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Sehore news: हक की जंग में उतरे स्वास्थ्य योद्धा, 502 कर्मचारियों की हड़ताल से महकमे में हड़कंप; जानें
Tue, 02 Jun 2026 05:09 PM IST
सीहोर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
Published by: सीहोर ब्यूरो
Updated Tue, 02 Jun 2026 05:09 PM IST
सार
कर्मचारियों का आरोप है कि उन्होंने अपनी मांगों को लेकर कई बार शासन और प्रशासन का दरवाजा खटखटाया। ज्ञापन दिए गए, निवेदन किए गए, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला।
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अधिकारों की लड़ाई में सड़कों पर उतरे स्वास्थ्य योद्धा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जिन कंधों पर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था टिकी हुई है, वही कर्मचारी अब अपने हक की लड़ाई के लिए मैदान में उतर आए हैं। माताओं और बच्चों की देखभाल से लेकर टीकाकरण और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी संभालने वाले एनएचएम के संविदा कर्मचारियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल का बिगुल फूंक दिया है। 502 कर्मचारियों के एक साथ आंदोलन में उतरने से स्वास्थ्य विभाग में हलचल मच गई है। कर्मचारियों का साफ कहना है कि अब आश्वासनों से काम नहीं चलेगा, अधिकार चाहिए तो संघर्ष भी होगा।
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नई टीम बनी, आंदोलन को मिली नई धार
एनएचएम संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी संघ की जिला एवं विकासखंड स्तरीय बैठक में संगठन का पुनर्गठन किया गया। सर्वसम्मति से हरिओम मेवाड़ा को जिलाध्यक्ष और रुचिरा उइके को जिला महिला अध्यक्ष चुना गया। नई कार्यकारिणी के गठन के साथ ही आंदोलन को नई दिशा और नई ताकत मिल गई है। बैठक में मौजूद कर्मचारियों ने संगठन की मजबूती और मांगों की लड़ाई को अंतिम मुकाम तक पहुंचाने का संकल्प लिया। पदाधिकारियों का कहना था कि अब कर्मचारी किसी भी कीमत पर पीछे हटने वाले नहीं हैं।
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स्वास्थ्य विभाग में बढ़ी चिंता, सेवाओं पर मंडराया संकट
सीहोर जिले में एनएचएम के अंतर्गत कार्यरत 502 संविदा कर्मचारी स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ माने जाते हैं। यही कर्मचारी टीकाकरण अभियान, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की योजनाओं और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को जमीन पर संचालित करते हैं। हड़ताल के कारण इन सेवाओं की रफ्तार थमने का खतरा पैदा हो गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है। स्वास्थ्य विभाग भी हालात पर नजर बनाए हुए है, क्योंकि बड़ी संख्या में कर्मचारियों के आंदोलन में शामिल होने से व्यवस्थाएं प्रभावित होना तय माना जा रहा है।
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वर्षों से दबा आक्रोश आखिर फूट पड़ा
कर्मचारियों का आरोप है कि उन्होंने अपनी मांगों को लेकर कई बार शासन और प्रशासन का दरवाजा खटखटाया। ज्ञापन दिए गए, निवेदन किए गए, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। वर्षों से लंबित मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं होने से कर्मचारियों का धैर्य जवाब दे गया। बैठक में वक्ताओं ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा दायित्व निभाने के बावजूद संविदा कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों जैसी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। यही असमानता अब आंदोलन का सबसे बड़ा कारण बन गई है।
इन मांगों को लेकर आर-पार की लड़ाई
आंदोलनकारी कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री की नियमितीकरण संबंधी घोषणा को तत्काल लागू करने, एनपीएस और स्वास्थ्य बीमा का लाभ देने, 10 प्रतिशत वार्षिक वेतन वृद्धि लागू करने और नियमित कर्मचारियों के समान महंगाई भत्ता देने की मांग उठाई है। इसके अलावा वेतन विसंगति दूर करने, समान कार्य के लिए समान वेतन लागू करने, नियमित कर्मचारियों जैसी अवकाश सुविधाएं देने तथा आउटसोर्सिंग व्यवस्था पर रोक लगाने की मांग भी प्रमुखता से रखी गई है। कर्मचारियों का कहना है कि जब जिम्मेदारियां समान हैं तो सुविधाओं में भेदभाव क्यों?
गूंजे एकता के नारे, संघर्ष जारी रखने का एलान
नवनियुक्त जिलाध्यक्ष हरिओम मेवाड़ा ने कहा कि कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए संघर्ष लगातार जारी रहेगा। वहीं जिला महिला अध्यक्ष रुचिरा उइके ने महिला कर्मचारियों से आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की। बैठक के अंत में संविदा एकता जिंदाबाद , अभी करो-अर्जेंट करो और कर्मचारियों की एकता के नारों से पूरा परिसर गूंज उठा। कर्मचारियों ने स्पष्ट संदेश दिया कि जब तक मांगों का समाधान नहीं होगा, तब तक यह लड़ाई थमने वाली नहीं है।
