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नैतिकता नहीं, पुख्ता सबूतों के आधार पर ही हो सकती है सजा : हाईकोर्ट

Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Fri, 12 Jun 2026 02:32 AM IST
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Conviction can only be based on concrete evidence, not morality: High Court
हाईकोर्ट।
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लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अदालतें किसी अभियुक्त को केवल कानूनी तौर पर स्वीकार्य साक्ष्यों और तर्कसंगत संदेह से परे दोष साबित होने पर ही सजा सुना सकती हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि महज नैतिक आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस अहम टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने 14 साल के बच्चे की हत्या के मामले में सात अभियुक्तों को सत्र अदालत से मिली उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने सभी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया और आदेश दिया कि यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तत्काल जेल से रिहा किया जाए।

यह मामला लखनऊ के इंदिरानगर थानाक्षेत्र का है, जहां 29 मई 2013 को 14 वर्षीय बच्चे माज की हत्या कर दी गई थी। लखनऊ की सत्र अदालत ने 28 फरवरी 2020 को इस मामले में संजय राय, राम बाबू उर्फ छोटू, अजीत राय उर्फ शिंटू, संदीप राय, राजेश कुमार सोनी उर्फ बबलू, राहुल राय और सुनील कुमार सैनी उर्फ पहलवान को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
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सत्र अदालत के इस फैसले को अभियुक्तों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के खिलाफ आरोपों को तर्कसंगत संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने कहा कि जब आरोप संदेह से परे साबित न हों, तो अभियुक्त संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं। इसी आधार पर कोर्ट ने सत्र अदालत के सजा के फैसले को निरस्त कर दिया।
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