चली आ रही है। सयूर लोदेह आम करी वाली सब्जी है। इसमें सात सब्जियां होती हैं, जिनको मसालेदार नारियल के दूध में पकाया जाता है।
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बदनसीबी से बचाने वाली करी
वास्तुकार और शिक्षक रेवांतो बुडी सैंटोसो कहते हैं, 'जावा के लोगों के विश्वास के कई पहलुओं की तरह इसका मकसद बदनसीबी से बचना है। निजी तौर पर कुछ हासिल करने की जगह बुरी चीजों से बचने को तवज्जो दी गई है। जावा के लोग मानते हैं कि जब कोई बाधा न हो तो जिंदगी अपना ख्याल खुद रखती है।'
जावा के खाने में प्रतीकों का बहुत महत्व है। मिसाल के लिए, नसी टंपेंग एक व्यंजन है जिसे मांस और सब्जियों को मिलाकर बनाया जाता है। इसे परोसते समय पीले चावल को शंकु की आकार में रखा जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि यह दुनिया ईश्वर के अधीन है।
नसी कुनिंग खुशबूदार पीले चावल का व्यंजन है, जिसे नए घर में जाने या नया कारोबार शुरू करने पर बनाया जाता है। माना जाता है कि इससे बरकत होती है। हल्दी के पेय 'जामू' का अर्थ है 'सेहत के लिए दुआ'। कहा जाता है कि इसे पीने से शांति मिलती है।
सयूर लोदेह बनाने के लिए नारियल के दूध में सात प्रमुख सामग्रियां मिलाई जाती हैं- मेलिंजो (जैतून जैसा फल), मेलिंजो के पत्ते, चियोट (एक तरह का स्क्वैश), लंबी बीन्स, बैंगन, कटहल और टेम्पेह। इन सभी के प्रतीकात्मक अर्थ हैं जो इनकी नाम की ध्वनियों से लिए गए हैं। जावा की भाषा में टेरोंग वुंगु (बैंगन) के वुंगु का अर्थ होता है बैंगनी। इसका एक मतलब जागृत जैसा भी होता है। लंजर (हरी बीन्स) का अर्थ होता है आशीर्वाद। इसी तरह सभी सातों चीजों के अपने अर्थ हैं।
धार्मिक अनुष्ठान
सयूर लोदेह को पकाना स्लामेंटन (धार्मिक अनुष्ठान) की मिसाल है। मानव विज्ञानी क्लिफर्ड गीर्ट्ज इसे जावा सभ्यता की खूबी मानते हैं। सयूर लोदेह बनाने में यह अपेक्षा नहीं रहती कि यह वास्तव में काम करेगा ही। सैंटोसो कहते हैं, 'दिलचस्प है कि सयूर लोदेह कोई व्यक्तिगत चीज नहीं है। यह बदनसीबी के लिए एक प्रतिक्रिया है। जिन चीजों को रोका नहीं जा सकता, यह उसे जितना मुमकिन हो उतना कम करने का प्रयास है।'
इसकी सामग्रियां जावा के गांव वालों को आसानी से मिल जाती हैं। इसे पकाना भी आसान है- एक बर्तन में सारी सामग्रियों को डालें और उसे चूल्हे के ऊपर टांग दें। बहुत पहले इसे पकाने से पहले एक रस्म होती थी। एक भाला और एक पवित्र झंडा (जो शायद पैगंबर मोहम्मद के मकबरे से ली गई चीजों से बनाई गई थी) इन दोनों को गलियों में घुमाया जाता था। आजकल यह एक सामान्य खाना है। भाषाई और सांख्यिकीय जटिलताओं के साथ इसमें एक व्यावहारिकता है।
करी की जटिल उत्पत्ति
सयूर लोदेह को बनाने की विधि सीधी-सादी है लेकिन इसकी उत्पत्ति बहुत जटिल है। कुछ विद्वानों का मत है कि इसका इतिहास 10वीं सदी की सभ्यता से शुरू होता है। 1006 में माउंट मेरापी में आए भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट के बाद लोगों की लोदेह खाकर अपनी जान बचाई थी। फैडली रहमान जैसे खाद्य इतिहासकार इसे 16वीं सदी का मानते हैं जब इंडोनेशिया में स्पेनिश और पुर्तगाली अपने साथ लंबी बीन्स लेकर आए थे। अन्य लोगों का कहना है कि यह 'पुरानी परंपरा' 19वीं सदी में शुरू हुई। 20वीं सदी की शुरुआत में योग्याकार्ता के बुद्धिजीवी इंडोनेशिया की राष्ट्रीय जागृति के केंद्र में थे। उस समय ही कई राष्ट्रीय मिथकों को खोजा गया और उनको मनाया गया।
इसमें कोई संदेह नहीं कि सयूर लोदेह की किंवदंती 20वीं सदी की शुरुआत में घर-घर तक पहुंची। इसका सबसे प्रमुख उदाहरण 1931 का है जब सुल्तान एचबी आठवें के शासनकाल में जावा में 20 साल तक ब्यूबोनिक प्लेग का प्रकोप रहा। दस्तावेजों से पता चलता है कि सयूर लोदेह करी को 1876, 1892, 1946 और 1951 के संकट के समय भी पकाया गया। सयूर लोदेह समय के साथ पूरे मलय द्वीप समूह में लोकप्रिय हो गया। यह बताना मुश्किल है कि यह व्यंजन क्यों, कहां और कब विकसित हुआ।