भारतीय सिनेमा के लोकप्रिय गीतकार समीर अपने चार दशक के करियर में इतने गाने लिख चुके हैं कि उनका नाम गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है। हिंदी सिनेमा के चोटी के गीतकारों में एक अनजान के बेटे समीर खुद भी चोटी के गीतकार बने, ये बात दीगर है कि उन्हें उनके पिता ही गीतकार नहीं बनने देना चाह रहे थे। अपनी पिता की मर्जी के खिलाफ समीर मुंबई गीतकार बनने आए और नौ साल के कड़े संघर्ष के बाद उन्हें 'दिल' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म में गीत लिखने का मौका मिला। इस फिल्म के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज 24 फरवरी को समीर के जन्मदिन पर आइये जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें उन्हीं की जुबानी..
Sameer Anjaan: बैंक की नौकरी छोड़ी, मुंबई में नौ साल संघर्ष किया, शौच के लिए लाइन लगाई और...
दो दिन में ही बैंक की नौकरी छोड़ दी
एम. कॉम करने के बाद मेरे दादा शिवनाथ प्रसाद जी की इच्छा थी कि मैं बैंक में काम करूं। दादा जी सेंट्रल बैंक ऑफ इण्डिया में काम करते थे। घर से कोई दूसरा बैंक नौकरी में गया नहीं और, चूंकि मैं एमकॉम कर रहा था तो सबकी टकटकी मेरे ही ऊपर थी और मैंने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ज्वाइन कर लिया। लेकिन इसी बीच गीत लिखने का शौक बलवान हो गया, लोग मेरी कवि सम्मेलनों और मुशायरों में खूब तारीफ करते थे। बैक ज्वाइन करने के बाद मुझे लगा कि यह जगह मेरे लायक नहीं है। मैं गलत कर रहा हूं। दिल कुछ और बोल रहा है और मैं मजबूरी में कुछ और कर रहा हूं। दो दिन सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी करने के बाद नौकरी छोड़ दी
मां से पांच सौ रुपये लेकर मुंबई आया
बैंक की नौकरी छोड़ने के बाद मां से 500 रुपये लेकर 5 अप्रैल 1980 को काशी एक्सप्रेस पकड़कर 6 अप्रैल को मुंबई की सरजमीं पर आ गया। पिता जी की मंशा थी कि मैं कुछ भी बनूं लेकिन गीतकार ना बनूं। वह कहते थे कि शौकिया तुम लिखते हो लिखते रहो, उसमे मुझे कोई ऐतराज नहीं है मगर कभी इस तरफ रुख मत करना। इसलिए उन्होंने मुझे साहित्य न पढ़ाकर कॉमर्स पढ़ाया। जब मुंबई में आया तो पिता जी से मिलने की हिम्मत नहीं हुई। गीतकार बनने का फैसला मेरा था, इसलिए मुझे अपनी अलग लड़ाई लड़नी थी।
मुंबई में शौच के लिए लाइन लगाई
मुंबई आने के बाद शुरुआती दिनों में बहुत संघर्ष किया। उन दिनों मलाड मालवानी चाल में रहता था। शुरुआती एक साल का जो संघर्ष था। आज भी याद करता हूं तो मेरी रूह कांप जाती है कि मैं कैसे रहा? न तो सही तरीके से खाना नसीब होता था और न ही रहने की सही व्यवस्था थी। शौच के लिए भी एक घंटे लाइन लगानी पड़ती थी। लेकिन इसके सिवा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। तकरीबन नौ साल की लड़ाई के बाद सफलता फिल्म 'दिल' से मिली और इसके बाद मेरी दुनिया बदल गई।
पिताजी का दिया गुरु मंत्र काम आया
मां ने पिताजी को चिट्ठी लिखकर बता दिया कि मैं मुंबई में हूं। पिताजी ने एक रिश्तेदार को भेजकर मुझे बुलवाया भी। उनको लगा कि बेटा जिद्दी है मानेगा नहीं तो उन्होंने कहा कि पहले इस शहर को समझना जरूरी है। उन्होंने ढेर सारे गुरु मंत्र दिए जो मेरे काम अभी भी आते हैं। जब मुझे थोड़ी बहुत दुनियादारी की समझ आ गई तो उन्होंने मुझे आजाद कर दिया। आनंद मिलिंद के पिता चंद्रगुप्त के साथ भोजपुरी में मैंने 117 गाने लिखे। वहीं पर मेरी मुलाकात आनंद मिलिंद से हुई और हमारी दोस्ती हो गई। संयोग से उनको 'कयामत से कयामत तक' मिली। फिल्म हिट हो गई। उसके बाद उनको 'दिल' मिली। जब आनंद मिलिंद को 'दिल' मिली तो आनंद ने मेरे नाम का सुझाव दिया।