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MP: आलीराजपुर में दिवासा पर्व की धूम, पारंपरिक वेशभूषा में थिरके ग्रामीण; सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना

Sat, 08 Aug 2026 05:46 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आलीराजपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आलीराजपुर Published by: शबाहत हुसैन Updated Sat, 08 Aug 2026 05:46 PM IST
सार

आलीराजपुर जिले के ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में दिवासा पर्व उत्साह से मनाया गया। ग्राम देवता की पूजा, मांदल-ढोल की थाप पर लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा और स्थानीय व्यंजनों के साथ ग्रामीणों ने अच्छी बारिश, भरपूर फसल, सुख-समृद्धि और सामाजिक एकता की कामना की।

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MP: Divasa festival celebrated with great enthusiasm in Alirajpur villagers danced in traditional attire news
दिवासा पर्व बना आदिवासी संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आलीराजपुर जिले के ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में इन दिनों पारंपरिक दिवासा पर्व की धूम देखने को मिल रही है। नानपुर सहित आसपास के गांवों में आदिवासी समाज के लोग आस्था, उल्लास और अपनी समृद्ध लोक संस्कृति के साथ यह पर्व मना रहे हैं। बारिश के मौसम में चारों ओर फैली हरियाली और खेतों में लहलहाती फसलों के बीच गांवों का माहौल लोकगीतों, मांदल और ढोल की थाप से गूंज रहा है।

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ग्राम देवता की पूजा कर मांगी खुशहाली
दिवासा पर्व को लेकर ग्रामीणों में विशेष उत्साह रहता है। सुबह से ही घरों और गांवों में ग्राम देवता और बाबा देव की पूजा-अर्चना की जाती है। नारियल, धूप, दीप और स्थानीय भोग अर्पित कर अच्छी बारिश, बेहतर फसल, परिवार की सुख-शांति तथा पशुधन की सुरक्षा की कामना की जाती है। कई स्थानों पर स्थानीय परंपराओं के अनुसार मुर्गे और बकरे की बलि देने की परंपरा भी निभाई जाती है।

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मांदल की थाप पर लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा बनी आकर्षण
पर्व के दौरान पुरुष, महिलाएं और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा पहनकर आयोजनों में शामिल होते हैं। मांदल, ढोल और बांसुरी की धुन पर युवक-युवतियां सामूहिक लोकगीत और लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं, जिससे गांवों का वातावरण पूरी तरह उत्सवमय हो जाता है।

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घरों में बनते हैं पारंपरिक पकवान
दिवासा पर्व पर घरों में विशेष पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। बेसन और विभिन्न दालों से तैयार बड़े, ताये, भजिए सहित कई स्थानीय पकवान इस अवसर पर बनाए जाते हैं। रिश्तेदारों, मित्रों और पड़ोसियों के घर जाकर शुभकामनाएं देने तथा साथ बैठकर पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेने की परंपरा भी इस पर्व को विशेष बनाती है।

अलग-अलग गांवों में अलग दिन मनाने की परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार दिवासा पर्व की तिथि गांव के वरिष्ठजन, पटेल और तड़वी की सहमति से तय की जाती है। खास बात यह है कि जिले के अलग-अलग गांवों में यह पर्व अलग-अलग दिनों में मनाया जाता है। इसके पीछे सामाजिक परंपरा यह है कि कई परिवारों और रिश्तेदारों के सदस्य अलग-अलग गांवों में रहते हैं। अलग-अलग तिथियों पर पर्व होने से वे सभी गांवों के आयोजनों में शामिल हो पाते हैं।

नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ रहा पर्व
ग्रामीणों का कहना है कि दिवासा पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, भाईचारे और आदिवासी संस्कृति की पहचान भी है। आधुनिक दौर में युवा शिक्षा और रोजगार के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं। ऐसे में ऐसे पारंपरिक पर्व उन्हें अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और गांव की जड़ों से जोड़ने का काम कर रहे हैं। इस वर्ष भी ग्रामीणों ने अच्छी बारिश, भरपूर कृषि उपज, सुख-शांति और समृद्धि की कामना के साथ दिवासा पर्व हर्षोल्लास से मनाया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी की भागीदारी ने आदिवासी लोक संस्कृति की इस समृद्ध परंपरा को जीवंत बनाए रखा।

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