Monsoon: जलवायु परिवर्तन सबसे खतरनाक और भयानक रूप दुनिया के सबसे बड़े और आबादी महाद्वीप एशिया में दिखने लगा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने हाल ही में एक नई रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट को स्टेट ऑफ द क्लाइमेट इन एशिया 2025 के नाम से जारी किया गया है। इसने वैश्विक पर्यावरण वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं को हिला दिया है। इस वैज्ञानिक रिपोर्ट को 17 जून 2026 को सार्वजनिक किया गया था, जिसमें डराने वाला खुलासा हुआ है। इसके मुताबिर, वैश्विक औसत से कहीं अधिक तेज रफ्तार से एशिया महाद्वीप में तापमान बढ़ रहा है।
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Monsoon: जलवायु परिवर्तन सबसे खतरनाक और भयानक रूप एशिय को डराने लगा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने स्टेट ऑफ द क्लाइमेट इन एशिया 2025 नाम से एक रिपोर्ट जारी की है।
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रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक औसत की तुलना में एशिया का तापमान ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। 1991-2025 की अवधि में तापमान बढ़ने की रफ्तार बीते लंबे समय की तुलना में दो गुनी हो गई है। साल 2025 में इसका प्रभाव साफ तौर पर दिखाई दिया। जापान, चीन और दक्षिण कोरिया में रिकॉर्ड की सबसे गर्म गर्मियां पड़ीं। मध्य और पश्चिम एशिया में कई महीनों तक लू ने कहर बरपाया।
कजाकिस्तान में कुछ महीनों में तापमान सामान्य से 14 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा, तो वहीं करीब 10 दिन 40 डिग्री से ऊपर दर्ज हुआ। गर्मी और सूखे के कारण दक्षिण कोरिया में जंगल में अभी तक सबसे बड़ी आग लगी। भारत के भी कई राज्यों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ी। इसकी वजह से स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ीं और फसलों को नुकसान हुआ।
2025 में एशिया ने देखा मौसम का चरम रूप
बीते साल एशिया मे मौसम का चरम रूप देखने को मिला। दक्षिण एशिया में असामान्य भारी मानसूनी बारिश हुई, जबकि पश्चिम और मध्य एशिया को सूखे की मार झेलनी पड़ी। पाकिस्तान में भीषण बाढ़ ने भयानक तबाही मचाई। इसकी वजहे से 1000 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई, तो वहीं 30 लाख लोगों को विस्थापित किया गया। वियतनाम में बाढ़ की वजह से 200 लोगों ने जान गंवा दी और 1.9 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। चक्रवात सेन्यार ने थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया में भीषण तबाही मचाई। ईरान समेत कई देशों में सूखे का लंबा दौर चला और जल संकट की वजह से लोगों की मुश्किलें खड़ा हो गईं।
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अप्रैल 2025 में पश्चिम एशिया में धूल-रेत के तूफानों के कारण परिवहन, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था बुरी तरह पभावित हुए। भारत के कुछ राज्यों में भारी बारिश तकी वजह से बाढ़ आई, तो वहीं कई इलाकों में बारिश की कमी के कारण सूखे जैसे हालात बन गए। इन परिस्थितियों से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन एक साथ सूखा और बाढ़ दोनों का खतरा बढ़ा रहा है।
भारत ऐसे देश है, जो एशिया के जलवायु संकट की फ्रंटलाइन पर खड़ा है। बढ़ते तापमान ने स्वास्थ्य, कृषि और श्रम उत्पादकता को प्रभावित किया है। शहरों में तापमना बढ़ता जा रहा है। हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी पिघलने की वजह से लंबे समय में नदियों में पानी घट सकता है, तो वहीं कम समय में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। समुद्र का जलस्तर बढ़ने की वजह से भारत के मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे तटीय शहरों पर खतरा मंडरा रहा है। मानसून की अनियमितता के कारण खरीफ की फसलें प्रभावित हो रही हैं।
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बाढ़ और सूखा दोनों किसानों के लिए मुश्किलें खड़ा कर रहे हैं। अगर सरकारें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती नहीं करती हैं, तो 2030 तक हालात और बिगड़ सकते हैं।
क्या कदम उठाने चाहिए?
डब्ल्यूएमओ की महासचिव प्रोफेसर सेलेस्टे साउलो ने साफ तौर पर कहा कि बढ़ते तापमान, महासागरो का गर्म होना, समुद्र में बढ़ता जलस्तर और ग्लेशियरों का पिघलना एशिया के लिए गंभीर खतरा हैं। उन्होंने कहा कि हमें तुरंत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां मजबूत करना और जलवायु अनुकूलन के उपाय तेज करने चाहिए। अगर अभी सही कदम उठाए जाते हैं, तो आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित रहेंगी।