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Swami Swaroopanand: नौ साल की उम्र में घर छोड़ा, आजादी के लिए दो बार जेल गए, 1981 में मिली थी यह उपाधि

न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: उदित दीक्षित Updated Sun, 11 Sep 2022 06:11 PM IST
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सार

स्वामी स्वरूपानंद ने ज्योतिषपीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दंड-सन्यास की दीक्षा ली थी। जिसके बाद वह स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे। साल 1981 में उन्हें शंकराचार्य की उपाधि मिली थी।

Shankaracharya Saraswati Is No More Jail Twice For Freedom
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

द्वारका की शारदा पीठ और ज्योर्तिमठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का रविवार को निधन हो गया है। वह मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के दिघोरी गांव के रहने वाले थे। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने 9 साल की उम्र में ही अपना घर छोड़ दिया था। इसके बाद उन्होंने भारती की धार्मिक यात्रा शुरू की। देश के प्रत्येक प्रसिद्ध तीर्थों, स्थानों और संतों के दर्शन करने के बाद वह काशी पहुंचे थे।
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स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती का आजादी की लड़ाई में भी योगदान है। इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले की जेल में वह 9 महीने बंद रहे थे। वहीं, मध्यप्रदेश की एक जेल में भी उन्होंने 6 महीने की सजा काटी थी। इस दौरान वह करपात्री महाराज की राजनीतिक पार्टी राम राज्य परिषद के अध्यक्ष भी थे। 
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बता दें कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म मप्र के सिवनी जिले के दिघोरी गांव में हुआ था। ब्राह्मण परिवार में जन्मे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का उनके माता-पिता ने पोथीराम उपाध्याय रखा था। नौ साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़कर धर्म की यात्रा शुरू कर दी थी। देश के प्रत्येक प्रसिद्ध तीर्थों, स्थानों और संतों के दर्शन करने के बाद वह उप्र के काशी पहुंचे। जहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज वेद-वेदांग और शास्त्रों की शिक्षा ली। आजादी के दौर साल 1942 में उनकी उम्र महज 19 साल थी, लेकिन उनकी छवि एक क्रांतिकारी साधु के रूप में बन गई थी।

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हो गया है। मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर के झोतेश्वर मंदिर में उन्होंने अंतिम सांस ली। वह 99 साल के थे और लंबे समय से बीमार चल रहे थे। हाल ही में 3 सितंबर को उन्होंने अपना 99वां जन्मदिन मनाया था। वह द्वारका की शारदा पीठ और ज्योर्तिमठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य थे।

दंडी संन्यासी थे स्वामी स्वरूपानंद  
साल 1950 में स्वामी स्वरूपानंद दंडी संन्यासी बने थे। उन्होंने ज्योतिषपीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दंड-सन्यास की दीक्षा ली थी। जिसके बाद वह स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे। साल 1981 में उन्हें शंकराचार्य की उपाधि मिली थी। 

नरसिंहपुर में ली अंतिम सांस
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का 98 साल की आयु में रविवार को निधन हो गया। उन्होंने मप्र के नरसिंहपुर के झोतेश्वर मंदिर में अंतिम सांस ली। तीन सितंबर को उन्होंने अपना 99वां जन्मदिन मनाया था। वह काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थे। 
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