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Sheopur: जनसुनवाई में कब्जे की शिकायत लेकर पहुंचा था वृद्ध, अस्पताल में तोड़ा दम; जहरीला पदार्थ पीने की आशंका
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, श्योपुर
Published by: श्योपुर ब्यूरो
Updated Wed, 27 May 2026 02:37 PM IST
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सार
श्योपुर कलेक्ट्रेट में जनसुनवाई के दौरान हड़कंप मच गया। दुकान पर कब्जे की शिकायत लेकर पहुंचे देवेंद्र गोयल की तबीयत अचानक बिगड़ी और अस्पताल में उपचार के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया, जिसके बाद मामला गरमा गया है। इस मामले को लेकर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार पर निशाना साधा है। जांच और आरोपियों पर कार्रवाई की मांग की है।
वृद्ध देवेंद्र गोयल ने इलाज के दौरान अस्पताल में तोड़ा दम।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
श्योपुर कलेक्ट्रेट में मंगलवार को जनसुनवाई के दौरान एक वृद्ध की तबीयत बिगड़ गई। फिर बाद में अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। घटना के बाद कलेक्ट्रेट परिसर में हड़कंप मच गया। मौके पर मौजूद लोगों ने आशंका जताई है कि वृद्ध ने आवेदन देने के बाद कोई जहरीला पदार्थ पी लिया था। मृतक की पहचान देवेंद्र गोयल के रूप में हुई है। वह अपनी दुकान पर कथित कब्जे की शिकायत लेकर जनसुनवाई में पहुंचे थे। उन्होंने अपने रिश्तेदारों पर दुकान हड़पने का आरोप लगाया था।
'जनसुनवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकता हो रही'
वहीं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस मामले को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि जनसुनवाई में आए वृद्ध देवेंद्र गोयल की पहले तबीयत बिगड़ी फिर अस्पताल में मौत हो गई। मौके पर मौजूद लोगों ने आशंका जताई कि आवेदन देने के बाद उन्होंने जहरीला पदार्थ पी लिया था। घटना से स्तब्ध हुए परिजनों ने कहा कि अपनी दुकान पर हुआ कब्जा छुड़वाने के लिए वे पहले भी कई बार शिकायत कर चुके थे, लेकिन फिर भी कोई समाधान नहीं मिला। पटवारी ने कहा कि जनसुनवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकता हो रही है। त्वरित, निष्पक्ष जांच के जरिए सच्चाई का पता लगवाएं। दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के साथ, पीड़ित परिवार को मुआवजा भी दें।
कई बार अधिकारियों से शिकायत कर चुके थे देवेंद्र
परिजनों और स्थानीय लोगों के अनुसार, देवेंद्र इस मामले को लेकर पहले भी कई बार अधिकारियों से शिकायत कर चुके थे, लेकिन उन्हें कोई समाधान नहीं मिला था। वहीं, घटना के विरोध में व्यापारियों और समाजसेवियों ने बुधवार को श्योपुर बंद का आह्वान करते हुए धरना दिया। बताया जा रहा है कि गोयल मंगलवार को साइकिल से अकेले जन सुनवाई में पहुंचे थे। आधे घंटे बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और वे जमीन पर गिर पड़े। दोपहर उन्हें अस्पताल ले जाया गया। चिकित्सकों ने उनका उपचार शुरू किया। डेढ़ बजे उनकी मौत हो गई।
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साइकिल लेकर जा रहा हूं ये कह कर घर से निकले थे देवेंद्र
मंगलवार देवेंद्र गोयल घर से निकले तो पत्नी से सिर्फ इतना कहा कि साइकिल लेकर जा रहा हूं। सामान बेचकर आता हूं। लेकिन वह वापस नहीं लौटे। कुछ घंटे बाद परिवार को सूचना मिली कि जनसुनवाई के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई। बाद में अस्पताल में उनकी मौत हो गई। उनकी पुरानी साइकिल अब भी कलेक्ट्रेट परिसर में खड़ी है। मानो अपने मालिक का इंतजार कर रही हो।देवेंद्र पहले अपनी छोटी दुकान से गोली-बिस्किट बेचकर परिवार चलाते थे।
दुकान पर छोटे भाई ने कब्जा कर लिया था
यही दुकान उनकी रोजी-रोटी का सहारा थी। लेकिन दुकान को लेकर परिवार में विवाद हो गया। आरोप है कि हिस्से की दुकान पर छोटे भाई ने कब्जा कर लिया। उसने उसे किराए पर दे दिया।इसके बाद देवेंद्र के पास फेरी लगाकर सामान बेचने के अलावा कोई दूसरा सहारा नहीं बचा। उम्र बढ़ने के बाद भी वे रोज साइकिल पर सामान रखकर गली-गली घूमते थे। भीषण गर्मी में यह काम आसान नहीं था। लेकिन परिवार की जिम्मेदारी उन्हें रोज बाहर निकलने को मजबूर करती थी।
