आज के बाइस्कोप में बात होगी फिल्म ‘अभिनेत्री’ की। हेमा मालिनी और शशि कपूर की जोड़ी वाली ये फिल्म 12 मई 1970 को रिलीज हुई और इस फिल्म को देखेंगे तो समझ आएगा कि आखिर हेमा मालिनी सबसे कम समय में हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री बनीं तो कैसे? दो साल पहले ही हिंदी सिनेमा में उनका स्वागत उस वक्त के शो मैन राज कपूर ने अपनी फिल्म सपनों का सौदागर में किया था। फिल्म के प्रचार में उनके नाम के साथ जुड़ा तमगा ड्रीम गर्ल आज तक उनके सिवा किसी दूसरी अभिनेत्री पर फिट नहीं हो पाया। ये वो दौर था जब हेमा मालिनी ने अपनी खूबसूरती के साथ साथ अपने अभिनय से भी लोगों को प्रभावित किया। लेकिन हेमा मालिनी के शुरुआती दिनों और फिल्म ‘अभिनेत्री’ की हम बात करें, उससे पहले थोड़ी जानकारी फिल्म के निर्माता- निर्देशक सुबोध मुखर्जी की। यही वह मुखर्जी परिवार है जिसकी विरासत इन दिनों रानी, काजोल और अयान के हाथों में है।
बाइस्कोप: इस फिल्म से ड्रीम गर्ल को मिली थी ‘अभिनेत्री’ की पहचान, हो गए रिलीज के पूरे 50 साल
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हिंदी सिनेमा का मुखर्जी परिवार अब के झांसी से ताल्लुक रखता है। अंग्रेजों के समय में झांसी शहर जो था वह ग्वालियर रियासत का हिस्सा हुआ करता था। इसी झांसी से निकले शशधर मुखर्जी ने हिंदी सिनेमा के तीन बड़े स्टूडियोज की स्थापना में महती भूमिका निभाई। पहले वह अशोक कुमार और देविका रानी के साथ बॉम्बे टाकीज से जुड़े। फिर उन्होंने फिल्मिस्तान की स्थापना कराई और बाद में खोला स्टूडियो फिल्मालय। फिल्मिस्तान और फिल्मालय दोनों में अब भी शूटिंग होती हैं। फिल्मिस्तान है गोरेगांव रेलवे स्टेशन के करीब पश्चिम में और अंधेरी पश्चिम में स्टेशन के ठीक करीब है फिल्मालय।
शशधर की शादी हुई मशहूर अभिनेता अशोक कुमार की बहन सतीरानी से। इनके सबसे बड़े रोनो मुखर्जी ने बतौर निर्देशक और संगीतकार एक फिल्म बनाई। वह अभिनेत्री शरबनी मुखर्जी के पिता हैं। उनसे छोटे जॉय और देब मुखर्जी दोनों अभिनेता बने। देब के बेटे अयान मुखर्जी इन दिनों ब्रह्मास्त्र बना रहे हैं। अयान की बहन सुनीता की शादी निर्देशक आशुतोष गोवारिकर से हुई है। शोमू मुखर्जी भी निर्माता निर्देशक रहे। उनकी शादी हुई फिल्म अभिनेत्री तनूजा से और वह काजोल और तनीषा के पिता थे। शशधऱ के पांचवे बेटे रहे सुबीर मुखर्जी और शशधर के छोटे भाई सुबोध मुखर्जी ने शुरुआत तो अपने भाई के प्रोडक्शन हाउस में ही की लेकिन बाद में अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी खोल ली। शशधर के एक बड़े भाई भी थे, रविंद्र मोहन मुखर्जी। उनके बेटे राम मुखर्जी फिल्म निर्देशक थे, उनके दो बच्चे हुए राजा मुखर्जी और रानी मुखर्जी।
सुबोध मुखर्जी दरअसल झांसी में थे तो बहुत उपद्रवी थे। आजादी की लड़ाई में भी खूब बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते। और, खेलकूद में भी उनकी दिलचस्पी इतनी थी कि वह टेनिस सीखने लखनऊ तक पहुंच गए थे। सन 1942 में पुलिस ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के चलते उनको गिरफ्तार कर लिया। तीन महीने बाद छूटे तो घर वालों ने धक्का मारकर बंबई पहुंचा दिया, बड़े भाई शशधर मुखर्जी के पास। शशधर मुखर्जी पहले बॉम्बे टाकीज में प्रोड्यूसर हुआ करते। बाद में उन्होंने राय बहादुर चुन्नी लाल, अशोक कुमार और ज्ञान मुखर्जी के साथ साझेदारी में फिल्मिस्तान स्टूडियो खोल लिया। इसी फिल्मिस्तान में सुबोध की नौकरी लगी असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर और यहीं अपने करियर की दो बेहतरीन फिल्में पेइंग गेस्ट और मुनीमजी बतौर डायरेक्टर सुबोध मुखर्जी ने निर्देशित कीं। सायरा बानो और राखी को फिल्मों में लीड रोल देने वाले सुबोध मुखर्जी की नजर जब हेमा मालिनी पर पड़ी तो वह ऐसे किरदारों की तलाश में थी, जो उनके भीतर की अभिनेत्री को बाहर ला सकें।
साल 1970 में हेमा मालिनी की पांच फिल्में रिलीज हुईं और पांचों में उनके किरदार एक दूसरे से बिल्कुल अलहदा। फिल्म अभिनेत्री के अलावा इस साल रिलीज हुई उनकी दूसरी फिल्में रहीं, तुम हंसीं मैं जवां, शराफत, आंसू और मुस्कान व जॉनी मेरा नाम। हेमा मालिनी की फिल्मों में एंट्री बतौर क्लासिकर डांसर हुई थी। सपनों का सौदागर की हीरोइन बनने से पहले वह एक तमिल और एक तेलुगू फिल्म कर चुकी थीं। हिंदी सिनेमा में दक्षिण की हीरोइनों वैजयंतीमाला और वहीदा रहमान पर से फोकस धीऱे धीरे शिफ्ट हो रहा था और तभी आ गईं हेमा मालिनी। हिंदी सिनेमा में साउथ से आई अभिनेत्रियों की हमेशा से पूछ रही है। हेमा मालिनी पर भी जमाना बरसों बरस फिदा रहा। निर्देशक सुबोध मुखर्जी उन दिनों दुनिया को याहू शब्द देने वाली फिल्म जंगली की कामयाबी में झूल रहे थे और सोच रहे थे एक ऐसी फिल्म जो थोड़ा शांत हो और घरेलू किस्म की हो।