कोरोना वायरस महामारी से जुड़ी चिंताओं का ध्यान ना रखते हुए, एक बड़ी भीड़ पूरे माली में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को बनाए रख रही है, जो इस पश्चिम अफ्रीकी देश के राष्ट्रपति इब्राहिम बाउबकर कीटा के इस्तीफे की मांग कर रही है। भ्रष्टाचार, रूढ़िवाद, कमजोर सार्वजनिक सेवाओं, राष्ट्रीय नेतृत्व का अभाव, चुनावी कदाचार, सांप्रदायिक और जिहादी हिंसा को समाप्त करने में सरकार की अक्षमता ने लोगों में इस हताशा को हवा दी है कि वो सड़कों पर उतर आए हैं।
माली के इस इमाम ने हिला रखी है अपने देश की सत्ता, कोरोना से भी नहीं है डर
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इमाम महमूद डिको इस मुस्लिम बहुल देश में कोई नौसिखिए नहीं हैं। वे कम से कम एक दशक तक सार्वजनिक जीवन में एक बड़ा नाम रहे हैं, लेकिन अब-वे पहले से कहीं अधिक अपने दबदबे का प्रदर्शन कर रहे हैं। अप्रैल 2019 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री सौमेलू बाउबे माऐगा को बर्खास्त करने के लिए विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। इस साल के भारी विरोध प्रदर्शन, पांच जून को शुक्रवार की नमाज के दौरान, राजधानी बमाको और दक्षिण में स्थित शहर सिकास्सो तक सीमित था। लेकिन दो हफ्ते बाद भीड़ पश्चिम में कायेस, दक्षिण-मध्य में सेगौ और यहां तक कि प्राचीन रेगिस्तानी शहर टिम्बकटू और सहारा के किनारे पर भी जमा दिखाई देने लगी और आंदोलन बढ़ता चला गया।
ये इमाम महमूद डिको की लोगों को लामबंद करने की शक्ति ही है, जिसने उनके पारंपरिक राजनीतिक सहयोगियों को बातचीत की ताकत दी है। हाल ही में राष्ट्रपति कीटा की सरकार के मंत्रियों ने विपक्षी गठबंधन 'M5' के साथ बैठकर बातचीत की। लेकिन इससे पहले वे, पहली बार इमाम से भी मिले जिनके बारे में उन्हें पता है कि उनकी काफी लोकप्रिय पहुंच है, जो निर्णायक हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ भी, चाहे वो संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन हो या फिर यूरोपीय संघ और पश्चिम अफ्रीकी देशों का आर्थिक समुदाय, सभी ने इमाम महमूद डिको की बात सुनने का भी ध्यान रखा है। इमाम महमूद डिको साल 2009 में हाई इस्लामिक काउंसिल के प्रमुख के रूप में एक बड़े राजनीतिक कैंपेन का नेतृत्व कर रहे थे, जिसका मकसद माली के तत्कालीन राष्ट्रपति अमादौ तौमानी टूरे पर दबाव बनाकर, उनसे परिवार संबंधी कानून में बदलाव करवाना था जिससे महिलाओं के अधिकारों में सुधार किया गया। इसने एक प्रमुख धार्मिक रूढ़िवादी नेता के रूप में उनकी भूमिका की पुष्टि की।
टिम्बकटू क्षेत्र में 1950 के दशक के मध्य में पैदा हुए इमाम महमूद डिको मूल रूप से अरबी भाषा के शिक्षक थे, जिन्होंने सऊदी अरब में पढ़ाई की और बाद में बामाको के एक उप-नगरीय कस्बे में स्थित मस्जिद के धार्मिक नेता बन गए। वे लगभग तीन दशक पहले, एकदलीय शासन व्यवस्था के अंत और लोकतंत्र की स्थापना होने तक, एक मुख्य सरकारी धार्मिक संगठन के सचिव भी थे। अपनी सऊदी शिक्षा के बावजूद, इमाम महमूद डिको ने कभी भी इस्लाम की कट्टरता और कट्टरपंथी वहाबी व्याख्या की निंदा नहीं की। वे वास्तव में परंपरावादी पश्चिम अफ्रीकी इस्लाम के समर्थक हैं, पारिवारिक मुद्दों के प्रति उनके विचार रूढ़िवादी हैं, लेकिन वे माली की पूर्व-मुस्लिम सांस्कृतिक जड़ों और बहुलतावादी धार्मिक संस्कृति के प्रबल रक्षक हैं। उनके मन में रहस्यवाद के लिए भी श्रद्धा है।
इमाम डिको ने हमेशा इस्लाम के नाम पर कठोर शारीरिक दंड देने और हिंसक जिहाद की विचारधारा, दोनों का विरोध किया है। साल 2012 में जब इस्लामिक आतंकवादियों ने माली के उत्तर में कब्जा कर लिया, तो डिको ने बातचीत के माध्यम से एक समाधान तक पहुंचने की कोशिश की, यहां तक कि जिहादी कमांडर इयाद अग-घाली से भी मुलाकात की।
मगर जब उग्रवादियों ने बातचीत छोड़ दी और एक नया आक्रामक अभियान शुरू करने के साथ बामाको की ओर बढ़ने की धमकी दी तो इमाम डिको ने जनवरी 2013 में यह तर्क देते हुए फ्रांस के सैन्य हस्तक्षेप का स्वागत किया कि 'फ्रांस के सैनिकों ने संकट में फंसे माली के नागरिकों को बचाया, वो भी तब जब साथी मुस्लिम देशों ने उनका साथ छोड़ दिया था।'
फिर भी इमाम महमूद डिको के लिए, फ्रांसीसी हस्तक्षेप का स्वागत करना - जिसने बामाको को जिहादियों से बचाया था - का अर्थ कभी भी कुछ व्यापक उदारवादी-आधुनिकता के एजेंडा का समर्थक होना नहीं था क्योंकि उन्होंने हमेशा ही सामाजिक रूढ़िवाद का बचाव किया है।
आज भी उनका यही नजरिया है। वे कह चुके हैं कि 'बामाको में रेडिसन ब्लू होटल पर साल 2015 के हमले के लिए जिम्मेदार आतंकवादियों को अल्लाह ने पश्चिम से आयातित समलैंगिकता में लिप्त माली के लोगों को दण्ड देने के लिए भेजा था।'
इमाम महमूद डिको के कुछ बयानों से उनकी राष्ट्रवादी भावना भी नजर आती है, खासतौर से जब वे फ्रांस पर अपने देश में एक बार फिर उपनिवेश की महत्वाकांक्षाएं रखने का आरोप लगाते हैं। इस मामले में वे अपने अधिकांश हमवतनों की तरह हैं जिन्हें साल 2013 में फ्रांस से मदद मिलने की खुशी है, क्योंकि फ्रांसीसी सैनिकों ने बहुत से माली नागरिकों का बचाया, पर वे अब फ्रांसीसी सैन्य अभियानों को देख-देखकर थक चुके हैं। इसकी बड़ी वजह यह भी है कि फ्रांस की सेना अभी भी जिहादी सशस्त्र समूहों को समाप्त करने में कामयाब नहीं हुई है।