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विदिशा: हाईकोर्ट के बाद मानवाधिकार आयोग भी सख्त, सरकार को नोटिस जारी कर मांगी रिपोर्ट!
Fri, 07 Aug 2026 04:01 PM IST
विदिशा ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, विदिशा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, विदिशा
Published by: विदिशा ब्यूरो
Updated Fri, 07 Aug 2026 04:01 PM IST
सार
Madhya Pradesh News: मध्य प्रदेश के विदिशा में स्कूल जाने के लिए छात्र बेतवा नदी पर बने चेक डैम के खंभों से होकर गुजर रहे हैं। जान जोखिम में डालकर नदी पार करने के मामले में NHRC ने स्वत: संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश सरकार से दो सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है। इसके पहले एमपी हाईकोर्ट ने भी इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए नाराजगी जताई थी।
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जान जोखिम में डालकर नदी पार कर रहे बच्चे
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने शुक्रवार को उन खबरों पर मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया, जिनमें बताया गया है कि विदिशा जिले में कई छात्र स्कूल पहुंचने के लिए बेतवा नदी को चेक डैम के खंभों पर छलांग लगाकर पार कर रहे हैं और इस दौरान अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं। बताया गया है कि सड़क मार्ग से स्कूल की दूरी 13 किलोमीटर है, जबकि इस खतरनाक रास्ते से यह दूरी महज 1.5 किलोमीटर रह जाती है।
जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंच रहे बच्चे
मानवाधिकार आयोग ने एक बयान में कहा कि उसने मीडिया में आई उस खबर पर स्वत: संज्ञान लिया है, जिसमें विदिशा जिले में स्कूली बच्चों के बेतवा नदी को पार करने के लिए चेक डैम के खंभों पर छलांग लगाने की बात कही गई है। आयोग ने कहा कि यदि खबर में सामने आई जानकारी सही है तो यह मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मामला है।
शिक्षा के साथ सुरक्षित रास्ते का भी अधिकार
NHRC ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21ए छह से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है। बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 भी छह से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे के लिए शिक्षा को अधिकार बनाता है। आयोग ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अविनाश मेहरोत्रा बनाम भारत संघ मामले में वर्ष 2009 में माना था कि शिक्षा के अधिकार में सुरक्षित स्कूल और सुरक्षित बुनियादी ढांचे का अधिकार भी शामिल है।
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सुरक्षित रास्ता नहीं तो शिक्षा का अधिकार अधूरा
आयोग ने कहा कि बच्चों के स्कूल पहुंचने के लिए सुरक्षित परिवहन या रास्ते की व्यवस्था का अभाव उनके गरिमापूर्ण शिक्षा के मौलिक अधिकार को नकारने के समान है। इसी आधार पर आयोग ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
आयोग के अनुसार, 4 अगस्त को प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट में बताया गया था कि बच्चों का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। वीडियो में बच्चे खुले चेक डैम के खंभों के बीच बने चौड़े अंतराल को बेहद जोखिम भरे तरीके से पार करते दिखाई दे रहे हैं। ग्रामीणों ने कथित तौर पर कहा कि वे खेतों में काम करते हैं और दूर स्थित स्कूल तक बच्चों को छोड़ने में असमर्थ हैं। ऐसे में उनके सामने बच्चों को स्कूल भेजना बंद करने या इसी खतरनाक रास्ते से भेजने का विकल्प रह जाता है।
कम कद की छात्रा खंभे नहीं पार कर सकी, परीक्षा में हुई असफल
रिपोर्ट के अनुसार, एक छात्रा अपनी कम लंबाई के कारण चेक डैम के खंभों को पार नहीं कर सकी। इसके चलते वह स्कूल नहीं जा पाई और अंतिम परीक्षा में असफल हो गई। जिला शिक्षा अधिकारी ने मौके का दौरा कर जिलाधिकारी को मामले की जानकारी दी है। हालांकि, बेतवा नदी को पार करने के लिए सुरक्षित रास्ता बनाने की समयसीमा का उल्लेख नहीं किया गया है।
