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Betul Cough Syrup : बेटे की जिंदगी बचाने के लिए पिता ने गिरवी रखी उम्मीदें, लेकिन नहीं बचा सका इकलौता लाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बैतूल
Published by: बैतूल ब्यूरो
Updated Tue, 07 Oct 2025 06:27 PM IST
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सार
Betul News : बैतूल के मजदूर निखिलेश धुर्वे ने बेटे निहाल के इलाज के लिए कर्ज लेकर हर कोशिश की, लेकिन कफ सिरप पीने के बाद बच्चे की हालत बिगड़ गई। कई अस्पतालों में इलाज के बावजूद 1 अक्तूबर को उसकी मौत हो गई। परिवार ने जांच और मुआवजे की मांग की।
मृतक निहाल
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बैतूल जिले का दो साल का निहाल धुर्वे अब नहीं रहा। पिता निखिलेश धुर्वे का गला भर आता है, जब वो बताते हैं कि अपने इकलौते बेटे को बचाने के लिए उन्होंने मजदूरी की कमाई से ज्यादा, रिश्तों का भरोसा दांव पर लगा दिया पर किस्मत ने साथ नहीं दिया।
निहाल को 18 सितंबर को हल्की सर्दी और खांसी हुई थी। मां फूलकली उसे छिंदवाड़ा जिले के परासिया लेकर गई, जहां एक निजी शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण सोनी ने इलाज किया। डॉक्टर ने कुछ दवाइयां लिखीं जिनमें से एक कफ सिरप भी शामिल था। दवा पीने के दो दिन बाद ही निहाल की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। 21 सितंबर से बच्चे का पेशाब पूरी तरह बंद हो गया। घबराए माता-पिता पहले पास के बोरदेही गांव के डॉक्टर जगन्नाथ यदुवंशी के पास पहुंचे। उन्होंने बताया कि बच्चे की किडनी पर असर हुआ है और तुरंत बैतूल ले जाने की सलाह दी।
चार अस्पताल, सात दिन और हर पल उम्मीद का टूटना
24 सितंबर को निहाल को बैतूल के निजी अस्पताल चिरायु में भर्ती कराया गया। हालत में सुधार नहीं हुआ तो 25 की रात उसे भोपाल के एम्स अस्पताल रेफर कर दिया गया।
एम्स के डॉक्टरों ने बताया कि बच्चे की दोनों किडनियां फेल हो चुकी हैं और उसकी स्थिति बेहद नाज़ुक है। लगातार चार दिन इलाज चला। इंजेक्शन, ड्रिप, मशीनें, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। 29 सितंबर की शाम थके और टूटे पिता बेटे को घर वापस ले आए। और 1 अक्तूबर की सुबह निहाल की सांसें थम गईं।
कर्ज में डूबा परिवार, इलाज के लिए गिरवी रखी उम्मीदें
निखिलेश धुर्वे आंध्र प्रदेश की एक कंपनी में मजदूर हैं। मासिक आमदनी मुश्किल से ₹10,000–₹12,000 होती है। बेटे के इलाज के लिए उन्होंने रिश्तेदारों से ₹65,000 का कर्ज लिया। कुछ दोस्तों से उधार, कुछ पत्नी के मायके से मदद मिली।
निखिलेश ने बताया कि मैं मजदूर आदमी हूं। डॉक्टर ने जो कहा वही किया। पर जब बच्चे की तबीयत और बिगड़ गई, तो सब कुछ दांव पर लगा दिया। मैंने सोचा इलाज हो जाएगा तो धीरे-धीरे कर्ज चुका दूंगा, पर अब बेटा ही नहीं रहा। अब यह परिवार न केवल अपने इकलौते बेटे को खो चुका है, बल्कि कर्ज के बोझ और मानसिक सदमे से भी जूझ रहा है।
मेडिकल हिस्ट्री और जांच
निखिलेश के पास डॉक्टर द्वारा लिखा गया प्रिस्क्रिप्शन अब भी मौजूद है। उन्होंने जांच टीम को बताया कि उन्होंने वही दवाइयाँ मेडिकल से ली थीं, और बची हुई सिरप की शीशी निहाल के शव के साथ दफना दी। स्वास्थ्य विभाग ने दवाइयों के सैंपल जांच के लिए लैब भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। प्रारंभिक जानकारी में किडनी फेल्योर का कारण संभावित टॉक्सिक रिएक्शन बताया जा रहा है, लेकिन आधिकारिक पुष्टि रिपोर्ट के बाद ही होगी।
ये भी पढ़ें- Indore News: चूहों का आतंक, दिल्ली इंदौर एक्सप्रेस रोकना पड़ी, 'शॉर्ट सर्किट' के बाद कोच में फंसे यात्री
एक पिता की गुहार
