Gwalior: पीएम की मिमिक्री करने वाले शिक्षक के सस्पेंशन पर रोक, कोर्ट ने कहा- दबाव में कार्रवाई न करें अधिकारी
मध्यप्रदेश के एक शासकीय शिक्षक को एलपीजी पर पीएम मोदी की मिमिक्री करने का वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करने पर निलंबित कर दिया गया, लेकिन ग्वालियर हाईकोर्ट ने शिक्षक के निलंबन पर रोक लगा दी है।
विस्तार
मध्यप्रदेश के एक शासकीय शिक्षक को एलपीजी संकट पर प्रधानमंत्री की मिमिक्री करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के मामले में निलंबित कर दिया गया था। हालांकि, ग्वालियर हाईकोर्ट ने इस निलंबन पर रोक लगा दी है। साथ ही सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि कोई भी अधिकारी बिना विचार किए या बाहरी दबाव में आकर केवल अपने अधिकार क्षेत्र के आधार पर ऐसी कार्रवाई नहीं कर सकता।
12 मार्च को शिवपुरी जिले के पोहरी विकासखंड में पदस्थ शासकीय शिक्षक साकेत पुरोहित ने गैस संकट के दौरान की परिस्थितियों पर प्रधानमंत्री की मिमिक्री करते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया था। इसके अगले ही दिन जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ने उन्हें निलंबित कर दिया। निलंबन आदेश में कहा गया था कि उनके इस कृत्य से विभाग की छवि धूमिल हुई है।
साकेत पुरोहित ने इस निलंबन आदेश को ग्वालियर हाईकोर्ट में चुनौती दी। गुरुवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने निलंबन पर रोक लगा दी। शिक्षक की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता कृष्ण कार्तिकेय शर्मा ने बताया कि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निलंबन की कार्रवाई केवल अधिकार होने के आधार पर नहीं की जा सकती, बल्कि यह देखना आवश्यक है कि क्या संबंधित मामला वास्तव में निलंबन योग्य है और क्या निलंबन आवश्यक भी है।
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कोर्ट ने यह भी माना कि यह कार्रवाई जल्दबाजी में या किसी दबाव में की गई प्रतीत होती है। अधिवक्ता शर्मा के अनुसार, इस मामले में शिकायतकर्ता पिछोर के विधायक प्रीतम लोधी थे, जिनकी शिकायत पर यह कार्रवाई हुई। शिक्षक ने 12 मार्च को वीडियो अपलोड किया और 13 मार्च को ही उन्हें निलंबन आदेश जारी कर दिया गया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि अधिकारियों को बाहरी दबाव में नहीं आना चाहिए और निलंबन से पहले तथ्यों का समुचित परीक्षण करना आवश्यक है। केवल किसी जनप्रतिनिधि की शिकायत के आधार पर तत्काल निलंबन उचित नहीं है; यह निर्णय अधिकारी के विवेक पर आधारित होना चाहिए।
अधिवक्ता के मुताबिक, विधायक प्रीतम लोधी की शिकायत राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रेरित थी। शिकायत में याचिकाकर्ता को “कांग्रेसी मानसिकता” वाला व्यक्ति बताया गया था। यह तथ्य भी कोर्ट के संज्ञान में लाया गया, जिसका उल्लेख सुनवाई के दौरान किया गया।
कोर्ट ने अपने निर्णय में दोहराया कि अधिकारियों के पास निलंबन की शक्ति अवश्य होती है, लेकिन इसका उपयोग सावधानी और तार्किक आधार पर ही किया जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि निलंबन आमतौर पर तभी किया जाना चाहिए जब गंभीर आरोप हों, जिनमें कड़ी सजा की संभावना हो या कर्मचारी की उपस्थिति से जांच प्रभावित होने की आशंका हो। बिना सोचे-समझे या नियमित रूप से किया गया निलंबन स्वीकार्य नहीं है।

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