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Sehore: अस्पताल ने मोड़ा मुंह, झोपड़ी में हुआ जन्म; जच्चा-बच्चा तो सुरक्षित हैं, लेकिन दम तोड़ गई इंसानियत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
Published by: सीहोर ब्यूरो
Updated Sat, 09 May 2026 02:19 PM IST
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सार
सीहोर जिले के सिद्धिकगंज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में लापरवाही का गंभीर मामला सामने आया है। प्रसव पीड़ा से तड़प रही महिला को अस्पताल में भर्ती करने के बजाय स्टाफ ने दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दे दी। मजबूरी में परिजनों ने अस्पताल के पीछे बनी झोपड़ी में गांव की महिलाओं की मदद से डिलीवरी कराई।
झोपड़ी में करानी पड़ी डिलीवरी, अस्पताल ने प्रसूता को लौटाया
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सीहोर जिले के सिद्धिकगंज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में स्वास्थ्य व्यवस्था की बेहद शर्मनाक तस्वीर सामने आई है। यहां प्रसव पीड़ा से कराहती महिला को अस्पताल में भर्ती करने के बजाय स्टाफ ने दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दे दी। हालात इतने खराब हो गए कि अस्पताल के पीछे बनी एक झोपड़ी में परिजनों और गांव की महिलाओं ने प्रसूता की डिलीवरी कराई। राहत की बात यह रही कि जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित हैं, लेकिन इस घटना ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलकर रख दी है।
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सुबह अस्पताल पहुंचे परिजन, नहीं मिला कोई सहारा
ग्राम श्यामपुर मगरदा निवासी दिनेश बारेला ने बताया कि उनकी पत्नी संजू को देर रात प्रसव पीड़ा शुरू हुई। सुबह करीब 5 से 6 बजे के बीच परिवार के लोग उसे लेकर सिद्धिकगंज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे। आरोप है कि उस समय अस्पताल में कोई स्वास्थ्य कर्मचारी मौजूद नहीं था। वहां मौजूद मरीजों ने बताया कि नर्स अस्पताल के बाहर बने कमरे में रहती है। परिजन नर्स को बुलाकर लाए तो उसने महिला की हालत देखने के बाद कहा कि डिलीवरी में अभी समय है और महिला के शरीर में आयरन और कैल्शियम की कमी है। इसके बाद नर्स ने महिला को आष्टा या दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दे दी।
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अस्पताल के पीछे झोपड़ी बनी प्रसूति कक्ष
इस दौरान प्रसूता दर्द से चीखती-बिलखती रही, लेकिन अस्पताल स्टाफ ने कोई मदद नहीं की। मजबूरी में परिजन महिला को अस्पताल के पीछे करीब 500 मीटर दूर रिश्तेदार की झोपड़ी में ले गए। वहां गांव की महिलाओं और रिश्तेदारों की मदद से सुबह करीब 7 से 7:30 बजे के बीच डिलीवरी कराई गई। झोपड़ी में नवजात बच्ची ने जन्म लिया। गनीमत रही कि मां और बच्ची दोनों सुरक्षित रहे, वरना यह लापरवाही बड़ा हादसा बन सकती थी।
डिलीवरी के बाद भी अस्पताल ने नहीं किया इलाज
परिजनों का आरोप है कि डिलीवरी के बाद वे महिला को इलाज और दवा दिलाने के लिए दोबारा अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन वहां मौजूद स्टाफ ने यह कहकर भगा दिया कि “डिलीवरी पहले अस्पताल में करानी थी, तभी शासन की योजनाओं का लाभ मिलता।” इस व्यवहार से परिजन नाराज हो गए। उनका कहना है कि अस्पताल इलाज देने के बजाय जिम्मेदारी से बचता नजर आया।
डिलीवरी के नाम पर पैसों की मांग के आरोप
ग्रामीणों और परिजनों ने अस्पताल स्टाफ पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डिलीवरी कराने के बाद पैसों की मांग की जाती है। कई बार मामूली स्थिति में भी मरीजों को आष्टा, सीहोर या देवास रेफर कर दिया जाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि अस्पताल में जिम्मेदार कर्मचारियों की मनमानी चल रही है और शिकायतों के बावजूद व्यवस्था में सुधार नहीं हो रहा।
60 से ज्यादा गांव इस अस्पताल पर निर्भर
सिद्धिकगंज क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य इलाका है, जहां करीब 60 से 70 गांव इस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर निर्भर हैं। यहां रोज प्रसव के कई मामले आते हैं, लेकिन अधिकांश गर्भवती महिलाओं को दूसरे अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि अस्पताल में केवल दो नर्सिंग स्टाफ हैं और वे भी डिलीवरी कराने से बचती हैं। संसाधनों और डॉक्टरों की कमी के कारण गरीब परिवारों को मजबूरी में निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है।
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स्वास्थ्य विभाग पर उठे सवाल, जांच के आदेश
घटना सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने जिम्मेदार कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि अगर समय रहते व्यवस्था नहीं सुधरी तो भविष्य में बड़ा हादसा हो सकता है। मामले को लेकर आष्टा बीएमओ अमित माथुर ने कहा कि उन्हें इस घटना की जानकारी नहीं थी। शिकायत मिलने के बाद पूरे मामले की जांच कराई जाएगी। जांच रिपोर्ट आने के बाद दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई की जाएगी।

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