ये भी पढ़ें- एमपी में रेत माफिया के हौसले बुलंद: अवैध रेत से भरे ट्रैक्टर से प्रधान आरक्षक को कुचला, हालत नाजुक; उपचार जारी
दुकान में कब्जे के बाद छिन गई रोजी-रोटी
उनका एक बेटा जयपुर में नौकरी करता है। दूसरा भोपाल में पढ़ाई कर रहा है। उनकी दो बेटियां हैं। उनमें से एक की शादी हो चुकी है। परिवार और बच्चों की चिंता उन्हें हमेशा सताती रहती थी। देवेंद्र गोयल की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। वे महीनों तक आवेदन देते रहे, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई। दुकान पर कब्जा होने के बाद उनकी रोजी-रोटी छिन गई और परिवार चलाने के लिए उन्हें साइकिल पर फेरी लगानी पड़ी।
'जनसुनवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकता हो रही'
वहीं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस मामले को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि जनसुनवाई में आए वृद्ध देवेंद्र गोयल की पहले तबीयत बिगड़ी फिर अस्पताल में मौत हो गई। मौके पर मौजूद लोगों ने आशंका जताई कि आवेदन देने के बाद उन्होंने जहरीला पदार्थ पी लिया था। घटना से स्तब्ध हुए परिजनों ने कहा कि अपनी दुकान पर हुआ कब्जा छुड़वाने के लिए वे पहले भी कई बार शिकायत कर चुके थे, लेकिन फिर भी कोई समाधान नहीं मिला। पटवारी ने कहा कि जनसुनवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकता हो रही है। त्वरित, निष्पक्ष जांच के जरिए सच्चाई का पता लगवाएं। दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के साथ, पीड़ित परिवार को मुआवजा भी दें।
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कई बार अधिकारियों से शिकायत कर चुके थे देवेंद्र
परिजनों और स्थानीय लोगों के अनुसार, देवेंद्र इस मामले को लेकर पहले भी कई बार अधिकारियों से शिकायत कर चुके थे, लेकिन उन्हें कोई समाधान नहीं मिला था। वहीं, घटना के विरोध में व्यापारियों और समाजसेवियों ने बुधवार को श्योपुर बंद का आह्वान करते हुए धरना दिया। बताया जा रहा है कि गोयल मंगलवार को साइकिल से अकेले जन सुनवाई में पहुंचे थे। आधे घंटे बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और वे जमीन पर गिर पड़े। दोपहर उन्हें अस्पताल ले जाया गया। चिकित्सकों ने उनका उपचार शुरू किया। डेढ़ बजे उनकी मौत हो गई।
साइकिल लेकर जा रहा हूं ये कह कर घर से निकले थे देवेंद्र
मंगलवार देवेंद्र गोयल घर से निकले तो पत्नी से सिर्फ इतना कहा कि साइकिल लेकर जा रहा हूं। सामान बेचकर आता हूं। लेकिन वह वापस नहीं लौटे। कुछ घंटे बाद परिवार को सूचना मिली कि जनसुनवाई के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई। बाद में अस्पताल में उनकी मौत हो गई। उनकी पुरानी साइकिल अब भी कलेक्ट्रेट परिसर में खड़ी है। मानो अपने मालिक का इंतजार कर रही हो।देवेंद्र पहले अपनी छोटी दुकान से गोली-बिस्किट बेचकर परिवार चलाते थे।
दुकान पर छोटे भाई ने कब्जा कर लिया था
यही दुकान उनकी रोजी-रोटी का सहारा थी। लेकिन दुकान को लेकर परिवार में विवाद हो गया। आरोप है कि हिस्से की दुकान पर छोटे भाई ने कब्जा कर लिया। उसने उसे किराए पर दे दिया।इसके बाद देवेंद्र के पास फेरी लगाकर सामान बेचने के अलावा कोई दूसरा सहारा नहीं बचा। उम्र बढ़ने के बाद भी वे रोज साइकिल पर सामान रखकर गली-गली घूमते थे। भीषण गर्मी में यह काम आसान नहीं था। लेकिन परिवार की जिम्मेदारी उन्हें रोज बाहर निकलने को मजबूर करती थी।
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दुकान में कब्जे के बाद छिन गई रोजी-रोटी
उनका एक बेटा जयपुर में नौकरी करता है। दूसरा भोपाल में पढ़ाई कर रहा है। उनकी दो बेटियां हैं। उनमें से एक की शादी हो चुकी है। परिवार और बच्चों की चिंता उन्हें हमेशा सताती रहती थी। देवेंद्र गोयल की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। वे महीनों तक आवेदन देते रहे, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई। दुकान पर कब्जा होने के बाद उनकी रोजी-रोटी छिन गई और परिवार चलाने के लिए उन्हें साइकिल पर फेरी लगानी पड़ी।
