कृषि कानूनों को रद्द कराने के लिए सिंघु बॉर्डर पर 27 नवंबर से किसान धरने पर बैठे हैं। केंद्र से हर वार्ता बेनतीजा रही है। आंदोलन कब तक चलेगा, कोई नही जानता। ऐसे में धरने पर बैठे किसानों ने अपनी दिनचर्या तय कर ली है। किसान आंदोलन में दिन की शुरुआत शबद कीर्तन से होती है। फिर चाय नाश्ते के बाद धरना। लंगर में सेवा करने के बाद किसान ताश खेलते हैं, हुक्का गुड़गुड़ाते हैं और फिर शाम के खाने की तैयारी हो जाती है। रात में सेहत फिट रखने के लिए काजू-बादाम वाला दूध भी जरूर पिया जाता है।
शबद कीर्तन से चढ़ता है दिन, ताश-हुक्के पर गपशप से होती है शाम, तस्वीरों में देखें किसान आंदोलन के रंग
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पंजाब से पहुंचे गद्दे, सर्दी से बचाएंगे वाटरप्रूफ टेंट
किसानों ने अपनी ट्रैक्टर-ट्रालियों को घर बनाया हुआ है। खाद्य सामग्री से लेकर सोने तक की व्यवस्था ट्राली के अंदर है। पंजाब से किसानों को ठंड से बचाने के लिए लगातार रजाई, गद्दे पहुंच रहे थे। शुक्रवार को वाटरप्रूफ टेंट भी पहुंचाए गए। इनमें किसान सर्दी से आसानी से बच सकता है। साथ ही यह सुरक्षा के लिहाज से भी बेहतर है। पंजाब का किसान एक हजार रजाई व गद्दे लेकर धरनास्थल पर पहुंचा।
कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे महिला-पुरुष
सिंघु बॉर्डर पर धरने के शुरुआती दिनों में महिला किसान काफी कम थीं, जिससे लंगर तैयार करने से लेकर अन्य सभी कार्य पुरुष किसानों को खुद ही करने पड़ते थे। बाद में पंजाब से काफी संख्या में महिला किसान भी पहुंच गई हैं। अब सब्जी बनाने की जिम्मेदारी पुरुष किसानों की होती है तो रोटी सेकने की जिम्मेदारी महिला किसान उठाती है। शाम की चाय भी ज्यादातर महिला किसान बनाती है।
कपड़े धोने के लिए लगाई मशीन
धरनास्थल पर कपड़े धोने के लिए काफी मशीनें लगा दी गई हैं और वहां कपड़े धोने की पूरी जिम्मेदारी युवा किसानों ने संभाली हुई है। युवा किसानों ने इसे अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया है। सफाई की सेवा भी युवा किसान करते हैं, जिससे वहां आसपास गंदगी नहीं रह सके। बर्तन धोने की जिम्मेदारी भी युवा किसान ही निभा रहे हैं।
हरियाणा से हो रही दूध की सेवा
हरियाणा के अलग-अलग गांवों से लोग खाने-पीने का सामान लेकर पहुंच रहे हैं। गांव सेवली से ग्रामीण पुष्कर ने बताया कि वह रोजाना 800-900 लीटर लस्सी, 500 लीटर दूध व आरओ का पानी ट्रालियों में लेकर पहुंचते हैं और किसानों में वितरित करते हैं। यही नहीं किसान यहां सेवा का जिम्मा भी खुद उठाते हैं और बुजुर्गों व महिलाओं की देखरेख में लगे रहते हैं।