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Life After New Year: जनवरी बीतते ही क्यों टूट जाते हैं नए साल के सपने? जानिए कैसे सफल बनेगा 2026

लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवानी अवस्थी Updated Tue, 27 Jan 2026 01:58 PM IST
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सार

‘पिछला साल बहुत खराब था, सब गलत हुआ।’ अक्सर हम ऐसी ही नकारात्मक भावनाओं के साथ नए साल में कदम रखते हैं। लेकिन क्या सच में पूरे बारह महीने केवल दुख ही थे?  आप केवल तकलीफों को ही क्यों याद रखती हैं? 

New Year After One Month Mindset Real Life Reality
नए साल के संकल्प रह गए हैं अधूरे, जानिए क्या करें - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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रूसी दार्शनिक दोस्तोयेव्स्की का कथन है कि मनुष्य दुखों को लंबे समय तक याद रखता है और खुशियों को जल्दी भूल जाता है। नए साल के एक महीने बाद यह बात और ज्यादा साफ दिखाई देने लगती है। जनवरी का शोर अब थम चुका है। बधाइयों की गूंज, संकल्पों की सूची और उम्मीदों की चमक धीरे-धीरे सामान्य दिनचर्या में घुल चुकी है।

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अब न कोई काउंटडाउन है, न “नया साल–नई शुरुआत” का उत्साह। रह गए हैं हम, हमारी ज़िम्मेदारियां और वही पुराने सवाल कि क्या सच में कुछ बदला?

अक्सर ऐसा होता है कि साल बदल जाता है, लेकिन मन वही रह जाता है। बीते साल की असफलताएं, अधूरे सपने और अनकही थकान फिर से सिर उठाने लगती हैं। यही वह मोड़ है, जहां बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि नया साल भी पुराना ही निकला।
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नई शुरुआत तारीख से नहीं, स्वीकार से होती है

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि नकारात्मक अनुभव मस्तिष्क में गहराई से दर्ज हो जाते हैं, जबकि सुखद क्षण धीरे-धीरे फीके पड़ जाते हैं। यही कारण है कि जब शुरुआती उत्साह खत्म होता है, तो मन पुराने बोझ की ओर लौट जाता है। लेकिन सवाल यह नहीं कि बीता साल कैसा था, सवाल यह है कि आपने उससे क्या सीखा। नई शुरुआत का अर्थ अतीत को मिटाना नहीं, बल्कि उसे समझकर आगे बढ़ना है।

अब संकल्प नहीं, निरंतरता ज़रूरी है

जनवरी के पहले हफ्ते में हम बड़े-बड़े वादे करते हैं।  फरवरी के करीब आते-आते वही वादे भारी लगने लगते हैं। यहीं पर “मेनिफेस्टेशन” की असली परीक्षा होती है। मेनिफेस्टेशन सिर्फ सोचने का नाम नहीं, बल्कि सोच को रोज़मर्रा की आदत में बदलने का अभ्यास है। हमारे बुजुर्गों की बात कि अच्छा सोचो, अच्छा होगा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, फर्क बस इतना है कि अब हमें उसे निभाना होता है, सिर्फ दोहराना नहीं।

जो बीत गया, उसे बोझ नहीं बनने दें

बीते साल की परेशानियां तभी पीछे छूटती हैं, जब हम उन्हें स्वीकार करते हैं। हर वह अनुभव, जिसने आपको दुख दिया, कहीं न कहीं आपको मजबूत भी बना गया। लेकिन अगर आप उसे जीवन भर ढोती रहेंगी, तो वर्तमान कभी हल्का नहीं होगा। जनवरी के बाद का समय यही सिखाता है कि चिंता को पहचानिए, लेकिन उसे अपना पता मत बनने दीजिए।

हर दिन की शुरुआत अब असली मौका है

नई शुरुआत किसी एक दिन की मोहताज नहीं होती। अब जबकि साल अपने सामान्य प्रवाह में लौट आया है, यही सही समय है-

  • रोज खुद को धन्यवाद देने का
  • अपने घर और मन को हल्का रखने का
  • नकारात्मकता के लिए “ना” कहने का
  • शांति के लिए जगह बनाने का
  • क्षमा करना, खुद को भी और दूसरों को भी, मन को मुक्त करता है। यह कमजोरी नहीं, मानसिक स्वच्छता है।


छोटे बदलाव, बड़ी राहत

महिलाओं के लिए घर केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि ऊर्जा का केंद्र होता है। अब जब नया साल नया नहीं रहा, तो घर और सोच में छोटे बदलाव बड़ी राहत दे सकते हैं।

  • हरियाली जोड़ें
  • अनावश्यक सामान हटाएं
  • अपने आसपास के लोगों के प्रति कृतज्ञता जताएं


स्वस्थ शरीर, स्थिर मन

साल की असली शुरुआत वहीं से होती है, जहां शरीर और मन साथ चलते हैं। अब संकल्पों की जगह आदतें बनानी होंगी, 

  • संतुलित भोजन
  • रोज़ थोड़ी गतिविधि
  • भरपूर पानी
  • और पर्याप्त नींद

ये छोटी बातें ही बड़े बदलाव की जड़ होती हैं।


एक्सपर्ट की राय

दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट कॉलेज में मनोविज्ञान की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नुपुर गोसाईं कहती हैं,  “नया साल बीत जाने के बाद लोग खुद को असफल मान लेते हैं, जबकि यही समय सबसे वास्तविक होता है। जब उत्साह खत्म हो जाए और आप फिर भी अपने लिए खड़े रहें, वही असली नई शुरुआत है।” नया साल अब बीत चुका है, लेकिन आपकी कहानी अभी चल रही है। जनवरी के बाद का समय हार मानने का नहीं, ईमानदारी से आगे बढ़ने का समय है।

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