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Ujjain: 'गुरुपूर्णिमा केवल गुरु वंदन नहीं, आत्ममूल्यांकन का भी पर्व है', कृष्णकांत मिश्रा ने दिया बड़ा संदेश
Sat, 04 Jul 2026 12:58 PM IST
तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी
Updated Sat, 04 Jul 2026 12:58 PM IST
सार
अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक चिंतक कृष्णकांत मिश्रा 'कृष्णा गुरुजी' ने कहा कि गुरुपूर्णिमा केवल गुरु वंदन का पर्व नहीं, बल्कि जीवन में मार्गदर्शन देने वाले हर व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और आत्ममूल्यांकन का अवसर है। उन्होंने गुरुपूर्णिमा के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला।
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आध्यात्मिक चिंतक व दिव्य एस्ट्रो हीलिंग के संस्थापक कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
गुरुपूर्णिमा का वास्तविक उद्देश्य केवल आश्रमों में जाकर गुरु वंदन करना नहीं, बल्कि जीवन में मार्गदर्शन देने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और स्वयं का आत्ममूल्यांकन करना है। यह बात उज्जैन में एक कार्यक्रम के दौरान आध्यात्मिक चिंतक व दिव्य एस्ट्रो हीलिंग के संस्थापक कृष्णकांत मिश्रा ‘कृष्णा गुरुजी’ ने कही है।
उन्होंने बताया कि गुरुपूर्णिमा, जिसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक है। मान्यता है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था, जिन्होंने वेदों का संकलन और महाभारत जैसे महान ग्रंथों की रचना की। इसी कारण उन्हें आदिगुरु मानकर यह दिवस मनाया जाता है।
'प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता का संचार करना ही सच्ची गुरुपूर्णिमा'
कृष्णा गुरुजी ने समाज से आह्वान किया कि गुरुपूर्णिमा को केवल व्यक्ति-पूजा तक सीमित न रखकर इसे कृतज्ञता, आत्मचिंतन और मार्गदर्शक दिवस के रूप में मनाया जाए।
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उन्होंने कहा कि जहां अज्ञानता है, वहां ज्ञान का दीप जलाना और जहां नकारात्मकता है, वहां प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता का संचार करना ही सच्ची गुरुपूर्णिमा है। गुरु का सम्मान केवल चरण स्पर्श से नहीं, बल्कि उनके ज्ञान को जीवन में उतारने से होता है।
कृष्णा गुरुजी ने कहा कि प्राचीन भारत में राजा और सामान्य परिवारों के बच्चे एक साथ गुरुकुलों में शिक्षा ग्रहण करते थे। माता-पिता अपने बच्चों को गुरु के संरक्षण में सौंपते हुए उन्हें जीवन का वास्तविक मार्गदर्शक मानते थे। वर्ष में एक बार गुरुपूर्णिमा के अवसर पर परिवारजन गुरुकुल पहुँचकर गुरु का सम्मान करते, फल-फूल और दक्षिणा अर्पित करते तथा अपने बच्चों के ज्ञान, आचरण और प्रगति का आकलन करते थे। उस समय गुरुपूर्णिमा केवल पूजा का नहीं, बल्कि शिष्य के वार्षिक मूल्यांकन और कृतज्ञता का पर्व हुआ करती थी।
'गुरुपूर्णिमा के मूल भाव को समयानुकूल समझने की आवश्यकता'
गुरुवंदना का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका भाव यह है कि गुरु ब्रह्मा के समान ज्ञान और संस्कारों का सृजन करते हैं, विष्णु के समान उनका पालन-पोषण करते हैं तथा महेश के समान अज्ञान, अहंकार और नकारात्मकता का नाश करते हैं। ऐसे गुरु-तत्त्व को नमन करना भारतीय संस्कृति की महान परंपरा रही है। आज के कलियुग में शिक्षा का स्वरूप बदल चुका है। बच्चे गुरुकुलों के बजाय आधुनिक विद्यालयों, कॉन्वेंट स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे में गुरुपूर्णिमा के मूल भाव को समयानुकूल समझने और आत्मसात करने की आवश्यकता है।
ये भी पढ़ें- MP Weather Today: मध्यप्रदेश में मानसून ने पकड़ी रफ्तार, 19 जिलों में आज भारी बारिश का अलर्ट, नदी-नाले उफान पर
कृष्णा गुरुजी ने कहा कि अधिकांश लोग मानते हैं कि गुरु आश्रम में या केवल शरीर में बसता है, लेकिन मेरा मानना है कि गुरु अपनी वाणी, विचार और ज्ञान में बसता है। जो व्यक्ति अपने विवेक के साथ उस ज्ञान को जीवन में उतारता है, वही सच्चा शिष्य बनता है। उन्होंने कहा कि केवल एक दिन गुरु को प्रणाम करना ही गुरुपूर्णिमा नहीं है, बल्कि पूरे वर्ष यह आत्ममंथन करना भी आवश्यक है कि हमने अपने मार्गदर्शकों से कितना सीखा और उस ज्ञान को अपने जीवन में कितना अपनाया।
'गुरुपूर्णिमा को 'मार्गदर्शक दिवस' के रूप में मना रहे'
