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हिंदू नववर्ष: होलकर रियासत में उत्सव की तरह मनाया जाता था गुड़ी पड़वा पर्व, जानें कैसी होती थीं तब की तैयारियां

Kamlesh Sen कमलेश सेन
Updated Thu, 19 Mar 2026 08:07 PM IST
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सार

इंदौर में गुड़ी पड़वा होलकर रियासत काल में राजकीय उत्सव की तरह मनाया जाता था। राजबाड़ा में भव्य तैयारियां, जुलूस, पूजन, तोपों की सलामी और सम्मान समारोह होते थे। महाराजा परंपरागत रीति से नववर्ष का स्वागत करते और जनता भी उत्सव में शामिल होती थी।

Hindu New Year: Gudi Padwa was celebrated like a festival in Holkar state, learn about preparations back then
इंदौर में गुड़ी सजाते लोग - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

होलकर रियासत काल में इंदौर में गुड़ी पड़वा यानी हिंदू नववर्ष की शुरुआत का पर्व उत्सव की तरह धूमधाम से मनाया जाता था। 1732 में इंदौर कस्बा होलकर राज्य के मल्हारराव होल्कर को पेशवा द्वारा जागीर में प्राप्त होने के बाद उन्होंने इंदौर को राज्य की गतिविधियों का केंद्र बनाना आरंभ किया था। परंतु इंदौर का सर्वाधिक विकास 1818 में राजधानी बनने के बाद हुआ। चूंकि होलकर मराठा थे और महाराष्ट्र से जुड़े थे, इसलिए सामाजिक रीति रिवाज और संस्कृति में इंदौर पर महाराष्ट्र का प्रभाव था।  
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गुड़ी पड़वा चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है,  इसी दिन से नए पंचांग और नववर्ष का आरंभ माना जाता है।   यह पर्व मुख्य रूप से इस बात का प्रतीक है कि हिंदू नव वर्ष आरंभ हो गया है। गुड़ी पड़वा पर सुबह जल्दी घर के मुख्य द्वार पर विजय पताका (गुड़ी) फहराकर पारंपरिक तरीके और उल्लास से यह पर्व मनाया जाता है। यह पर्व महाराष्ट्रीयन परिवारों द्वारा ही नहीं वरन सभी समुदाय के लोगों द्वारा नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। इसे मनाए जाने के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीके हैं। राज्य भवन पर भव्य गुड़ी बांधी जाती थी।
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ऐसे होती थी तैयारियां 
गुड़ी पड़वा होलकर रियासत में राजकीय उत्सव के रूप में मनाया जाता था। राजबाड़े के निर्माण के पहले यह कंपेल और महेश्वर में बड़े भव्य स्तर पर मनाया जाता था। इंदौर में छोटे स्तर पर आयोजित होता था। राजबाड़े के निर्माण के बाद गुड़ी पड़वा के आगमन के पहले से राजबाड़े की रंगाई पुताई, गणेश हॉल, दरबार हाल सज्जा और राजबाड़े के सामने मैदान में भव्य तैयारियां आरंभ हो जाती थी। गुड़ी पड़वा के दिन और उसके पूर्व से सड़कों की सफाई कर  उन्हें धोया जाता था। टैंकरों से पानी का छिड़काव किया जाता था। 

बग्घी में बैठकर आते थे महाराजा 
महाराजा होलकर बग्घी में विराजित होकर आते थे। साथ में होलकर सेना का बैंड, इंपीरियल सर्विस केवलरी, लोकवाद्य, हलकारे, सोने के छड़ी लेकर चलने वाले चोपदार, सरदार अधिकारी, पुलिस सभी गणमान्य गण जुलूस के साथ चलते थे। नगर की जनता द्वारा महाराजा का अभिवादन किया जाता था। राजबाड़े आगमन पर महराजा को गॉड आफ ऑनर दिया जाता था। दरबार हॉल में राज्य ज्योतिषी और राज पुरोहित द्वारा गणेश पूजन करवा कर उत्सव का आरंभ होता था।   

होलकर राजा कुलदेवता मल्हारी मार्तंड का पूजन करते थे, जो राज्य की विशिष्ट हाथी थे, उन्हें आभूषणों से सु-सज्जित किया जाता था। नव वर्ष के दिन ये हाथी राजा का अभिवादन करते थे। इस दिन राजा तोप का भी पूजन करते थे। राजा सभी का अभिवादन करते हुए महल में प्रवेश करते थे।

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अहिल्या बाई की गादी का पूजन 
नववर्ष के दिन महाराजा दरबार हाल में पहुंचते थे। देवी अहिल्या की गादी का पूजन भी करते थे, फिर राज गादी का पूजन करते थे। इसके पश्चात पांच तोपों की सलामी दी जाती थी। महाराजा आसान ग्रहण करने के बाद राज्य ज्योतिषी नववर्ष का फलित सुनाते थे। फिर क्रम से राजा को नववर्ष की बधाई दी जाती थी।  

सम्मान समारोह होता था 
नव वर्ष के दिन राज दरबार में विद्वान और अलग-अलग क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वालों का सम्मान किया जाता था। इन्हें सम्मान पत्र, नकदी आदि चीजों से राजा सम्मानित करते थे। नव वर्ष के दूसरे दिन भोज का आयोजन होता था और 21 तोपों की सलामी दी जाती थी, जिसमें राज्य के प्रमुख लोग सम्मिलित होते थे।

 
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