आय से अधिक संपत्ति केस: पत्नी की निजी आय को पति की आय में नहीं जोड़ सकती जांच एजेंसी, हाईकोर्ट का अहम फैसला
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति मामले में अहम फैसला देते हुए कहा कि जांच एजेंसी पत्नी की व्यक्तिगत व वैध आय को पति की आय में नहीं जोड़ सकती। अदालत ने अभियोजन स्वीकृति और आगे की कार्रवाई रद्द कर दी।
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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति के मामलों में एक अहम फैसला देते हुए कहा है कि जांच एजेंसी सरकारी विभाग में पदस्थ पति की आय के आकलन में उसकी पत्नी की व्यक्तिगत एवं वैध आय को नहीं जोड़ सकती। हाईकोर्ट की युगलपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी शामिल थे, ने अभियोजन स्वीकृति आदेश और उससे संबंधित आगे की पूरी कार्रवाई को निरस्त कर दिया।
यह आदेश अधिवक्ता मीनाक्षी खरे और उनके पति, आबकारी विभाग में पदस्थ डिप्टी कमिश्नर आलोक खरे द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया गया। याचिका में आय से अधिक संपत्ति के गलत आकलन और उनके विरुद्ध अभियोजन की स्वीकृति को चुनौती दी गई थी।
याचिका में बताया गया कि मीनाक्षी खरे पेशे से अधिवक्ता हैं और विवाह से पूर्व से ही नियमित रूप से आयकर रिटर्न दाखिल करती आ रही हैं। लोकायुक्त संगठन ने वर्ष 2018 में आलोक खरे के निवास और कार्यालय में छापेमारी की थी। जांच के दौरान 4 सितंबर 1998 से 15 अक्टूबर 2019 की अवधि की आय, संपत्ति और व्यय से संबंधित आंकड़े एकत्र किए गए।
लोकायुक्त के अनुसार, जांच में याचिकाकर्ताओं के पास वैध आय से लगभग 88.20 प्रतिशत अधिक संपत्ति पाई गई और इसके आधार पर दोनों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज कर अभियोजन की स्वीकृति प्राप्त की गई।
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याचिका में यह भी कहा गया कि लोकायुक्त ने अधिवक्ता पत्नी की स्वतंत्र और वैध आय को पति की आय में जोड़कर असेसमेंट किया, जो कानूनन गलत है। लोकायुक्त के अनुसार कुल संपत्ति 10 करोड़ 71 लाख रुपये दर्शाई गई, जबकि वैध आय 5 करोड़ 69 लाख रुपये बताई गई थी। जबकि वास्तविकता यह थी कि मीनाक्षी खरे की अधिवक्ता के रूप में पर्याप्त आय थी और उन्होंने अपनी आय से कृषि भूमि क्रय की, जिससे जांच अवधि के दौरान लगभग 4 करोड़ 81 लाख रुपये की आय हुई।
यदि दोनों याचिकाकर्ताओं की वैध आय को पृथक-पृथक और सही तरीके से जोड़ा जाए, तो कुल वैध आय लगभग 10 करोड़ 50 लाख रुपये होती है, जो लोकायुक्त के आकलन से मात्र 21 लाख रुपये अधिक है। यह अंतर वैध आय के लगभग दो प्रतिशत के आसपास है। जबकि कानून के अनुसार, यदि वैध आय से 10 प्रतिशत से अधिक संपत्ति नहीं पाई जाती है, तो अभियोजन की अनुमति नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट की युगलपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ज्ञात आय स्रोत का अर्थ ऐसी आय से है, जो मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम 19 के अनुसार वैध रूप से अर्जित की गई हो। नियमित रूप से आयकर रिटर्न दाखिल कर सिद्ध की गई आय कानून की दृष्टि में ज्ञात और वैध आय मानी जाएगी।
अदालत ने यह भी कहा कि महिला अधिवक्ता की आय और कृषि से प्राप्त आय को ध्यान में रखते हुए अभियोजन की स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए थी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अभियोजन स्वीकृति का विवादित आदेश तथा उससे जुड़ी आगे की समस्त कार्रवाई को रद्द कर दिया।

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