कृष्णा गुरुजी ने बताया कि वे विगत पांच वर्षों से गुरुपूर्णिमा को 'मार्गदर्शक दिवस' के रूप में मना रहे हैं। इस अवसर पर जेलों में कार्यक्रम आयोजित करने का उद्देश्य उन लोगों के जीवन में ज्ञान, सकारात्मकता और आत्मविश्वास का प्रकाश पहुँचाना है, जहां अज्ञान, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और निराशा का अंधकार है। उन्होंने कहा कि माता-पिता, शिक्षक, चिकित्सक, मित्र, सहकर्मी और विषम परिस्थितियों में सही दिशा दिखाने वाले सभी लोग हमारे मार्गदर्शक हैं तथा गुरुपूर्णिमा उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी पर्व होना चाहिए।
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उन्होंने बताया कि गुरुपूर्णिमा, जिसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक है। मान्यता है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था, जिन्होंने वेदों का संकलन और महाभारत जैसे महान ग्रंथों की रचना की। इसी कारण उन्हें आदिगुरु मानकर यह दिवस मनाया जाता है।
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'प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता का संचार करना ही सच्ची गुरुपूर्णिमा'
कृष्णा गुरुजी ने समाज से आह्वान किया कि गुरुपूर्णिमा को केवल व्यक्ति-पूजा तक सीमित न रखकर इसे कृतज्ञता, आत्मचिंतन और मार्गदर्शक दिवस के रूप में मनाया जाए।
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उन्होंने कहा कि जहां अज्ञानता है, वहां ज्ञान का दीप जलाना और जहां नकारात्मकता है, वहां प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता का संचार करना ही सच्ची गुरुपूर्णिमा है। गुरु का सम्मान केवल चरण स्पर्श से नहीं, बल्कि उनके ज्ञान को जीवन में उतारने से होता है।
कृष्णा गुरुजी ने कहा कि प्राचीन भारत में राजा और सामान्य परिवारों के बच्चे एक साथ गुरुकुलों में शिक्षा ग्रहण करते थे। माता-पिता अपने बच्चों को गुरु के संरक्षण में सौंपते हुए उन्हें जीवन का वास्तविक मार्गदर्शक मानते थे। वर्ष में एक बार गुरुपूर्णिमा के अवसर पर परिवारजन गुरुकुल पहुँचकर गुरु का सम्मान करते, फल-फूल और दक्षिणा अर्पित करते तथा अपने बच्चों के ज्ञान, आचरण और प्रगति का आकलन करते थे। उस समय गुरुपूर्णिमा केवल पूजा का नहीं, बल्कि शिष्य के वार्षिक मूल्यांकन और कृतज्ञता का पर्व हुआ करती थी।
'गुरुपूर्णिमा के मूल भाव को समयानुकूल समझने की आवश्यकता'
गुरुवंदना का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका भाव यह है कि गुरु ब्रह्मा के समान ज्ञान और संस्कारों का सृजन करते हैं, विष्णु के समान उनका पालन-पोषण करते हैं तथा महेश के समान अज्ञान, अहंकार और नकारात्मकता का नाश करते हैं। ऐसे गुरु-तत्त्व को नमन करना भारतीय संस्कृति की महान परंपरा रही है। आज के कलियुग में शिक्षा का स्वरूप बदल चुका है। बच्चे गुरुकुलों के बजाय आधुनिक विद्यालयों, कॉन्वेंट स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे में गुरुपूर्णिमा के मूल भाव को समयानुकूल समझने और आत्मसात करने की आवश्यकता है।
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कृष्णा गुरुजी ने कहा कि अधिकांश लोग मानते हैं कि गुरु आश्रम में या केवल शरीर में बसता है, लेकिन मेरा मानना है कि गुरु अपनी वाणी, विचार और ज्ञान में बसता है। जो व्यक्ति अपने विवेक के साथ उस ज्ञान को जीवन में उतारता है, वही सच्चा शिष्य बनता है। उन्होंने कहा कि केवल एक दिन गुरु को प्रणाम करना ही गुरुपूर्णिमा नहीं है, बल्कि पूरे वर्ष यह आत्ममंथन करना भी आवश्यक है कि हमने अपने मार्गदर्शकों से कितना सीखा और उस ज्ञान को अपने जीवन में कितना अपनाया।
'गुरुपूर्णिमा को 'मार्गदर्शक दिवस' के रूप में मना रहे'
कृष्णा गुरुजी ने बताया कि वे विगत पांच वर्षों से गुरुपूर्णिमा को 'मार्गदर्शक दिवस' के रूप में मना रहे हैं। इस अवसर पर जेलों में कार्यक्रम आयोजित करने का उद्देश्य उन लोगों के जीवन में ज्ञान, सकारात्मकता और आत्मविश्वास का प्रकाश पहुँचाना है, जहां अज्ञान, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और निराशा का अंधकार है। उन्होंने कहा कि माता-पिता, शिक्षक, चिकित्सक, मित्र, सहकर्मी और विषम परिस्थितियों में सही दिशा दिखाने वाले सभी लोग हमारे मार्गदर्शक हैं तथा गुरुपूर्णिमा उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी पर्व होना चाहिए।
