भगवा वस्त्र धारण कर कुदाल-फावड़ा लेकर खुद मैदान में उतरने वाले संत बलबीर सिंह सीचेवाल की मेहनत आखिरकार रंग लाई। ब्यास नदी का पानी छानकर पीने योग्य हो गया है। इसके लिए जहां संत सीचेवाल को ब्यास नदी में मिलने वाली काली बेई को साफ करना पड़ा, वहीं ब्यास में गिरने वाले फैक्टरियों व सीवरेज के पानी को रोकने के लिए सरकार व सिस्टम से जंग लड़नी पड़ी।
पर्यावरण के पुरोधा : रंग लाई संत बलबीर सिंह सीचेवाल की 18 वर्ष की तपस्या, ब्यास नदी का पानी बना पीने योग्य
काली बेई होशियारपुर की तहसील मुकेरियां में गांव हिम्मतपुरा के पास से एक छोटी सी धारा के रूप में निकलती है। यह बेई ही आगे हरिके पत्तन में जाकर ब्यास में गिरती है। इसे साफ करना बड़ी चुनौती थी। 170 किमी के रास्ते में 76 गांवों व कस्बों का गंदा पानी इसमें गिरता था। इसमें कीचड़ और जंगली घासफूस की भरमार थी।
कांझली गांव के पास यह गंदा पानी झील के रूप में 183 हेक्टेयर में फैला था। इतिहास के जानकार बताते हैं कि 1870 में अंग्रेजों ने कांझली गांव के पास एक बैराज बनाकर पानी को नियंत्रित किया। इससे ही इस झील का निर्माण हुआ था। इसके अलावा काली बेई के दोनों ओर बहुत से स्थानों पर लोगों ने कब्जा कर लिया था। इन अतिक्रमणों को हटाने का काम केवल सरकार ही कर सकती थी। इसे हटाने का सरकार पर दबाव बनाया गया। खुद संत सीचेवाल ने मैदान में उतरकर 18 साल तक सिस्टम से जंग लड़ी और काली बेई को साफ कर इतिहास रच दिया।
11 स्थानों से आता था फैक्टरियों का गंदा पानी
11 ऐसे स्थान चिह्नित किए गए, जहां से फैक्टरियों का गंदा पानी ब्यास में गिरता था। इन जगहों पर ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए। एनजीटी (राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण) ने भी राज्य सरकार पर दबाव बनाया कि ब्यास का पानी साफ करने के लिए फंड प्राथमिकता के आधार पर दिया जाए। एक संयुक्त समिति का गठन किया गया और लक्ष्य दिया गया कि 31 मार्च 2021 से पहले 11 स्थानों पर आने वाले गंदे पानी की समस्या को खत्म किया जाए।
10 शहरों के सीवरेज के पानी के लिए भी योजना बनाई
ब्यास में सीवरेज का गंदा पानी भी गिरता था जिसमें 10 जिलों का पानी अधिक था। ऐसे में 11 सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए। वहीं, एनजीटी व संत सीचेवाल की तरफ से युद्ध स्तर पर प्रयास शुरू किया गया ताकि सतलुज, ब्यास व घग्गर का पानी साफ हो। तीनों नदियों का पानी साफ करने के लिए 1139 सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाने की योजना है। ब्यास में सौ फीसदी काम पूरा हो गया है, जबकि अन्य जगह काम जारी है। इसके अलावा निगरानी समिति हर दूसरे माह एनजीटी को प्रगति रिपोर्ट भेजती है।