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छिंदवाड़ा बस हादसा: नाना-नाती की मौत ने तोड़ा परिवार, एक ही चिता पर हुआ अंतिम संस्कार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छिंदवाड़ा
Published by: छिंदवाड़ा ब्यूरो
Updated Sat, 28 Mar 2026 08:41 AM IST
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सार
छिंदवाड़ा बस हादसे में नाना खेमराज डेहरिया और उनके 5 साल के नाती वंश की दर्दनाक मौत ने सभी को झकझोर दिया। हादसे के दिन वंश ने नाना के साथ जाने की जिद की थी। इसके बाद दोनों की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। परिवार ने दोनों का अंतिम संस्कार एक ही चिता पर किया। परिवार ने ऐसा करके माना कि वे दोनों सदैव साथ रहेंगे।
नाना-नाती का एक ही चिता पर हुआ अंतिम संस्कार।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
छिंदवाड़ा में हुए बस हादसे ने कई परिवारों को गहरा दुख दिया है। इस हादसे में बस चालक खेमराज डेहरिया और उनके 5 साल के नाती वंश की दर्दनाक मौत हो गई। दोनों की अंतिम विदाई के दौरान ऐसा भावुक दृश्य सामने आया, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं।
हर आंख हुई नम
पोस्टमार्टम के बाद जैसे ही खेमराज और वंश के शव घर पहुंचे, परिवार में मातम छा गया। 5 साल का वंश अपने नाना के बेहद करीब था और हर जगह उनके साथ जाने की जिद करता था। हादसे वाले दिन भी वह अपनी मां के साथ मंदिर जाने वाला था, लेकिन नाना के साथ जाने की जिद पर अड़ गया। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह उसका आखिरी सफर होगा।
नाना के साथ एक ही चिता पर वंश का अंतिम संस्कार
नाना और नाती के बीच गहरे लगाव को देखते हुए परिवार ने परंपरा तोड़ने का फैसला लिया। पांच साल के वंश को दफनाने के बजाय उसके नाना खेमराज डेहरिया के साथ ही एक ही चिता पर मुखाग्नि दी गई, ताकि दोनों हमेशा साथ रहें। जब पोस्टमार्टम के बाद दोनों के शव घर पहुंचे, तो परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि वंश का अंतिम संस्कार कैसे किया जाए। तभी वंश के दादा मोहन डेहरिया ने भावुक निर्णय लेते हुए कहा कि दोनों को अलग नहीं किया जाएगा। इसके बाद वंश को दफनाने की बजाय नाना के साथ ही चिता पर अंतिम संस्कार किया गया। बेटे का शव देखते ही पिता विजय बेहोश हो गए। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। ऐसे में बड़े पिता मोहित ने हिम्मत दिखाई। उन्होंने वंश को गोद में उठाकर चिता तक पहुंचाया और अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया पूरी की।
मां की पुकार: जूते भी नहीं पहनाए थे
मां निकिता का रो-रोकर बुरा हाल है। वह बार-बार उस पल को याद कर रही है, जब उसका बेटा आखिरी बार घर से बाहर गया था। निकिता कहती हैं कि उन्होंने उसे रोकने की कोशिश की थी, मंदिर साथ चलने को भी कहा था, लेकिन वह नहीं माना और अपने नाना के साथ ही चला गया। उस समय किसी को जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह उसकी जिंदगी का आखिरी सफर साबित होगा। मां की यह हालत और उनकी बातें सुनकर वहां मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो गया। मां की यह बात सुनकर वहां मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो गया। खेमराज रोज की तरह पुलिस लाइन में बस खड़ी कर घर लौटे थे। कुछ समय बाद उन्हें ग्रामीणों को छोड़ने के लिए फिर जाना था। इसी दौरान वंश ने उनके साथ जाने की जिद की। परिवार के लिए यह आम बात थी, क्योंकि वंश हमेशा अपने नाना के साथ ही रहता था। कई बार मामा करण उसे रोक लेते थे, लेकिन इस बार यह सोचकर नहीं रोका गया कि वे जल्दी लौट आएंगे। यही जिद दोनों के लिए आखिरी सफर बन गई।
पढे़ं: हमीदिया अस्पताल में लिफ्ट संकट पर ब्रेक, 24 लिफ्ट फिर चालू, लेकिन सिस्टम की पोल खुली
घर में आई नई खुशी, अचानक छाया मातम
डेहरिया परिवार में 1 माह 12 दिन पहले ही छोटे बेटे निशांत का जन्म हुआ था। पूरा परिवार उसकी देखभाल में लगा था। वहीं बड़ा बेटा वंश अपने नाना के बेहद करीब था। हर समय उनके साथ रहता था। गांव में भी दोनों के रिश्ते की मिसाल दी जाती थी।