यह भी पढ़ें: 5KM बचाने के लिए मौत से मुकाबला! विदिशा में स्टॉपडैम लांघकर स्कूल जाते हैं बच्चे, पुल व हाईस्कूल की मांग तेज
हाईकोर्ट ने लिया था स्वतः संज्ञान
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विदिशा में बच्चों द्वारा जान जोखिम में डालकर बेतवा नदी पार करने के मामले पर स्वतः संज्ञान लिया था। कोर्ट ने इसे जनहित याचिका मानते हुए मुख्य सचिव व विदिशा कलेक्टर को नोटिस जारी कर स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी। इसके साथ ही, नदी पर सुरक्षित मार्ग के सुझाव देने के लिए 'कोर्ट मित्र' नियुक्त किए गए थे और दो शिक्षकों वाले अस्थायी स्कूल पर नाराजगी जताई गई थी। इस मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर तय की गई थी।
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जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंच रहे बच्चे
मानवाधिकार आयोग ने एक बयान में कहा कि उसने मीडिया में आई उस खबर पर स्वत: संज्ञान लिया है, जिसमें विदिशा जिले में स्कूली बच्चों के बेतवा नदी को पार करने के लिए चेक डैम के खंभों पर छलांग लगाने की बात कही गई है। आयोग ने कहा कि यदि खबर में सामने आई जानकारी सही है तो यह मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मामला है।
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शिक्षा के साथ सुरक्षित रास्ते का भी अधिकार
NHRC ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21ए छह से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है। बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 भी छह से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे के लिए शिक्षा को अधिकार बनाता है। आयोग ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अविनाश मेहरोत्रा बनाम भारत संघ मामले में वर्ष 2009 में माना था कि शिक्षा के अधिकार में सुरक्षित स्कूल और सुरक्षित बुनियादी ढांचे का अधिकार भी शामिल है।
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सुरक्षित रास्ता नहीं तो शिक्षा का अधिकार अधूरा
आयोग ने कहा कि बच्चों के स्कूल पहुंचने के लिए सुरक्षित परिवहन या रास्ते की व्यवस्था का अभाव उनके गरिमापूर्ण शिक्षा के मौलिक अधिकार को नकारने के समान है। इसी आधार पर आयोग ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
आयोग के अनुसार, 4 अगस्त को प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट में बताया गया था कि बच्चों का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। वीडियो में बच्चे खुले चेक डैम के खंभों के बीच बने चौड़े अंतराल को बेहद जोखिम भरे तरीके से पार करते दिखाई दे रहे हैं। ग्रामीणों ने कथित तौर पर कहा कि वे खेतों में काम करते हैं और दूर स्थित स्कूल तक बच्चों को छोड़ने में असमर्थ हैं। ऐसे में उनके सामने बच्चों को स्कूल भेजना बंद करने या इसी खतरनाक रास्ते से भेजने का विकल्प रह जाता है।
कम कद की छात्रा खंभे नहीं पार कर सकी, परीक्षा में हुई असफल
रिपोर्ट के अनुसार, एक छात्रा अपनी कम लंबाई के कारण चेक डैम के खंभों को पार नहीं कर सकी। इसके चलते वह स्कूल नहीं जा पाई और अंतिम परीक्षा में असफल हो गई। जिला शिक्षा अधिकारी ने मौके का दौरा कर जिलाधिकारी को मामले की जानकारी दी है। हालांकि, बेतवा नदी को पार करने के लिए सुरक्षित रास्ता बनाने की समयसीमा का उल्लेख नहीं किया गया है।
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हाईकोर्ट ने लिया था स्वतः संज्ञान
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विदिशा में बच्चों द्वारा जान जोखिम में डालकर बेतवा नदी पार करने के मामले पर स्वतः संज्ञान लिया था। कोर्ट ने इसे जनहित याचिका मानते हुए मुख्य सचिव व विदिशा कलेक्टर को नोटिस जारी कर स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी। इसके साथ ही, नदी पर सुरक्षित मार्ग के सुझाव देने के लिए 'कोर्ट मित्र' नियुक्त किए गए थे और दो शिक्षकों वाले अस्थायी स्कूल पर नाराजगी जताई गई थी। इस मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर तय की गई थी।
