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लखनऊ: हाईकोर्ट परिसर में दबिश और हंगामा, दो दरोगा, एक सिपाही निलंबित; वकीलों ने पुलिस वालों को घेरा

अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Wed, 21 Jan 2026 07:23 AM IST
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सार

हाईकोर्ट परिसर में घुसकर महिला को पकड़ना पुलिसकर्मियों के लिए भारी पड़ गया। डीसीपी ने तीनों पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है।

Lucknow: Policemen entered the chamber to arrest a woman in the High Court, three suspended
दरोगा उस्मान व एसएसआई लखन सिंह। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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गो तस्करी के मामले में आरोपी महिला की तलाश में दो दरोगा और एक सिपाही सोमवार दोपहर हाईकोर्ट पहुंचे। इसके बाद एक अधिवक्ता के चैंबर में घुसकर महिला को पकड़ने का प्रयास करते हुए धमकाया। पुलिसवालों के इस तरह दबिश देने का विरोध करते हुए अधिवक्ताओं ने उन्हें घेर लिया। विभूतिखंड थाने की पुलिस के पहुंचने पर प्रकरण शांत हुआ। इसके बाद दोनों दरोगाओं व सिपाही के खिलाफ विभूतिखंड थाने में अलग-अलग एफआईआर कराई गई। मामले की जानकारी पर डीसीपी ने तीनों को निलंबित कर दिया।

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माल के ऊंचाखेड़ा निवासी सुशील कुमार ने 14 जनवरी को काकोरी थाने में अमीनाबाद के मो. वासिफ के खिलाफ उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम 1955 की धारा 3,4 और 8 के तहत एफआईआर कराई थी। जांच में आमिना खातून का नाम प्रकाश में आया तो पुलिस ने उसे भी आरोपी बना दिया।
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सोमवार दोपहर काकोरी थाने के दरोगा उस्मान खान, लाखन सिंह और सिपाही पुष्पेंद्र सिंह को पता चला कि आमिना हाईकोर्ट में अधिवक्ता रिश्तेदार गुफरान सिद्दीकी से मिलने पहुंची हैं। इस पर तीनों हाईकोर्ट पहुंचे और अंदर जाने के लिए पर्ची बनवाई। इसके बाद तीनों गुफरान के चैंबर नंबर 515 ब्लॉक सी में पहुंचे। जैसे ही पुलिसवालों ने आमिना को पकड़ने की कोशिश की अधिवक्ता जमा हो गए। वकीलों ने हाईकोर्ट परिसर में इस तरह दबिश डालने का विरोध करते हुए पुलिसवालों को घेर लिया। देखते ही देखते मामले ने तूल ले लिया और सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को पहुंच गई। कुछ देर में विभूतिखंड थाने की पुलिस पहुंची और दोनों दरोगाओं और सिपाही को वहां से निकालकर मामला शांत कराया।

अधिवक्ता सज्जाद हुसैन और हाईकोर्ट के निबंधक (सुरक्षा) शैलेंद्र कुमार ने तीनों के खिलाफ झूठी सूचना देना, आपराधिक अतिचार, धोखाधड़ी और धमकाने की धारा में रिपोर्ट दर्ज कराई। मामला अधिकारियों तक पहुंचा तो देर रात ही डीसीपी पश्चिम विश्वजीत श्रीवास्तव ने तीनों पुलिसवालों को निलंबित कर दिया।

गलत जानकारी देकर कोर्ट में हुए दाखिल

शैलेंद्र कुमार ने तहरीर में आरोप लगाया है कि पुलिसवाले एडवोकेट जनरल/ सीएससी कार्यालय में जाने की बात दर्ज करवाकर कोर्ट में दाखिल हुए थे। काकोरी थाने की 320/25 एफआईआर का भी जिक्र किया। जांच में पता चला कि वह केस हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए लिस्ट में ही नहीं था। इसके बाद पुलिसवाले एडवोकेट जनरल/ सीएससी कार्यालय न जाकर अधिवक्ता गुफरान के चैंबर तक पहुंच गए।

इन धाराओं में दर्ज की गई एफआईआर
बीएनएस की धारा 329(3) आपराधिक अतिचार और गृह-अतिचार से संबंधित है। इसमें गलत इरादे (अपराध करने, किसी को डराने या अपमानित करने) से किसी की संपत्ति में गैरकानूनी प्रवेश या वहां बने रहना शामिल है। उपधारा (3) के लिए तीन महीने तक की कैद या 5,000 रुपये तक जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है। धारा 351(3) आपराधिक धमकी से संबंधित है। यह मृत्यु, गंभीर चोट, आग से संपत्ति नष्ट करने या आजीवन कारावास/मृत्युदंड जैसे गंभीर अपराधों की धमकी देने पर लागू होती है। ऐसे में सात वर्ष तक की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकता है।

धारा 352 शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान से संबंधित है। यदि कोई व्यक्ति किसी को जानबूझकर इस इरादे से अपमानित करता है कि वह व्यक्ति क्रोधित होकर सार्वजनिक शांति भंग करे या कोई अन्य अपराध करे। इसमें दो वर्ष तक की कैद या जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।धारा 217 लोक सेवक को गलत जानकारी देने से संबंधित है, ताकि वह कानूनी शक्तियों का इस्तेमाल किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने या परेशान करने के लिए करे। ऐसा करने वाले व्यक्ति को एक वर्ष तक की कैद, 10,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। धारा 318 धोखाधड़ी से संबंधित है। इसका उपखंड (2) बताता है कि जो कोई भी बेईमानी से किसी को धोखा देकर संपत्ति की डिलीवरी के लिए प्रेरित करता है, उसे तीन वर्ष तक की कैद या जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं।

बिना अनुमति के नहीं कर सकते प्रवेश

हाईकोर्ट के अंदर या परिसर में पुलिस को प्रवेश के लिए आमतौर पर संबंधित अदालत के रजिस्ट्रार या न्यायिक अधिकारी से अनुमति लेनी होती है। खासकर अगर कोई तलाशी, गिरफ्तारी या किसी व्यक्ति को कोर्ट के सामने पेश करना हो। दरअसल, हाईकोर्ट एक संवेदनशील जगह है और वहां प्रवेश के सख्त नियम होते हैं। ऐसे में न्यायालय की अनुमति या वारंट आवश्यक है।

परिसर के बाहर से पकड़ने में चूके
दरअसल, महिला की लोकेशन मिलने पर पुलिसकर्मी हाईकोर्ट के बाहर पहुंचे थे। इससे पहले कि महिला को पुलिसकर्मी पकड़ पाते वह भीतर दाखिल हो गई। महिला को पकड़ने के लिए पुलिसकर्मियों ने नियम का ध्यान नहीं रखा और अधिवक्ता के चैंबर से पकड़ने के प्रयास में निलंबित कर दिए गए। पुलिसकर्मी अगर महिला के परिसर से बाहर निकलने का इंतजार करते तो शायद इतना हंगामा नहीं होता।

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