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अजब-गजब: जब सिर्फ एक तरबूज के लिए हुई थी खूनी जंग, हजारों सैनिकों की हो गई थी मौत, जानिए इसके पीछे की वजह

फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: धर्मेंद्र सिंह Updated Sun, 31 Jul 2022 11:26 AM IST
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matire ki rad story of war between two bikaner and nagaur principality for a watermelon
सिर्फ एक तरबूज के लिए हुई थी खूनी जंग (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

दुनिया के इतिहास में कई युद्ध और लड़ाईयों के बारे आपने पढ़ा और सुना होगा। भारतीय इतिहास में भी कई युद्ध लड़े गए हैं जिनके बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। इनमें अधिकतर जंग दूसरे राज्यों पर कब्जे को लेकर हुई हैं। लेकिन 1644 ईस्वी में एक युद्ध सिर्फ एक तरबूज के लिए लड़ा गया था। आज से करीब 376 साल पहले हुई इस जंग में हजारों सैनिकों की मौत हुई थी। आईए जानते हैं इस युद्ध के बारे में...



दुनिया की यह पहली जंग हैं जो सिर्फ एक फल के लिए लड़ी गई थी। इतिहास में यह युद्ध 'मतीरे की राड़' के नाम से दर्ज है। राजस्थान के कई इलाकों में तरबूज को मतीरा के नाम से जाना जाता है और राड़ का मतलब लड़ाई होती है। आज से 376 साल पहले 1644 ईस्वी में यह अनोखा युद्ध हुआ था। तरबूजे के लिए लड़ी की यह लड़ाई दो रियसतों के लोगों के बीच हुई थी। 

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सिर्फ एक तरबूज के लिए हुई थी खूनी जंग (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

दरअसल उस दौरान बीकानेर रियासत के सीलवा गांव और नागौर रियासत के जाखणियां गांव की सीमा एक दूसरे सटी हुई थी। इन रियासतों की आखिरी सीमा थे ये दोनों गांव। बीकानेर रियासत की सीमा में एक तरबूज का पेड़ लगा था और नागौर रियासत की सीमा में उसका एक फल लगा था। यही फल युद्ध की वजह बना। 

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सिर्फ एक तरबूज के लिए हुई थी खूनी जंग (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

रियासतों में शुरू हो गई खूनी जंग

सीलवा गांव के निवासियों का कहना था कि पेड़ उनके यहां लगा है, तो फल पर उनका अधिकार है, तो वहीं नागौर रियासत में लोगों का कहना था कि फल उनकी सीमा में लगा है, तो यह उनका है। इस फल पर अधिकार को लेकर दोनों रियासतों में शुरू हुई लड़ाई ने एक खूनी जंग का रूप ले लिया।

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सिर्फ एक तरबूज के लिए हुई थी खूनी जंग (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
राजाओं की नहीं थी युद्ध की जानकारी

बताया जाता है कि सिंघवी सुखमल ने नागौर की सेना का नेतृत्व किया, जबकि रामचंद्र मुखिया बीकानेर की सेना का नेतृत्व। सबसे बड़ी बात यह है कि इस युद्ध के बारे में दोनों रियासतों के राजाओं को जानकारी नहीं थी। जब यह लड़ाई हो रही थी, तो बीकानेर के शासक राजा करणसिंह एक अभियान पर थे, तो वहीं नागौर के शासक राव अमरसिंह मुगल साम्राज्य की सेवा में तैनात थे। 
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सिर्फ एक तरबूज के लिए हुई थी खूनी जंग (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

मुगल साम्राज्य की अधीनता को इन दोनों राजाओं ने स्वीकार कर लिया था। जब इस लड़ाई के बारे में दोनों राजाओं को जानकारी मिली, तो उन्होंने मुगल राजा से इसमें हस्तक्षेप करने की अपील की। लेकिन जब यह बात मुगल शासकों तक पहुंची तब तक युद्ध छिड़ गया था। इस युद्ध में बीकानेर रियासत की जीत हुई थी, लेकिन बताया जाता है कि दोनों तरफ से हजारों सैनिकों की मौत हुई थी।

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