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17 साल बाद फिर से बायोपिक करेंगे अजय देवगन, कैंसर से पीड़ित इस फुटबॉल कोच का निभाएंगे किरदार

Sat, 23 Feb 2019 09:53 AM IST
shrilata biswas एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: shrilata biswas Updated Sat, 23 Feb 2019 09:53 AM IST
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ajay devgn next biopic film on football coach syed abdul rahim
ajay devgn, syed abdul rahim - फोटो : social media

28 साल पहले दो मोटरसाइकिलों पर एक साथ सवारी करते हुए सिनेमा के पर्दे पर प्रकट हुए अजय देवगन ने समय के साथ बदलना सीखा है। प्रयोगों में यकीन करने के इसी दर्शन ने 49 साल के हो चुके अजय देवगन को हिंदी सिनेमा का एक भरोसेमंद सुपरस्टार बना रखा है। अजय देवगन से अमर उजाला की एक खास मुलाकात

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ajay devgn - फोटो : social media

सिंघम, सिंघम रिटर्न्स, शिवाय, रेड और सिम्बा जैसी फिल्में देख लगता है अजय देवगन को फिजूल की कोई बात पसंद नहीं लेकिन बोल बच्चन, गोलमाल अगेन और टोटल धमाल जैसी फिल्मों में एक अलग ही रूप देखने को मिलता है तो असली अजय देवगन कैसा है, बाजीराव सिंघम जैसा या फिर टोटल धमाल के गुड्डू जैसा?
मेरा अपना ये मानना है कि कलाकार की अपनी कोई इमेज नहीं होती। इमेज जो होती हैं, लोगों के दिमाग में होती है। बाजीराव सिंघम को पसंद करने वाले मुझे सीरियस या नो नॉनसेंस एक्टर के रूप में भले सोचते हों लेकिन मैं असल जिंदगी में बहुत ही मस्तमौला और मस्ती पसंद करने वाला इंसान हूं। मेरा मानना है कि जैसा किरदार आप करते जाते हैं, वैसे ही इमेज आपकी बदलती रहती है। एक कलाकार के तौर पर मैं अलग अलग तरह के किरदार करना चाहता हूं। एक जैसा काम करते रहने से मेरे जैसा कलाकार बोर हो जाता है।

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Ajay Devgn - फोटो : file photo

तकरीबन सौ फिल्मों कर लेने के बाद कभी आप पलटकर अपनी फ्लॉप फिल्मों के बारे में देखते हैं तो कहां कमी पाते हैं?
किसी फिल्म की कामयाबी या नाकामी की कोई एक वजह नहीं होती। हम सबसे पहले फिल्म की पटकथा सुनते हैं और हमारे दिमाग में फिल्म का एक खाका बनने लगता है। दिक्कत तब शुरू होती है जब फिल्म की शूटिंग करते समय आपको एहसास होने लगता है कि जैसी फिल्म हमने सोची थी, वैसी नहीं यह तो कुछ और ही बन रही है। सब कुछ निर्देशक की सोच पर आकर टिक जाता है। इसके अलावा भी तमाम अलग-अलग लोग फिल्म में हिस्सेदार होते हैं। कोई एक आदमी डिश बनाए वैसी बात यहां नहीं है। यहां नमक कोई डाल रहा होता है तो मिर्ची कोई और। फिल्म देखने वालों का नजरिया भी अलग-अलग होता है। फिल्म अच्छी नहीं बनती तो दर्शक हमें बताते हैं कि कमी कहां रह गई।

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ajay devgn - फोटो : file photo

तो यही वजह रही आपके फिल्म निर्माता बनने की?
फिल्म निर्माता बनने से भी ये दिक्कतें कम नहीं होती। हां, ये जरूर है कि फिल्म मेकिंग के तमाम सारे विभागों पर तब निर्माता के तौर पर हमारी नजर रहती है और गड़बड़ी होने की गुंजाइश भी कम होती जाती है लेकिन सब कुछ आकर फिर भी निर्देशक की सोच और उसकी दृष्टि पर ही टिक जाता है। हम दफ्तर में क्या सोचते हैं, जरूरी नहीं कि निर्देशक सेट पर भी वही सोच रहा हो। अक्सर शूटिंग शुरू होने पर निर्देशक एक अलग ही दायरे में चला जाता है।

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Ajay Devgn - फोटो : file photo

निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा मानते हैं कि हिंदी सिनेमा में बायोपिक का दौर उनकी फिल्म भाग मिल्खा भाग से शुरू हुआ लेकिन ये काम तो आप 17 साल पहले द लीजेंड ऑफ भगत सिंह में कर चुके हैं। अब फिर से आप एक साथ कई बायोपिक कर रहे हैं तो किसी बायोपिक को चुनने का आपका पैमाना क्या है?
बायोपिक बनाने का फैसला हम कभी लेते नहीं हैं। हम अच्छी कहानियों की तलाश में कभी-कभी ऐसे किरदारों से टकरा जाते हैं कि आपको यकीन ही नहीं होता कि ऐसा कुछ भी हमारे आसपास पहले हो चुका है। एक ऐसी कहानी आपके सामने होती है कि सिर्फ आश्चर्यचकित रह जाने के अलावा आप कुछ दूसरा सोच ही नहीं पाते। तब लगता है कि इस कहानी पर फिल्म बननी ही चाहिए। 

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