28 साल पहले दो मोटरसाइकिलों पर एक साथ सवारी करते हुए सिनेमा के पर्दे पर प्रकट हुए अजय देवगन ने समय के साथ बदलना सीखा है। प्रयोगों में यकीन करने के इसी दर्शन ने 49 साल के हो चुके अजय देवगन को हिंदी सिनेमा का एक भरोसेमंद सुपरस्टार बना रखा है। अजय देवगन से अमर उजाला की एक खास मुलाकात
17 साल बाद फिर से बायोपिक करेंगे अजय देवगन, कैंसर से पीड़ित इस फुटबॉल कोच का निभाएंगे किरदार
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सिंघम, सिंघम रिटर्न्स, शिवाय, रेड और सिम्बा जैसी फिल्में देख लगता है अजय देवगन को फिजूल की कोई बात पसंद नहीं लेकिन बोल बच्चन, गोलमाल अगेन और टोटल धमाल जैसी फिल्मों में एक अलग ही रूप देखने को मिलता है तो असली अजय देवगन कैसा है, बाजीराव सिंघम जैसा या फिर टोटल धमाल के गुड्डू जैसा?
मेरा अपना ये मानना है कि कलाकार की अपनी कोई इमेज नहीं होती। इमेज जो होती हैं, लोगों के दिमाग में होती है। बाजीराव सिंघम को पसंद करने वाले मुझे सीरियस या नो नॉनसेंस एक्टर के रूप में भले सोचते हों लेकिन मैं असल जिंदगी में बहुत ही मस्तमौला और मस्ती पसंद करने वाला इंसान हूं। मेरा मानना है कि जैसा किरदार आप करते जाते हैं, वैसे ही इमेज आपकी बदलती रहती है। एक कलाकार के तौर पर मैं अलग अलग तरह के किरदार करना चाहता हूं। एक जैसा काम करते रहने से मेरे जैसा कलाकार बोर हो जाता है।
तकरीबन सौ फिल्मों कर लेने के बाद कभी आप पलटकर अपनी फ्लॉप फिल्मों के बारे में देखते हैं तो कहां कमी पाते हैं?
किसी फिल्म की कामयाबी या नाकामी की कोई एक वजह नहीं होती। हम सबसे पहले फिल्म की पटकथा सुनते हैं और हमारे दिमाग में फिल्म का एक खाका बनने लगता है। दिक्कत तब शुरू होती है जब फिल्म की शूटिंग करते समय आपको एहसास होने लगता है कि जैसी फिल्म हमने सोची थी, वैसी नहीं यह तो कुछ और ही बन रही है। सब कुछ निर्देशक की सोच पर आकर टिक जाता है। इसके अलावा भी तमाम अलग-अलग लोग फिल्म में हिस्सेदार होते हैं। कोई एक आदमी डिश बनाए वैसी बात यहां नहीं है। यहां नमक कोई डाल रहा होता है तो मिर्ची कोई और। फिल्म देखने वालों का नजरिया भी अलग-अलग होता है। फिल्म अच्छी नहीं बनती तो दर्शक हमें बताते हैं कि कमी कहां रह गई।
तो यही वजह रही आपके फिल्म निर्माता बनने की?
फिल्म निर्माता बनने से भी ये दिक्कतें कम नहीं होती। हां, ये जरूर है कि फिल्म मेकिंग के तमाम सारे विभागों पर तब निर्माता के तौर पर हमारी नजर रहती है और गड़बड़ी होने की गुंजाइश भी कम होती जाती है लेकिन सब कुछ आकर फिर भी निर्देशक की सोच और उसकी दृष्टि पर ही टिक जाता है। हम दफ्तर में क्या सोचते हैं, जरूरी नहीं कि निर्देशक सेट पर भी वही सोच रहा हो। अक्सर शूटिंग शुरू होने पर निर्देशक एक अलग ही दायरे में चला जाता है।
निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा मानते हैं कि हिंदी सिनेमा में बायोपिक का दौर उनकी फिल्म भाग मिल्खा भाग से शुरू हुआ लेकिन ये काम तो आप 17 साल पहले द लीजेंड ऑफ भगत सिंह में कर चुके हैं। अब फिर से आप एक साथ कई बायोपिक कर रहे हैं तो किसी बायोपिक को चुनने का आपका पैमाना क्या है?
बायोपिक बनाने का फैसला हम कभी लेते नहीं हैं। हम अच्छी कहानियों की तलाश में कभी-कभी ऐसे किरदारों से टकरा जाते हैं कि आपको यकीन ही नहीं होता कि ऐसा कुछ भी हमारे आसपास पहले हो चुका है। एक ऐसी कहानी आपके सामने होती है कि सिर्फ आश्चर्यचकित रह जाने के अलावा आप कुछ दूसरा सोच ही नहीं पाते। तब लगता है कि इस कहानी पर फिल्म बननी ही चाहिए।