राम जन्मभूमि साबित करने वाले संत धर्माचार्यों से गौरवान्वित है अयोध्या
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रामनगरी अयोध्या के संत-धर्माचार्य और आम भक्त उन शीर्ष संतों-धर्माचारर्यों को याद करके गौरवान्वित हैं, जिनके ज्ञान-विज्ञान व तर्कों का लोहा सुप्रीम कोर्ट को भी मानना पड़ा। भगवान राम की जन्मभूमि का पौराणिक अस्तित्व दस्तावेजों में दर्ज हो गया।
इन संतों की ओर से की गई वेद-पुराण की व्याख्या से ‘अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या’ एक बार फिर साकार हो पाई, वरना अयोध्या सदियों से आक्रांताओं के हमले व 134 साल से मुकदमे के कलंक से जूझ रही थी। दिगंबर अखाड़ा के महंत सुरेश दास कहते हैं कि हमारे गुरु महाराज परमहंस रामचंद्रदासजी ने रामलला की जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए कठोर संघर्ष किया।
जिला न्यायालयों से लेकर हाईकोर्ट तक वेद-पुराण, संहिता आदि से राम जन्मभूमि होने के अकाट्य तर्क दिए। तमाम देश-विदेश के पत्रकार-लेखक उनके सामने निरुत्तर हो जाते थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुधीर अग्रवाल के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में दिगंबर अखाड़ा के महंत परमहंस रामचंद्रदास की ओर से भगवान राम के अयोध्या में जन्म को लेकर वेद, उपनिषद, संहिता, स्मृति आदि से तमाम सुबूत व तथ्य दिए गए थे।
जगद्गुरु रामदिनेशाचार्य कहते हैं कि तमाम विभूतियों के तर्क व पौराणिक प्रमाण से सुप्रीम कोर्ट का आदेश भरा पड़ा है। ऐसे मनीषियों पर अयोध्या ही नहीं ,पूरे देश को गर्व है। हमारे गुरुमहाराज रामानंदाचार्य स्वामी हर्याचार्य जी इस मामले में अहम गवाह थे।
अयोध्या पर सदियों से लगा कलंक धुला
उन्होंने अपनी गवाही में स्कंद पुराण के अयोध्या महात्म्य का हवाला दिया था। कहा था कि लोमश ऋषि का आश्रम मौजूदा राम जन्मभूमि से पूरब में है। वहां लोमश ऋषि के नाम पर एक पत्थर भी लगा है। इसे राम जन्मभूमि साबित होने में अकाट्य प्रमाण माना गया।
नाका हनुमानगढ़ी के महंत रामदास कहते हैं, रामनगरी के संत-धर्माचार्यों की कठोर तपस्या और तर्कपूर्ण ज्ञान से अयोध्या पर सदियों से लगा कलंक धुल पाया। मामले में निर्मोही अखाड़ा के पक्षकार रहे हमारे गुरुमहाराज महंत भास्कर दास ने शुरुआती पैरवी से लेकर हाईकोर्ट तक राम जन्मभूमि के अकाट्य प्रमाण दिए थे।
सुप्रीम कोर्ट में जगद्गुरु रामनंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य के बयान का भी जिक्र है, जिसमें उन्होंने विस्तार से बाबरी मस्जिद ही राम जन्मभूमि है, के बारे में तर्कों से समझाया था।
एडवर्ड के माइल स्टोन से तय हुई रामलला की दूरी
प्रमुख गवाह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने स्कंद पुराण का हवाला देते हुए कहा था, अपने अयोध्या प्रवास के दौरान मैंने राम जन्मस्थान के दर्शन किए थे। वहां ब्रिटिश अफसर सर एडवर्ड की ओर से 1901-02 में लगाए गए पांच-छह पत्थर देखे थे।
इनमें लिखा था कि ये पत्थर राम जन्मभूमि से बड़ास्थान, राम जन्मभूमि, पिंडार्क, लोमश, विघ्नेश और वशिष्ठ कुंड में लगाए गए थे। हमारे अधिवक्ता पीएन मिश्र ने सुप्रीम कोर्ट में अकाट्य तर्क, साक्ष्य व देश-विदेश के तत्कालीन लेखकों की पुस्तकों के उद्धरण के माध्यम से साबित किया कि राम जन्मभूमि के बाद बाबरी मस्जिद उसी भूमि पर बनाई गई।
इतिहासकार ने भी माना राम का जन्मस्थान
मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश गवाह इतिहासकार सुशील श्रीवास्तव ने भी माना है कि स्कंद पुराण के अयोध्या महात्म्य में भगवान राम के जन्मस्थान का विवरण है। अयोध्या महात्म्य में लोमश ऋषि के आश्रम का जिक्र भी है। विघ्नेश्वर कुंड व वशिष्ठ कुंज आश्रम का भी उल्लेख है। इन्हीं के माध्यम से भगवान राम का जन्मस्थान तय किया गया।
इन श्लोकों से बयां हुई अयोध्या की पौराणिकता
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका: ।।
(अर्थात अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, काञ्चीपुरम, उज्जैन, पुरी और द्वारिका - ये सात मोक्षदायी हैं।) अयोध्या के संतों ने बृहदधर्मोत्तर पुराण का हवाला देते हुए इस श्लोक के माध्यम से अयोध्या की पौराणिकता स्थापित की।
वाल्मीकि रामायण के माध्यम से भी अयोध्या में भगवान श्रीराम के जन्म की प्रामाणिकता गिनाई गई :
प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम ् ।
कौसल्याजनयद् रामं दिव्यलक्षणसंयुतम ् ।। (बालकांड 18.10)
(अर्थात, जिस जगन्नाथ भगवान विष्णु को पूरा संसार नमस्कार करता है), उन्होंने अयोध्या की महारानी कौशल्या व महाराज दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लिया है।
वैष्णव खंड सात में अयोध्या महात्म्य का जिक्र करते हुए श्लोक 18 से 25 का उल्लेख
शीर्ष संतों ने स्कंद पुराण के वैष्णव खंड सात में अयोध्या महात्म्य का जिक्र करते हुए श्लोक 18 से 25 का उल्लेख करते हुए भगवान राम का जन्म उसी जगह माना :
तस्मात्स्थानात् ऐशाने रामजन्म प्रवर्तते ।
जन्मस्थानमिदं प्रोक्तं मोक्षादिफलसाधनम ् ।18।।
विघ्नेश्वरात्पूर्वभागे वाशिष्ठादत्तुरे तथा ।
लौमशात्पश्चिमे भागे जन्मस्थानं तत: स्मतृम ्।।19।।
(अर्थात उस जगह से उत्तर-पूर्व वह स्थान है, जहां राम का जन्म हुआ था। यहां आने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा माना जाता है कि राम का जन्मस्थान विघ्नेश्वर के पूर्व में वशिष्ठ के उत्तर व लोमश के पश्चिम में स्थित है।)
यद् दृष्ट्वा च मनुष्यस्य गर्भवासजयो भवेत।
विना दानेन तपसा विना तीर्थैर्विना मखै: ।।20।।
नवमीदिवसे प्राप्ते व्रतधारी हि मानव: ।
स्नानदानप्रभावेण मुच्यते जन्मबन्धनात ्।। 21।।
अर्थात राम जन्मस्थान पर जाने मात्र से ही मानव जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त हो जाता है। न दान करने की जरूरत होती है न तप करने की, न तीर्थयात्रा पर जाने की।