निखिलेश की आंखों में अब भी सवाल है। क्या मेरे बेटे की जान बच सकती थी अगर दवा सही होती? मैंने तो वही किया जो डॉक्टर ने कहा था। वो अब सरकार से मदद की मांग कर रहे हैं कि जिस कर्ज में उन्होंने इलाज कराया, कम से कम उसका कुछ हिस्सा सरकार माफ करे, और जो गलती हुई, उसकी जांच ईमानदारी से हो। यह कहानी सिर्फ एक पिता के दर्द की नहीं, बल्कि उस भरोसे की भी है, जो आम लोग डॉक्टर और दवा पर रखते हैं। निहाल अब इस दुनिया में नहीं, लेकिन उसके पिता की आवाज़ एक सवाल बनकर रह गई है।
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निहाल को 18 सितंबर को हल्की सर्दी और खांसी हुई थी। मां फूलकली उसे छिंदवाड़ा जिले के परासिया लेकर गई, जहां एक निजी शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण सोनी ने इलाज किया। डॉक्टर ने कुछ दवाइयां लिखीं जिनमें से एक कफ सिरप भी शामिल था। दवा पीने के दो दिन बाद ही निहाल की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। 21 सितंबर से बच्चे का पेशाब पूरी तरह बंद हो गया। घबराए माता-पिता पहले पास के बोरदेही गांव के डॉक्टर जगन्नाथ यदुवंशी के पास पहुंचे। उन्होंने बताया कि बच्चे की किडनी पर असर हुआ है और तुरंत बैतूल ले जाने की सलाह दी।
चार अस्पताल, सात दिन और हर पल उम्मीद का टूटना
24 सितंबर को निहाल को बैतूल के निजी अस्पताल चिरायु में भर्ती कराया गया। हालत में सुधार नहीं हुआ तो 25 की रात उसे भोपाल के एम्स अस्पताल रेफर कर दिया गया।
एम्स के डॉक्टरों ने बताया कि बच्चे की दोनों किडनियां फेल हो चुकी हैं और उसकी स्थिति बेहद नाज़ुक है। लगातार चार दिन इलाज चला। इंजेक्शन, ड्रिप, मशीनें, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। 29 सितंबर की शाम थके और टूटे पिता बेटे को घर वापस ले आए। और 1 अक्तूबर की सुबह निहाल की सांसें थम गईं।
कर्ज में डूबा परिवार, इलाज के लिए गिरवी रखी उम्मीदें
निखिलेश धुर्वे आंध्र प्रदेश की एक कंपनी में मजदूर हैं। मासिक आमदनी मुश्किल से ₹10,000–₹12,000 होती है। बेटे के इलाज के लिए उन्होंने रिश्तेदारों से ₹65,000 का कर्ज लिया। कुछ दोस्तों से उधार, कुछ पत्नी के मायके से मदद मिली।
निखिलेश ने बताया कि मैं मजदूर आदमी हूं। डॉक्टर ने जो कहा वही किया। पर जब बच्चे की तबीयत और बिगड़ गई, तो सब कुछ दांव पर लगा दिया। मैंने सोचा इलाज हो जाएगा तो धीरे-धीरे कर्ज चुका दूंगा, पर अब बेटा ही नहीं रहा। अब यह परिवार न केवल अपने इकलौते बेटे को खो चुका है, बल्कि कर्ज के बोझ और मानसिक सदमे से भी जूझ रहा है।
मेडिकल हिस्ट्री और जांच
निखिलेश के पास डॉक्टर द्वारा लिखा गया प्रिस्क्रिप्शन अब भी मौजूद है। उन्होंने जांच टीम को बताया कि उन्होंने वही दवाइयाँ मेडिकल से ली थीं, और बची हुई सिरप की शीशी निहाल के शव के साथ दफना दी। स्वास्थ्य विभाग ने दवाइयों के सैंपल जांच के लिए लैब भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। प्रारंभिक जानकारी में किडनी फेल्योर का कारण संभावित टॉक्सिक रिएक्शन बताया जा रहा है, लेकिन आधिकारिक पुष्टि रिपोर्ट के बाद ही होगी।
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एक पिता की गुहार
निखिलेश की आंखों में अब भी सवाल है। क्या मेरे बेटे की जान बच सकती थी अगर दवा सही होती? मैंने तो वही किया जो डॉक्टर ने कहा था। वो अब सरकार से मदद की मांग कर रहे हैं कि जिस कर्ज में उन्होंने इलाज कराया, कम से कम उसका कुछ हिस्सा सरकार माफ करे, और जो गलती हुई, उसकी जांच ईमानदारी से हो। यह कहानी सिर्फ एक पिता के दर्द की नहीं, बल्कि उस भरोसे की भी है, जो आम लोग डॉक्टर और दवा पर रखते हैं। निहाल अब इस दुनिया में नहीं, लेकिन उसके पिता की आवाज़ एक सवाल बनकर रह गई है।

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