Republic Day 2020: देश में ऐसे मनाया गया था पहली बार गणतंत्र दिवस, परेड देखने पहुंचे थे कनॉट प्लेस
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जनरल फील्ड मार्शल करिअप्पा भारतीय सेनाओं के पहले प्रमुख थे, जिन्हें ब्रिटिश-भारतीय सेना में कई पदक प्रदान किए गए थे। जवानों की अपनी एक टुकड़ी को उन्होंने फौजी हिंदी में कहा था, ''आज हम भी आजाद, तुम भी आजाद और हमारा कुत्ता भी आजाद''। उनकी आवाज ने वहां जोश का एक अलग ही माहौल पैदा कर दिया था।
चांदनी चौक की चमक...
हाजी जहूरुद्दीन जो कि साल 1901 में रानी विक्टोरिया के निधन के वक्त एक स्कूली छात्र थे। पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर उनका जामा मस्जिद इलाके में एक होटल था, वे उस दिन हाजी कलां की सबसे मशहूर दुकान से मिठाइयां खरीद कर लाए थे और उन्होंने पूरे इलाको में बंटवाईं थीं। चांदनी चौक में घंटेवाला हलवाई की तरफ से पूरे इलाके में मिठाइयां बांटी गई थीं, उन्होंने अपनी दुकान 18वीं सदी के अंत में शाह आलम के शासनकाल के दौरान शुरू की थी।
पहले गणतंत्र दिवस के दिन चांदनी चौक कई रंगों में सजा था। लाल मंदिर से लेकर फतेहपुरी मस्जिद तक लोगों की भीड़ हाथों में फूल मालाएं और तिरंगे लेकर मौजूद थी। फूलमंडी के दुकानदारों ने गुलाब के पंखुड़ियों की बारिश कर दी थीं। लोग एक-दूसरे को बधाइयां दे रहे थे, उन्हें इस बात का एहसास था कि वे अब पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर चुके हैं।
गुरुद्वारा शीश गंज में बहुत बड़े लंगर का आयोजन किया गया था। इसी तरह गुरुद्वारा बंगला साहिब और रकाबगंज में भी सैकड़ों की तादाद में लोग पूरी-सब्जी और हलवा खाने के लिए लंबी क़तारों में खड़े देखे जा सकते थे।
सबसे फैशनवाला बाजार कनॉट प्लेस
कनॉट प्लेस की खूबसूरती तो उस दिन देखते ही बन रही थी, ऐसा हो भी क्यों ना आखिर यह राजधानी का सबसे फैशनवाला बाजार जो था। कनॉट प्लेस के गलियारों में नाचते झूमते राम लाल को देखा जा सकता था। राम लाल ब्रिटिश सैनिकों के पैरों की मसाज किया करते थे। लाल किले के आस पास तैनात अंग्रेज जवान अक्सर शनिवार और रविवार को उनके पास अपने पैरों की मसाज करवाने आते थे।
बूढ़े हो चुके राम लाल उस वक्त को याद करते हुए बताते हैं कि एक जवान ने उन्हें 100 रुपये का नोट पकड़ा दिया था, जब वे बाकी बचे पैसे देने उसके पीछे भागे तो जवान को लगा कि वे उनसे और पैसे मांगने के लिए आ रहे हैं और इसी वजह से उस जवान ने रामलाल पर बंदूक तान दी। उस समय 100 रुपये का एक नोट आज के 1000 रुपये के बराबर था।
फतेहपुरी में रहने वाले मुस्लिम परिवारों ने अपने-अपने घरों में स्वादिष्ट पकवान बनाए थे। मटिया महल के कई होटल जैसे करीम और जवाहर ने भिखारियों के लिए मुफ्त खाने की व्यवस्था की थी। कबाब और दूध विक्रेताओं ने अपने ग्राहकों के लिए भारी छूट दी थी।
युवा लड़कियों का नृत्य