मामा का दर्द: अगर रोक लेते तो…
मामा करण, जो अक्सर वंश को रोक लेते थे, इस बार खुद को माफ नहीं कर पा रहे हैं। वे बार-बार यही कह रहे हैं कि अगर उस दिन उसे रोक लिया होता तो शायद यह हादसा नहीं होता। जब नाना और नाती की चिता एक साथ जली, तो पूरा माहौल गमगीन हो गया। हर आंख नम थी और हर कोई इस दर्दनाक घटना से स्तब्ध था। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि रिश्तों की गहराई और प्रेम की ऐसी कहानी है, जिसने हर किसी को भीतर तक झकझोर दिया है।
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हर आंख हुई नम
पोस्टमार्टम के बाद जैसे ही खेमराज और वंश के शव घर पहुंचे, परिवार में मातम छा गया। 5 साल का वंश अपने नाना के बेहद करीब था और हर जगह उनके साथ जाने की जिद करता था। हादसे वाले दिन भी वह अपनी मां के साथ मंदिर जाने वाला था, लेकिन नाना के साथ जाने की जिद पर अड़ गया। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह उसका आखिरी सफर होगा।
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नाना के साथ एक ही चिता पर वंश का अंतिम संस्कार
नाना और नाती के बीच गहरे लगाव को देखते हुए परिवार ने परंपरा तोड़ने का फैसला लिया। पांच साल के वंश को दफनाने के बजाय उसके नाना खेमराज डेहरिया के साथ ही एक ही चिता पर मुखाग्नि दी गई, ताकि दोनों हमेशा साथ रहें। जब पोस्टमार्टम के बाद दोनों के शव घर पहुंचे, तो परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि वंश का अंतिम संस्कार कैसे किया जाए। तभी वंश के दादा मोहन डेहरिया ने भावुक निर्णय लेते हुए कहा कि दोनों को अलग नहीं किया जाएगा। इसके बाद वंश को दफनाने की बजाय नाना के साथ ही चिता पर अंतिम संस्कार किया गया। बेटे का शव देखते ही पिता विजय बेहोश हो गए। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। ऐसे में बड़े पिता मोहित ने हिम्मत दिखाई। उन्होंने वंश को गोद में उठाकर चिता तक पहुंचाया और अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया पूरी की।
मां की पुकार: जूते भी नहीं पहनाए थे
मां निकिता का रो-रोकर बुरा हाल है। वह बार-बार उस पल को याद कर रही है, जब उसका बेटा आखिरी बार घर से बाहर गया था। निकिता कहती हैं कि उन्होंने उसे रोकने की कोशिश की थी, मंदिर साथ चलने को भी कहा था, लेकिन वह नहीं माना और अपने नाना के साथ ही चला गया। उस समय किसी को जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह उसकी जिंदगी का आखिरी सफर साबित होगा। मां की यह हालत और उनकी बातें सुनकर वहां मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो गया। मां की यह बात सुनकर वहां मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो गया। खेमराज रोज की तरह पुलिस लाइन में बस खड़ी कर घर लौटे थे। कुछ समय बाद उन्हें ग्रामीणों को छोड़ने के लिए फिर जाना था। इसी दौरान वंश ने उनके साथ जाने की जिद की। परिवार के लिए यह आम बात थी, क्योंकि वंश हमेशा अपने नाना के साथ ही रहता था। कई बार मामा करण उसे रोक लेते थे, लेकिन इस बार यह सोचकर नहीं रोका गया कि वे जल्दी लौट आएंगे। यही जिद दोनों के लिए आखिरी सफर बन गई।
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घर में आई नई खुशी, अचानक छाया मातम
डेहरिया परिवार में 1 माह 12 दिन पहले ही छोटे बेटे निशांत का जन्म हुआ था। पूरा परिवार उसकी देखभाल में लगा था। वहीं बड़ा बेटा वंश अपने नाना के बेहद करीब था। हर समय उनके साथ रहता था। गांव में भी दोनों के रिश्ते की मिसाल दी जाती थी।
मामा का दर्द: अगर रोक लेते तो…
मामा करण, जो अक्सर वंश को रोक लेते थे, इस बार खुद को माफ नहीं कर पा रहे हैं। वे बार-बार यही कह रहे हैं कि अगर उस दिन उसे रोक लिया होता तो शायद यह हादसा नहीं होता। जब नाना और नाती की चिता एक साथ जली, तो पूरा माहौल गमगीन हो गया। हर आंख नम थी और हर कोई इस दर्दनाक घटना से स्तब्ध था। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि रिश्तों की गहराई और प्रेम की ऐसी कहानी है, जिसने हर किसी को भीतर तक झकझोर दिया है।

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