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Sehore News: सत्य साई यूनिवर्सिटी में SOG का छापा, पीटीआई भर्ती से जुड़ी 67 फर्जी डिग्रियों का खुलासा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
Published by: सीहोर ब्यूरो
Updated Thu, 22 Jan 2026 12:43 PM IST
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सार
सीहोर स्थित सत्य साई यूनिवर्सिटी में राजस्थान SOG की जांच में 2020 की पीटीआई भर्ती से जुड़ी 67 फर्जी डिग्रियों का खुलासा हुआ है। जांच में बैकडेट प्रमाणपत्र, रिकॉर्ड में गड़बड़ी और दस्तावेज न देने के गंभीर आरोप सामने आए हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं।
सत्य साई यूनीवर्सिटी।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सीहोर जिले के भोपाल रोड पर स्थित सत्य साई यूनिवर्सिटी बुधवार शाम अचानक जांच एजेंसियों की गतिविधियों से गूंज उठी। राजस्थान स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) की टीम ने जब विश्वविद्यालय परिसर में कदम रखा, तो माहौल एकाएक सन्नाटे में बदल गया। दफ्तरों में रखे दस्तावेज, रजिस्टर और फाइलें जांच के घेरे में आ गईं। यह कोई सामान्य औपचारिक जांच नहीं थी, बल्कि उस घाव को खोलने वाली कार्रवाई थी, जो वर्षों से व्यवस्था के भीतर छिपा हुआ था।
पीटीआई भर्ती और फर्जी डिग्रियों का सच
जांच के दौरान सामने आया कि राजस्थान में वर्ष 2020 की पीटीआई भर्ती में शामिल 67 अभ्यर्थियों ने जिन डिग्रियों के आधार पर नौकरी हासिल की वे डिग्रियां फर्जी थीं। इन प्रमाणपत्रों का स्रोत सत्य साई यूनिवर्सिटी बताया गया। जिस शिक्षा को युवाओं का भविष्य गढ़ना था, वही शिक्षा यहां धोखे का माध्यम बनती दिखी। राजस्थान SOG के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजेश मेश्राम ने जांच में मिले तथ्यों को गंभीर बताया। उनके अनुसार डिग्रियां बैक डेट में तैयार की गई थीं, ताकि भर्ती की समयसीमा में वे वैध दिख सकें। जब टीम ने रिकॉर्ड का मिलान किया, तो दस्तावेज एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे थे। तारीखें, रजिस्ट्रेशन नंबर और विद्यार्थियों का विवरणश, सब कुछ सवालों के घेरे में था, मानो सच को जानबूझकर धुंधला किया गया हो।
प्रबंधन का पक्ष और उलझते सवाल
शुरुआत में यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने इस पूरी कार्रवाई को सामान्य जांच बताने की कोशिश की। प्रबंधन से जुड़े मुकेश तिवारी और अंकित जोशी ने कहा कि राजस्थान से आई टीम कुछ विद्यार्थियों के दस्तावेजों का वेरिफिकेशन कर रही है, लेकिन जब पूछा गया कि राजस्थान की टीम मध्य प्रदेश की यूनिवर्सिटी में किस अधिकार से जांच कर रही है, तो स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। यहीं से संदेह और गहरा हो गया।
ये भी पढ़ें- Dhar Bhojshala: बसंत पंचमी और जुमे की नमाज के बीच धार के धैर्य की परीक्षा, इतिहास के कड़वे जख्म बढ़ा रहे चिंता
रिकॉर्ड न देने की पुरानी कहानी
जांच में यह भी सामने आया कि राजस्थान सरकार पहले भी कई बार इन डिग्रियों से जुड़े रिकॉर्ड मांग चुकी थी। बावजूद इसके, विश्वविद्यालय ने दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए। यह चुप्पी खुद में एक बड़ा सवाल है। अगर सब कुछ सही था, तो रिकॉर्ड साझा करने से परहेज क्यों किया गया? इस टालमटोल ने जांच एजेंसियों को और सख्ती से कार्रवाई के लिए मजबूर किया।
शिक्षा व्यवस्था पर लगा गहरा दाग
यह मामला सिर्फ 67 फर्जी डिग्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सोच को उजागर करता है, जहां शिक्षा को सेवा नहीं, सौदा बना दिया गया। जिन युवाओं ने मेहनत और ईमानदारी से तैयारी की, उनके हक पर ऐसे फर्जीवाड़े ने चोट की है। SOG की यह कार्रवाई उम्मीद जगाती है कि सच सामने आएगा और दोषियों को सजा मिलेगी। लेकिन साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाती है। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था अब भी भरोसे के लायक है, या उसे बचाने के लिए और कड़े कदम जरूरी हैं?
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जांच के दौरान सामने आया कि राजस्थान में वर्ष 2020 की पीटीआई भर्ती में शामिल 67 अभ्यर्थियों ने जिन डिग्रियों के आधार पर नौकरी हासिल की वे डिग्रियां फर्जी थीं। इन प्रमाणपत्रों का स्रोत सत्य साई यूनिवर्सिटी बताया गया। जिस शिक्षा को युवाओं का भविष्य गढ़ना था, वही शिक्षा यहां धोखे का माध्यम बनती दिखी। राजस्थान SOG के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजेश मेश्राम ने जांच में मिले तथ्यों को गंभीर बताया। उनके अनुसार डिग्रियां बैक डेट में तैयार की गई थीं, ताकि भर्ती की समयसीमा में वे वैध दिख सकें। जब टीम ने रिकॉर्ड का मिलान किया, तो दस्तावेज एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे थे। तारीखें, रजिस्ट्रेशन नंबर और विद्यार्थियों का विवरणश, सब कुछ सवालों के घेरे में था, मानो सच को जानबूझकर धुंधला किया गया हो।
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शुरुआत में यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने इस पूरी कार्रवाई को सामान्य जांच बताने की कोशिश की। प्रबंधन से जुड़े मुकेश तिवारी और अंकित जोशी ने कहा कि राजस्थान से आई टीम कुछ विद्यार्थियों के दस्तावेजों का वेरिफिकेशन कर रही है, लेकिन जब पूछा गया कि राजस्थान की टीम मध्य प्रदेश की यूनिवर्सिटी में किस अधिकार से जांच कर रही है, तो स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। यहीं से संदेह और गहरा हो गया।
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रिकॉर्ड न देने की पुरानी कहानी
जांच में यह भी सामने आया कि राजस्थान सरकार पहले भी कई बार इन डिग्रियों से जुड़े रिकॉर्ड मांग चुकी थी। बावजूद इसके, विश्वविद्यालय ने दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए। यह चुप्पी खुद में एक बड़ा सवाल है। अगर सब कुछ सही था, तो रिकॉर्ड साझा करने से परहेज क्यों किया गया? इस टालमटोल ने जांच एजेंसियों को और सख्ती से कार्रवाई के लिए मजबूर किया।
शिक्षा व्यवस्था पर लगा गहरा दाग
यह मामला सिर्फ 67 फर्जी डिग्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सोच को उजागर करता है, जहां शिक्षा को सेवा नहीं, सौदा बना दिया गया। जिन युवाओं ने मेहनत और ईमानदारी से तैयारी की, उनके हक पर ऐसे फर्जीवाड़े ने चोट की है। SOG की यह कार्रवाई उम्मीद जगाती है कि सच सामने आएगा और दोषियों को सजा मिलेगी। लेकिन साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाती है। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था अब भी भरोसे के लायक है, या उसे बचाने के लिए और कड़े कदम जरूरी हैं?
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