रात के वक्त सभी निजी और सार्वजनिक भवनों को खूबसूरत रौशनियों से सजाया गया था। वायसरॉय भवन जो अब राष्ट्रपति भवन बन चुका है, उसे किसी दुल्हन की तरह सजाया गया था। इसके अलावा संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, केंद्रीय सचिवालय, इंडिया गेट और ऑल इंडिया रेडियो की इमारतें सभी एक से बढ़कर रौशनियों से नहा रही थीं।
नई दिल्ली के बड़े-बड़े होटलों और रेस्टोरेंट में नाच गाने के कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, इनमें प्रमुख थे डेविकोस और गेलोर्ड होटल। एंग्लो-इंडियन क्लब की तरफ से की गई डांस प्रस्तुति की सभी जगह चर्चा थी। इस आयोजन में हिस्सा लेने के लिए सेंट जॉर्ज इंग्लिश मीडियम स्कूल के प्रिंसिपल की बेटियां आगरा से दिल्ली आई थीं। तीनों लड़कियों की खूबसूरती की चारों ओर चर्चा थी। वहां मौजूद कई युवा पुरुष जवान लड़कियों पर अपना दिल हार रहे थे। लड़िकयां ऊंची हील और स्कर्ट पहने मौजूद थीं।
उसी दौरान हुई एक घटना में जिम्मी परेरा नामक युवक को अपना दांत तक खोना पड़ गया था, दरअसल उनकी गर्लफ्रेंड पर किसी दूसरे लड़के ने कुछ फब्तियां कस दी थीं। और इस वजह से दोनों युवकों के बीच लड़ाई हो गई थी। एंग्लो-इंडियन संगठन के अध्यक्ष सर हेनरी गिड्नी और उपाध्यक्ष फ्रैंक एंथनी ने भाषण दिए थे, उन्होंने लोगों को नए गणतंत्र राष्ट्र की शुभकामनाएं दीं और देश के प्रति निष्ठा की शपथ दिलवाई।
राष्ट्रपति भवन का रात्रिभोज...
इस बीच सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की थी वह था राष्ट्रपति भवन में होने वाला रात्रिभोज। पंडित नेहरू अपनी बेटी इंदिरा गांधी के साथ वहां मौजूद थे, उनके साथ कई अन्य नेता जैसे राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, सरदार बलदेव सिंह और कपूरथला की राजकुमारी अमृत कौर भी मौजूद थे।
कश्मीरी गेट इलाके में रहने वाले पंडित रामचंदर उस समय 90 साल के थे, उन्होंने याद करते हुए बताया था कि उन्होंने कभी भी दिल्ली को इतने भव्य रूप में नहीं देखा था, यहां तक कि रानी विक्टोरिया की गोल्डन जुबली के वक्त भी नहीं।
सर हेनरी गिड्नी ने उस वक्त एक बात कही थी, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा था कि भारत वह धरती है जहां सभ्यता अपने चरम तक पहुंच चुकी थी, वह अब दोबारा उसी सभ्यता को प्राप्त करने की तरफ कदम बढ़ाएगा। हेनरी का जन्म 1873 में हुआ था और उन्होंने पूर्वोत्तर भारत में अंग्रेजों के अभियान में हिस्सा लिया था।
अपने इस कथन के साथ वे एक तरह से महान जर्मन भाषाविद मैक्स म्युलर की बात दोहरा रहे थे। मैक्स म्युलर ने कहा था, गणतंत्र दिवस की इस धूमधाम के बीच, रौशनी की चमक बिखेरते अंतिम दिए के बुझने से पहले, तमाम मुशायरों और कवि सम्मेलनों के जरिए इस यादगार मौके पर वह स्वप्न जीवित रहना चाहिए, अल्लामा इकबाल के ये अमर शब्द हमेशा फिजाओं में गूंजते रहने चाहिए-
''हिंदी हैं हम, वतन हैं, हिन्दुस्तान हमारा!''
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