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यहां चर्चा में ग्रेनाइट के अवैध खनन मामला: जांच में मिलीभगत उजागर, टीकमगढ़ डीएफओ की रिपोर्ट पर उठे सवाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, टीकमगढ़
Published by: टीकमगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 11 Apr 2026 12:46 PM IST
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सार
टीकमगढ़ में वन भूमि पर वर्षों से चल रहे अवैध ग्रेनाइट खनन का मामला सामने आया है। जांच रिपोर्ट में अधिकारियों की लापरवाही व मिलीभगत के संकेत मिलने से प्रशासन पर सवाल खड़े हो गए हैं। 1000 करोड़ रुपये के नुकसान का आरोप लगाया गया है।
वन क्षेत्र से ग्रेनाइट का अवैध खनन।
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विस्तार
टीकमगढ़ के जतारा वन परिक्षेत्र के ग्राम बेदौरा में ग्रेनाइट के अवैध खनन का बड़ा मामला सामने आया है, जहां तीन से चार वर्षों तक वन भूमि का लगातार दोहन होता रहा और जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे रहे। वन विभाग द्वारा तैयार जांच प्रतिवेदन में अधिकारियों की लापरवाही ही नहीं, बल्कि मिलीभगत के संकेत भी सामने आए हैं। इस पूरे मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
किसी प्रकार की क्षति या खनन की जानकारी दर्ज नहीं
डीएफओ रामराजा परमार की जांच रिपोर्ट के अनुसार, लिधौरा बीट के कक्ष क्रमांक 246 में लंबे समय तक अवैध खनन होता रहा, लेकिन किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने अपने निरीक्षण प्रतिवेदन में इसका उल्लेख नहीं किया। रिपोर्ट में बताया गया है कि उप वनमंडलाधिकारी द्वारा निर्धारित समय पर निरीक्षण नहीं किया गया, जबकि रेंजर और बीट प्रभारी स्तर के अधिकारियों ने निरीक्षण तो किया, लेकिन किसी प्रकार की क्षति या खनन की जानकारी दर्ज नहीं की।
1000 करोड़ रुपये का अवैध ग्रेनाइट खनन किया गया
वर्ष 2020 से 2025 के बीच पदस्थ रहे विभिन्न रेंजरों और सहायक वनपालों ने भी नियमित निरीक्षण के बावजूद वन संपदा को हो रहे नुकसान को नजरअंदाज किया। इससे स्पष्ट होता है कि अवैध खनन की गतिविधियों को जानबूझकर छिपाया गया। सूत्रों का दावा है कि इस अनदेखी के बदले संबंधित अधिकारियों को लाभ पहुंचाया गया। मामले को विधानसभा में उठाने वाले विधायक ने आरोप लगाया है कि बेदौरा क्षेत्र में करीब 1000 करोड़ रुपये का अवैध ग्रेनाइट खनन किया गया है। उन्होंने इसकी निष्पक्ष जांच के लिए सीबीआई से जांच कराने की मांग की है।
दोषियों को बचाने की कोशिश की जा रही- भाजपा नेता
जांच में यह भी सामने आया है कि अवैध खनन का खेल एनओसी जारी होने के साथ ही शुरू हो गया था। वर्ष 2021 में कलेक्टर द्वारा कामतानाथ मिनरल्स को 6.900 हेक्टेयर भूमि की 30 साल की लीज दी गई थी। वन विभाग ने इस भूमि की दूरी वन क्षेत्र से 700 मीटर बताई थी, जबकि जीपीएस माप में यह दूरी केवल 160 मीटर पाई गई। इसके बाद राजस्व भूमि की आड़ में वन भूमि में खनन शुरू कर दिया गया, लेकिन राजस्व विभाग द्वारा सीमांकन तक नहीं किया गया।
ये भी पढ़ें- एमपी में शिकारियों की क्रूरता: बिजली लाइन से बुना था बाघिन के शिकार का जाल, पांच आरोपी पकडे़ गए; खुलेंगे राज
भाजपा के वरिष्ठ नेता रमन पश्तोर ने भी डीएफओ की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें वास्तविक दोषियों को बचाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। पूरे मामले ने वन और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि इस गंभीर प्रकरण में जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होती है।
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किसी प्रकार की क्षति या खनन की जानकारी दर्ज नहीं
डीएफओ रामराजा परमार की जांच रिपोर्ट के अनुसार, लिधौरा बीट के कक्ष क्रमांक 246 में लंबे समय तक अवैध खनन होता रहा, लेकिन किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने अपने निरीक्षण प्रतिवेदन में इसका उल्लेख नहीं किया। रिपोर्ट में बताया गया है कि उप वनमंडलाधिकारी द्वारा निर्धारित समय पर निरीक्षण नहीं किया गया, जबकि रेंजर और बीट प्रभारी स्तर के अधिकारियों ने निरीक्षण तो किया, लेकिन किसी प्रकार की क्षति या खनन की जानकारी दर्ज नहीं की।
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1000 करोड़ रुपये का अवैध ग्रेनाइट खनन किया गया
वर्ष 2020 से 2025 के बीच पदस्थ रहे विभिन्न रेंजरों और सहायक वनपालों ने भी नियमित निरीक्षण के बावजूद वन संपदा को हो रहे नुकसान को नजरअंदाज किया। इससे स्पष्ट होता है कि अवैध खनन की गतिविधियों को जानबूझकर छिपाया गया। सूत्रों का दावा है कि इस अनदेखी के बदले संबंधित अधिकारियों को लाभ पहुंचाया गया। मामले को विधानसभा में उठाने वाले विधायक ने आरोप लगाया है कि बेदौरा क्षेत्र में करीब 1000 करोड़ रुपये का अवैध ग्रेनाइट खनन किया गया है। उन्होंने इसकी निष्पक्ष जांच के लिए सीबीआई से जांच कराने की मांग की है।
दोषियों को बचाने की कोशिश की जा रही- भाजपा नेता
जांच में यह भी सामने आया है कि अवैध खनन का खेल एनओसी जारी होने के साथ ही शुरू हो गया था। वर्ष 2021 में कलेक्टर द्वारा कामतानाथ मिनरल्स को 6.900 हेक्टेयर भूमि की 30 साल की लीज दी गई थी। वन विभाग ने इस भूमि की दूरी वन क्षेत्र से 700 मीटर बताई थी, जबकि जीपीएस माप में यह दूरी केवल 160 मीटर पाई गई। इसके बाद राजस्व भूमि की आड़ में वन भूमि में खनन शुरू कर दिया गया, लेकिन राजस्व विभाग द्वारा सीमांकन तक नहीं किया गया।
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भाजपा के वरिष्ठ नेता रमन पश्तोर ने भी डीएफओ की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें वास्तविक दोषियों को बचाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। पूरे मामले ने वन और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि इस गंभीर प्रकरण में जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होती है।

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