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एम्स की रिसर्च: स्त्री रोग जांच में बीमारी ही नहीं, महिलाओं का डर भी समझेंगे डॉक्टर, बदलेगा जांच का तरीका
Sun, 12 Jul 2026 01:03 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Sun, 12 Jul 2026 01:03 PM IST
सार
स्त्री रोग जांच के दौरान महिलाओं की आशंकाएं, झिझक और जांच से जुड़े अनुभव भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा तय कर सकते हैं। एम्स भोपाल की रिसर्च ने महिला की गरिमा, सूचित सहमति और बेहतर संवाद को जांच का अहम हिस्सा बनाने की जरूरत बताई है। मध्य भारत की महिलाओं पर आधारित इस शोध को पुर्तगाल के लिस्बन में 3500 से अधिक वैश्विक विशेषज्ञों के बीच प्रस्तुत किया गया।
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डॉ. नसीमा शफकत
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
स्त्री रोग की जांच के दौरान महिलाओं की झिझक, डर और अपनी परेशानी खुलकर नहीं बता पाने की समस्या भी अब बेहतर इलाज की राह तय कर सकती है। एम्स भोपाल की रिसर्च ने महिला मरीजों के अनुभव, आशंकाओं और अपेक्षाओं को जांच का अहम हिस्सा बनाने की जरूरत बताई है। रिसर्च का फोकस इस बात पर है कि केवल बीमारी की पहचान ही नहीं, बल्कि जांच के दौरान महिला की गरिमा, सहमति और उससे प्रभावी संवाद भी बेहतर स्वास्थ्य सेवा के लिए जरूरी है।
एम्स भोपाल के नर्सिंग कॉलेज की सहायक प्राध्यापक डॉ. नसीमा शफकत ने मध्य भारत की महिलाओं के स्त्री रोग परीक्षण से जुड़े अनुभव और आशंकाओं पर अध्ययन किया है। इसमें यह समझने की कोशिश की गई कि जांच को लेकर महिलाओं के मन में क्या चिंताएं रहती हैं और वे डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मियों से किस तरह के व्यवहार की अपेक्षा करती हैं।
जांच से पहले बताना होगा- क्या और क्यों कर रहे
रिसर्च ने प्रभावी संवाद और सूचित सहमति की जरूरत को प्रमुखता से रेखांकित किया है। इसका मतलब है कि स्त्री रोग परीक्षण से पहले मरीज को जांच की प्रक्रिया और उसकी जरूरत के बारे में स्पष्ट जानकारी देना महत्वपूर्ण है। महिला की सहमति, गरिमा और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखने से जांच के अनुभव को बेहतर बनाया जा सकता है। यह रिसर्च किसी नई दवा या उपचार पद्धति की खोज नहीं है, बल्कि मरीज की जांच और देखभाल के तरीके को अधिक महिला-केंद्रित बनाने की दिशा में अध्ययन है।
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खुलकर बताएंगी परेशानी तो सही जांच में मिलेगी मदद
महिलाओं की आशंकाओं और अपेक्षाओं को समझकर डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ मरीज से संवाद को बेहतर कर सकते हैं। इससे महिला अपनी परेशानी और लक्षण अधिक सहजता से बता सकती है। बेहतर संवाद से सही जांच और समय पर उपचार की दिशा में मदद मिलने की संभावना है। रिसर्च के निष्कर्ष अस्पतालों में महिला-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं और बेहतर मरीज अनुभव की दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।
भोपाल की रिसर्च को लिस्बन में मिला वैश्विक मंच
डॉ. नसीमा शफकत ने अपनी रिसर्च को पुर्तगाल के लिस्बन में आयोजित 34वीं इंटरनेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ मिडवाइव्स ट्राइएनियल कांग्रेस 2026 में पोस्टर के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने सम्मेलन में भारत और एम्स भोपाल का प्रतिनिधित्व किया। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने उनके शोध को सराहा। सम्मेलन में दुनिया भर से 3500 से अधिक मिडवाइव्स, नर्स, शिक्षक, शोधकर्ता, चिकित्सक और नीति-निर्माता शामिल हुए। यहां डिजिटल हेल्थ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सिमुलेशन आधारित शिक्षा, दक्षता आधारित प्रशिक्षण और मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं में नवाचार पर चर्चा हुई।
यह भी पढ़ें-जून की कमी जुलाई में पूरी, एमपी में बारिश का 25% कोटा पूरा, आज कई जिलों में बारिश का अलर्ट
एम्स की वैश्विक पहचान को मजबूती
एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक एवं सीईओ प्रो. डॉ. माधवानन्द कर ने डॉ. नसीमा शफकत को बधाई दी। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहभागिता एम्स भोपाल की वैश्विक पहचान मजबूत करने के साथ शिक्षा, शोध और मरीज-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देती है। डॉ. नसीमा ने अपनी उपलब्धि का श्रेय एम्स भोपाल प्रशासन, डीन अकादमिक, डीन अनुसंधान और नर्सिंग कॉलेज के मार्गदर्शन व सहयोग को दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच से मिले ज्ञान और अनुभव को संस्थान की शिक्षा, शोध और नैदानिक सेवाओं में लागू करने का प्रयास किया जाएगा।
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एम्स भोपाल के नर्सिंग कॉलेज की सहायक प्राध्यापक डॉ. नसीमा शफकत ने मध्य भारत की महिलाओं के स्त्री रोग परीक्षण से जुड़े अनुभव और आशंकाओं पर अध्ययन किया है। इसमें यह समझने की कोशिश की गई कि जांच को लेकर महिलाओं के मन में क्या चिंताएं रहती हैं और वे डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मियों से किस तरह के व्यवहार की अपेक्षा करती हैं।
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जांच से पहले बताना होगा- क्या और क्यों कर रहे
रिसर्च ने प्रभावी संवाद और सूचित सहमति की जरूरत को प्रमुखता से रेखांकित किया है। इसका मतलब है कि स्त्री रोग परीक्षण से पहले मरीज को जांच की प्रक्रिया और उसकी जरूरत के बारे में स्पष्ट जानकारी देना महत्वपूर्ण है। महिला की सहमति, गरिमा और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखने से जांच के अनुभव को बेहतर बनाया जा सकता है। यह रिसर्च किसी नई दवा या उपचार पद्धति की खोज नहीं है, बल्कि मरीज की जांच और देखभाल के तरीके को अधिक महिला-केंद्रित बनाने की दिशा में अध्ययन है।
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खुलकर बताएंगी परेशानी तो सही जांच में मिलेगी मदद
महिलाओं की आशंकाओं और अपेक्षाओं को समझकर डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ मरीज से संवाद को बेहतर कर सकते हैं। इससे महिला अपनी परेशानी और लक्षण अधिक सहजता से बता सकती है। बेहतर संवाद से सही जांच और समय पर उपचार की दिशा में मदद मिलने की संभावना है। रिसर्च के निष्कर्ष अस्पतालों में महिला-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं और बेहतर मरीज अनुभव की दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।
भोपाल की रिसर्च को लिस्बन में मिला वैश्विक मंच
डॉ. नसीमा शफकत ने अपनी रिसर्च को पुर्तगाल के लिस्बन में आयोजित 34वीं इंटरनेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ मिडवाइव्स ट्राइएनियल कांग्रेस 2026 में पोस्टर के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने सम्मेलन में भारत और एम्स भोपाल का प्रतिनिधित्व किया। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने उनके शोध को सराहा। सम्मेलन में दुनिया भर से 3500 से अधिक मिडवाइव्स, नर्स, शिक्षक, शोधकर्ता, चिकित्सक और नीति-निर्माता शामिल हुए। यहां डिजिटल हेल्थ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सिमुलेशन आधारित शिक्षा, दक्षता आधारित प्रशिक्षण और मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं में नवाचार पर चर्चा हुई।
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एम्स की वैश्विक पहचान को मजबूती
एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक एवं सीईओ प्रो. डॉ. माधवानन्द कर ने डॉ. नसीमा शफकत को बधाई दी। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहभागिता एम्स भोपाल की वैश्विक पहचान मजबूत करने के साथ शिक्षा, शोध और मरीज-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देती है। डॉ. नसीमा ने अपनी उपलब्धि का श्रेय एम्स भोपाल प्रशासन, डीन अकादमिक, डीन अनुसंधान और नर्सिंग कॉलेज के मार्गदर्शन व सहयोग को दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच से मिले ज्ञान और अनुभव को संस्थान की शिक्षा, शोध और नैदानिक सेवाओं में लागू करने का प्रयास किया जाएगा।
