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बिहार में शराबबंदी पर यू-टर्न की आहट: एनडीए में बदले सुर, NCAER की रिपोर्ट ने कैसे बढ़ाई सियासी हलचल?
Wed, 12 Aug 2026 05:03 AM IST
Devesh Tripathi
कुमार निशांत, पटना
कुमार निशांत, पटना
Published by: Devesh Tripathi
Updated Wed, 12 Aug 2026 05:03 AM IST
सार
बिहार में शराबबंदी लागू होने के करीब एक दशक बाद इसके असर और भविष्य को लेकर बहस तेज हो गई है। NCAER की रिपोर्ट में मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करते हुए शराब की नियंत्रित बिक्री शुरू करने का सुझाव दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इससे राज्य की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है।
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बिहार में शराबबंदी पर किसने क्या कहा?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
बिहार में पूर्ण शराबबंदी के दस साल बाद अब इसकी नीति को लेकर बड़ी राजनीतिक बहस छिड़ गई है। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की नई रिपोर्ट ने शराबबंदी खत्म कर नियंत्रित शराब बिक्री और आबकारी टैक्स व्यवस्था दोबारा लागू करने की सिफारिश की है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा होने पर राज्य के अपने राजस्व में करीब 14 से 15 फीसदी तक इजाफा हो सकता है। इससे शराबबंदी को लेकर सरकार के सामने आर्थिक और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर नई चुनौती खड़ी हो गई है। अप्रैल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं की मांग और सामाजिक सुधार को आधार बनाकर बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी। इसके बाद यह नीति उनके राजनीतिक मॉडल और विरासत की प्रमुख पहचान बन गई।
शराबबंदी से सामने आईं नई चुनौतियां
एनसीएईआर ने यह भी रेखांकित किया कि शराबबंदी के बाद अवैध शराब की तस्करी और दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल जैसी चुनौतियां सामने आईं। तस्करी रोकने और कानून लागू कराने में सरकार को अतिरिक्त संसाधन खर्च करने पड़ रहे हैं।
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महिलाओं की सुरक्षा के दावे पर भी सवाल
शराबबंदी का सबसे बड़ा सामाजिक तर्क महिलाओं की सुरक्षा और घरेलू हिंसा में कमी रहा है। लेकिन एनसीएईआर की रिपोर्ट में महिला हिंसा में व्यापक गिरावट के प्रमाण नहीं मिलने की बात कही गई है।
एनडीए में तीन अलग-अलग सुर
जदयू शराबबंदी जारी रखने के पक्ष में है, लेकिन पार्टी के सीतामढ़ी सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने इसकी समीक्षा की मांग की है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान शराबबंदी खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं। जीतन राम मांझी गुजरात की तर्ज पर इसे लागू करने की बात कह चुके हैं।
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रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा होने पर राज्य के अपने राजस्व में करीब 14 से 15 फीसदी तक इजाफा हो सकता है। इससे शराबबंदी को लेकर सरकार के सामने आर्थिक और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर नई चुनौती खड़ी हो गई है। अप्रैल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं की मांग और सामाजिक सुधार को आधार बनाकर बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी। इसके बाद यह नीति उनके राजनीतिक मॉडल और विरासत की प्रमुख पहचान बन गई।
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शराबबंदी से सामने आईं नई चुनौतियां
एनसीएईआर ने यह भी रेखांकित किया कि शराबबंदी के बाद अवैध शराब की तस्करी और दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल जैसी चुनौतियां सामने आईं। तस्करी रोकने और कानून लागू कराने में सरकार को अतिरिक्त संसाधन खर्च करने पड़ रहे हैं।
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महिलाओं की सुरक्षा के दावे पर भी सवाल
शराबबंदी का सबसे बड़ा सामाजिक तर्क महिलाओं की सुरक्षा और घरेलू हिंसा में कमी रहा है। लेकिन एनसीएईआर की रिपोर्ट में महिला हिंसा में व्यापक गिरावट के प्रमाण नहीं मिलने की बात कही गई है।
एनडीए में तीन अलग-अलग सुर
जदयू शराबबंदी जारी रखने के पक्ष में है, लेकिन पार्टी के सीतामढ़ी सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने इसकी समीक्षा की मांग की है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान शराबबंदी खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं। जीतन राम मांझी गुजरात की तर्ज पर इसे लागू करने की बात कह चुके हैं।