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Bhopal News: पीएम के भाषण पर आरिफ मसूद का ऐतराज, मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र नहीं होने पर उठाए सवाल
Sun, 16 Aug 2026 05:09 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Sun, 16 Aug 2026 05:09 PM IST
सार
कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र नहीं होने पर आपत्ति जताई। उन्होंने प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजकर कहा कि आजादी की लड़ाई सभी समुदायों के लोगों ने मिलकर लड़ी थी। मसूद ने मजनू शाह, अहमदुल्ला शाह समेत कई सेनानियों के योगदान का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री से इस मामले में माफी मांगने की मांग की।
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आरिफ मसूद की पीसी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के योगदान को याद किए जाने पर भोपाल से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने आपत्ति जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री के संबोधन में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख नहीं किया गया। मसूद ने इस संबंध में प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजकर इसे आजादी के संघर्ष में योगदान देने वाले महान सेनानियों के साथ अन्याय बताया। मसूद ने कहा कि भारत की आजादी की लड़ाई किसी एक धर्म या समुदाय की लड़ाई नहीं थी। अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में हर वर्ग और समुदाय के लोगों ने हिस्सा लिया और अपना बलिदान दिया। ऐसे में स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा के दौरान मुस्लिम सेनानियों का नाम नहीं लिया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
इतिहास के कई प्रसंगों का दिया हवाला
विधायक ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मुस्लिम सेनानियों के योगदान के अनेक प्रमाण मौजूद हैं। उन्होंने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक और अंडमान-निकोबार की सेल्युलर जेल में दर्ज नामों का हवाला देते हुए कहा कि वहां भी मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम मिलते हैं।मसूद ने 1757 से 1947 तक के स्वतंत्रता संघर्ष के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए मजनू शाह फकीर, मूसा शाह, चिराग अली और नूरुल मोहम्मद जैसे नाम गिनाए। उन्होंने 1857 के विद्रोह में अहमदुल्ला शाह मदरासी की भूमिका का भी जिक्र किया और बताया कि अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने वाले व्यक्ति के लिए इनाम घोषित किया था।
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1857 के संघर्ष और दमन का भी जिक्र
मसूद ने अंग्रेज अधिकारियों के संस्मरणों और इतिहासकारों के लेखन का हवाला देते हुए कहा कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में लोगों को बिना मुकदमे के फांसी दी थी। उनके अनुसार इनमें मुस्लिम उलेमा और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की भी बड़ी संख्या थी। विधायक ने अपने ज्ञापन में स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम उलेमा और अन्य सेनानियों के योगदान से जुड़े विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख किया है। उन्होंने दावा किया कि अंग्रेजी शासन के दौरान हजारों लोगों को फांसी दी गई, जिनमें बड़ी संख्या मुस्लिम उलेमा की थी।
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प्रधानमंत्री से माफी की मांग
मसूद ने कहा कि आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले सेनानियों के योगदान को किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री के संबोधन में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख नहीं होने से उनके योगदान का सम्मान नहीं हुआ। विधायक ने प्रधानमंत्री से इस मामले में देश से माफी मांगने की मांग की है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मसूद ने स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरों वाला पोस्टर भी लगाया था।
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इतिहास के कई प्रसंगों का दिया हवाला
विधायक ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मुस्लिम सेनानियों के योगदान के अनेक प्रमाण मौजूद हैं। उन्होंने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक और अंडमान-निकोबार की सेल्युलर जेल में दर्ज नामों का हवाला देते हुए कहा कि वहां भी मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम मिलते हैं।मसूद ने 1757 से 1947 तक के स्वतंत्रता संघर्ष के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए मजनू शाह फकीर, मूसा शाह, चिराग अली और नूरुल मोहम्मद जैसे नाम गिनाए। उन्होंने 1857 के विद्रोह में अहमदुल्ला शाह मदरासी की भूमिका का भी जिक्र किया और बताया कि अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने वाले व्यक्ति के लिए इनाम घोषित किया था।
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1857 के संघर्ष और दमन का भी जिक्र
मसूद ने अंग्रेज अधिकारियों के संस्मरणों और इतिहासकारों के लेखन का हवाला देते हुए कहा कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में लोगों को बिना मुकदमे के फांसी दी थी। उनके अनुसार इनमें मुस्लिम उलेमा और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की भी बड़ी संख्या थी। विधायक ने अपने ज्ञापन में स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम उलेमा और अन्य सेनानियों के योगदान से जुड़े विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख किया है। उन्होंने दावा किया कि अंग्रेजी शासन के दौरान हजारों लोगों को फांसी दी गई, जिनमें बड़ी संख्या मुस्लिम उलेमा की थी।
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प्रधानमंत्री से माफी की मांग
मसूद ने कहा कि आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले सेनानियों के योगदान को किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री के संबोधन में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख नहीं होने से उनके योगदान का सम्मान नहीं हुआ। विधायक ने प्रधानमंत्री से इस मामले में देश से माफी मांगने की मांग की है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मसूद ने स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरों वाला पोस्टर भी लगाया था।
