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Dhar News: कथित फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में परिवाद खारिज, कोर्ट ने नहीं पाया आपराधिक आधार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, धार
Published by: धार ब्यूरो
Updated Tue, 14 Apr 2026 08:27 AM IST
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सार
धार में नगर परिषद चुनाव से जुड़े कथित फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में न्यायालय ने परिवादी का परिवाद खारिज करते हुए प्रथम दृष्टया आपराधिक संज्ञान के पर्याप्त आधार नहीं पाए।
कोर्ट।
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
धार में नगर परिषद चुनाव से जुड़े कथित फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए परिवादी द्वारा दायर परिवाद को खारिज कर दिया है। नगर परिषद अध्यक्ष सवेरा महेश जायसवाल के अधिवक्ता दिनेश बैरागी ने बताया कि न्यायालय ने प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया किसी भी आपराधिक धाराओं के तहत संज्ञान लेने के पर्याप्त आधार नहीं पाए।
विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए गए
मामले में परिवादी वार्ड क्रमांक 12 पार्षद अंजली अजय जायसवाल की ओर से अधिवक्ता डीएस चौहान उपस्थित हुए, जबकि अभियुक्त नगर परिषद अध्यक्ष सवेरा महेश जायसवाल की ओर से अधिवक्ता दिनेश बैरागी ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान प्रकरण पंजीयन एवं आवेदन पर विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए गए। अभियुक्त पक्ष ने यह भी आवेदन दिया कि परिवाद दर्ज करने के पर्याप्त आधार नहीं हैं, जिस पर अदालत ने अलग से आदेश देने के बजाय मुख्य प्रकरण पर ही निर्णय दिया।
परिवादी ने लगाए ये आरोप
परिवादी अंजली जायसवाल ने आरोप लगाया था कि सवेरा जायसवाल ने नगर परिषद चुनाव 2022-23 में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नाम पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर चुनाव लड़ा और निर्वाचित हुई। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी में संबंधित प्रमाण पत्र का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने का दावा किया गया।
परिवादी पक्ष ने अपने समर्थन में स्वयं अंजली जायसवाल सहित अजय जायसवाल और जाति प्रमाण पत्र शाखा प्रभारी हेमंत खलिया के बयान प्रस्तुत किए। साक्षियों के अनुसार प्रस्तुत जाति प्रमाण पत्र का रिकॉर्ड शासकीय अभिलेखों में नहीं मिला और उसमें कई विसंगतियां पाई गईं।
न्यायालय ने अपने आदेश में जानें क्या स्पष्ट किया?
हालांकि, न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल मौखिक साक्ष्य या प्रारंभिक जांच के आधार पर किसी जाति प्रमाण पत्र को फर्जी घोषित नहीं किया जा सकता। इसके लिए सक्षम प्राधिकारी या राज्य स्तरीय जाति सत्यापन समिति द्वारा विधिवत जांच आवश्यक होती है। न्यायालय ने यह भी पाया कि परिवादी द्वारा ऐसी किसी सक्षम समिति में शिकायत या उसकी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई। साथ ही, धोखाधड़ी (धारा 420 भादंवि) के लिए आवश्यक तत्व भी साक्ष्यों से प्रमाणित नहीं हुए।
ये भी पढ़ें- MP News: नितिन गडकरी के अधिकारियों के निर्देश, सड़क सुरक्षा और ब्लैक स्पॉट का सुधार समय-सीमा में करें
अधिवक्ता दिनेश बैरागी ने सभी तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 467, 468, 471 के अंतर्गत संज्ञान लेने से इंकार करते हुए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 203 के तहत परिवाद को निराधार मानकर खारिज कर दिया। इधर, इस मामले में एडव्होकेट दिलीप चौहान ने कहा न्यायालय के आदेश से असंतुष्ट होकर अपर न्यायालय में रिवीजन पेश की जावेगी। न्यायालय द्वारा परिवारपत्र परिवादिया द्वारा कानून प्रक्रिया का पालन नहीं करने के कारण निरस्त हुआ है न्यायालय द्वारा अपने आदेश में नपा अध्यक्ष सवेरा महेश जायसवाल का जाति प्रमाण पत्र सत्य है या फर्जी इस पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है।
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विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए गए
मामले में परिवादी वार्ड क्रमांक 12 पार्षद अंजली अजय जायसवाल की ओर से अधिवक्ता डीएस चौहान उपस्थित हुए, जबकि अभियुक्त नगर परिषद अध्यक्ष सवेरा महेश जायसवाल की ओर से अधिवक्ता दिनेश बैरागी ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान प्रकरण पंजीयन एवं आवेदन पर विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए गए। अभियुक्त पक्ष ने यह भी आवेदन दिया कि परिवाद दर्ज करने के पर्याप्त आधार नहीं हैं, जिस पर अदालत ने अलग से आदेश देने के बजाय मुख्य प्रकरण पर ही निर्णय दिया।
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परिवादी ने लगाए ये आरोप
परिवादी अंजली जायसवाल ने आरोप लगाया था कि सवेरा जायसवाल ने नगर परिषद चुनाव 2022-23 में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नाम पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर चुनाव लड़ा और निर्वाचित हुई। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी में संबंधित प्रमाण पत्र का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने का दावा किया गया।
परिवादी पक्ष ने अपने समर्थन में स्वयं अंजली जायसवाल सहित अजय जायसवाल और जाति प्रमाण पत्र शाखा प्रभारी हेमंत खलिया के बयान प्रस्तुत किए। साक्षियों के अनुसार प्रस्तुत जाति प्रमाण पत्र का रिकॉर्ड शासकीय अभिलेखों में नहीं मिला और उसमें कई विसंगतियां पाई गईं।
न्यायालय ने अपने आदेश में जानें क्या स्पष्ट किया?
हालांकि, न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल मौखिक साक्ष्य या प्रारंभिक जांच के आधार पर किसी जाति प्रमाण पत्र को फर्जी घोषित नहीं किया जा सकता। इसके लिए सक्षम प्राधिकारी या राज्य स्तरीय जाति सत्यापन समिति द्वारा विधिवत जांच आवश्यक होती है। न्यायालय ने यह भी पाया कि परिवादी द्वारा ऐसी किसी सक्षम समिति में शिकायत या उसकी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई। साथ ही, धोखाधड़ी (धारा 420 भादंवि) के लिए आवश्यक तत्व भी साक्ष्यों से प्रमाणित नहीं हुए।
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अधिवक्ता दिनेश बैरागी ने सभी तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 467, 468, 471 के अंतर्गत संज्ञान लेने से इंकार करते हुए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 203 के तहत परिवाद को निराधार मानकर खारिज कर दिया। इधर, इस मामले में एडव्होकेट दिलीप चौहान ने कहा न्यायालय के आदेश से असंतुष्ट होकर अपर न्यायालय में रिवीजन पेश की जावेगी। न्यायालय द्वारा परिवारपत्र परिवादिया द्वारा कानून प्रक्रिया का पालन नहीं करने के कारण निरस्त हुआ है न्यायालय द्वारा अपने आदेश में नपा अध्यक्ष सवेरा महेश जायसवाल का जाति प्रमाण पत्र सत्य है या फर्जी इस पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है।

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