1892 में ब्रिटेन के संसद में एक भारतीय चुनकर पहुंचा। ये कैसे हुआ? इस ऐतिहासिक घटना का आज के दौर में क्या महत्व है? दादाभाई नौरोजी (1825-1917) की पहचान सिर्फ इतनी ही नहीं है कि वह ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में पहुंचने वाले एशिया के पहले शख्स थे। महात्मा गांधी से पहले वो भारत के सबसे प्रमुख नेता थे। दुनिया भर में नौरोजी जातिवाद और साम्राज्यवाद के विरोधी की तरह भी जाने जाते थे। दुनिया भर में पैदा हुए कई नए संकटों के बीच दादाभाई को याद करना फिर जरूरी हो गया है। उनका जीवन इस बात का गवाह है कि कैसे प्रगतिशील राजनीतिक शक्ति इतिहास के काले अध्यायों में भी एक रोशनी की किरण की तरह है।
दादाभाई नौरोजी: ब्रिटेन की संसद में चुनकर पहुंचने वाले पहले भारतीय
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लड़कियों की पढ़ाई पर जोर दिया
1840 के दशक में उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोला, जिसके कारण रूढ़िवादी पुरुषों के विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन उनमें अपनी बात को सही तरीके से रखने और हवा का रुख मोड़ने के अद्भुत क्षमता थी।
पांच साल के अंदर ही बॉम्बे का लड़कियों का स्कूल छात्राओं से भरा नजर आने लगा। नौरोजी के इरादे और मजबूत हो गए और वह लैंगिक समानता की मांग करने लगे। नौरोजी का कहना था कि भारतीय एक दिन ये समझेंगे कि “महिलाओं को दुनिया में अपने अधिकारों का इस्तेमाल, सुविधाओं और कर्तव्यों का पालन करने का उतना ही अधिकार है जितना एक पुरुष को” धीरे-धीरे, भारत में महिला शिक्षा को लेकर नौरोजी ने लोगों की राय को बदलने में मदद की।
ब्रिटेन साम्राज्य की मान्यताओं को चुनौती
1855 में पहली बार नौरोजी ब्रिटेन पहुंचे। वह वहां की समृद्धि देख स्तब्ध रह गए। वह समझने की कोशिश करने लगे कि उनका देश इतना गरीब और पिछड़ा क्यों है। यहां से नौरोजी के दो दशक लंबे आर्थिक विश्लेषण की शुरुआत हुई, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की उस मान्यता को चुनौती दी जो साम्राज्यवाद को उपनिवेशी देशों में समृद्धि का कारण मानता है। उन्होंने अपनी पढ़ाई से ये साबित किया कि सच दरअसल इस मान्यता के बिल्कुल विपरीत है।
उनके मुताबिक ब्रिटिश शासन, भारत का “खून बहा कर” मौत की तरफ ले जा रहा था और भयावह अकाल पैदा कर रहा था। इससे नाराज कई ब्रितानियों ने उन पर देशद्रोह और निष्ठाहीनता का आरोप लगाया। वह विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि एक उपनिवेश में रहने वाला व्यक्ति सार्वजनिक रूप से इस तरह के दावे कर रहा था। हालांकि साम्राज्यवाद के खिलाफ विचार रखने वाले लोगों को नौरोजी के नए ठोस विचारों से फायदा हुआ।
साम्राज्यवाद के कारण उपनिवेशों से कैसे "धन बाहर गया" पर उनके विचार ने यूरोपीय समाजवादियों, विलियम जेनिंग्स ब्रायन जैसे अमेरिकी प्रगतिशील और संभवतः कार्ल मार्क्स को भी इस मुद्दे से अवगत कराया।
ब्रिटेन की संसद पहुंचने का रास्ता
नौरोजी की ब्रिटिश संसद में पहुंचने की महत्वाकांक्षा के पीछे भारत की गरीबी थी। ब्रिटिश उपनिवेश से आने के कारण वह संसद में चयन के लिए खड़े हो सकते थे, जब तक वो ब्रिटेन में रहकर ऐसा करें। कुछ आयरिश राष्ट्रवादियों के मॉडल की तर्ज पर उनका मानना था कि भारत को वेस्टमिंस्टर में सत्ता के हॉल के भीतर से राजनीतिक परिवर्तन की मांग करनी चाहिए।
भारत में इस तरह का कोई विकल्प नहीं था। इसलिए, 1886 में उन्होंने अपना पहला अभियान होलबोर्न से लॉन्च किया। वो बुरी तरह से पराजित हो गए। लेकिन नौरोजी ने हार नहीं मानी। अगले कुछ वर्षों में, उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद और ब्रिटेन में प्रगतिशील आंदोलनों के बीच गठबंधन किया। नौरोजी महिलाओं के मताधिकार के मुखर समर्थक भी बन गए। उन्होंने आयरलैंड के घरेलू शासन का समर्थन किया और आयरलैंड से संसद के लिए खड़े होने के करीब भी पहुंचे। उन्होंने खुद को श्रम और समाजवाद के साथ जोड़ दिया, पूंजीवाद की आलोचना की और मजदूरों के अधिकारों के लिए आह्वान किया।
नौरोजी ब्रिटेन के एक बड़े वर्ग को समझाने कामयाब हो गए थे कि भारत को तत्काल सुधारों की आवश्यकता थी, वैसे ही जिस तरह महिलाओं को वोट के अधिकार की, या कामगारों को आठ घंटे काम करने के नियम की। उन्हें मजदूरों, उनके नेताओं, कृषिविदों, नारीवादियों और पादरियों के समर्थन के पत्र मिले। लेकिन ब्रिटेन में सभी एक भावी भारतीय सांसद से खुश नहीं थे। कई लोग उन्हें “कार्पेटबैगर” और “हॉटेनटॉट” कह कर बुलाते थे। यहां तक कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री, लॉर्ड सैलिसबरी ने नौरोजी को एक “काला आदमी” बताया जो अंग्रेजों के वोट का हकदार नहीं था। लेकिन नौरोजी उतने लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में कामयाब हो गए जितने वोटों की उन्हें जरूरत थी। 1892 में लंदन के सेंट्रल फिंसबरी से नौरोजी ने सिर्फ पांच वोटों से चुनाव जीता। (इसके बाद उन्हें दादाभाई नैरो मेजोरिटी भी कहा जाने लगा)
सांसद दादाभाई ने बिना समय गंवाए संसद में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन एक “दुष्ट” ताकत है जिसने अपने साथी भारतीयों को गुलाम जैसी स्थिति में रखा है। वह नियम बदलने और भारतीयों के हाथ में सत्ता देने के लिए कानून लाना चाहता थे। लेकिन उनकी कोशिशें नाकाम रहीं। ज्यादातर सांसदों ने उनके मांग पर ध्यान नहीं दिया, 1895 दोबारा चुनाव हुए और वह हार गए।