MP News: विदिशा का कालादेव...जहां दशहरे पर रावण का दहन नहीं, पूजा होती है; गांव बना आकर्षण का केंद्र
Bihar: गांव के बुजुर्गों के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत कई सौ साल पहले हुई थी। कहा जाता है कि टोंक रियासत के नवाब ने इसकी सच्चाई परखने के लिए अपने सैनिकों को रावण दल में शामिल किया और राम दल पर बंदूक से गोलियां चलवाईं। पढ़ें पूरी खबर
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विदिशा जिले की लटेरी तहसील का कालादेव गांव अपनी अनोखी दशहरा परंपरा के लिए पूरे क्षेत्र में चर्चित है। जहां देशभर में दशहरे पर रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव मनाया जाता है, वहीं कालादेव में रावण की पूजा की जाती है। यही वजह है कि यह गांव हर साल हजारों श्रद्धालुओं और दर्शकों का आकर्षण बनता है।
गांव के बुजुर्गों के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत कई सौ साल पहले हुई थी। कहा जाता है कि टोंक रियासत के नवाब ने इसकी सच्चाई परखने के लिए अपने सैनिकों को रावण दल में शामिल किया और राम दल पर बंदूक से गोलियां चलवाईं। लेकिन चमत्कारिक रूप से कोई भी गोली राम दल को नहीं लगी। इसके बाद नवाब ने इस परंपरा की सत्यता को स्वीकार कर ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि यह आयोजन सुरक्षित है। तभी से यह परंपरा आज तक चली आ रही है।
ऐसे होता है आयोजन
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इस परंपरा में रावण दल की भूमिका आदिवासी, भील और बंजारा समाज निभाते हैं, जो गोफन से निशाना लगाने में माहिर होते हैं। बावजूद इसके वे राम दल को कभी चोट नहीं पहुंचा पाते। पूरे आयोजन की शुरुआत रामलीला से होती है, जिसमें आदिवासी कलाकार भगवान राम और रावण की लीला का मंचन करते हैं। जब राम दल विजय प्राप्त करता है, तो गांवभर में उत्सव मनाया जाता है और एक-दूसरे को दशहरे की शुभकामनाएं दी जाती हैं। खास बात यह है कि इस दिन रावण की पूजा भी की जाती है।
संस्कृति और एकता का प्रतीक
कालादेव गांव का यह अनूठा दशहरा केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि गांव की संस्कृति, एकता और भाईचारे का प्रतीक भी है। आसपास के जिलों से हजारों लोग इस आयोजन को देखने आते हैं। बड़ी भीड़ को देखते हुए पुलिस प्रशासन भी सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था करता है।

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