27 मई 1977 को एक फिल्म रिलीज हुई जिसका नाम सुनते ही आपके चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी। वो फिल्म थी ‘अमर अकबर एंथोनी।’ जिसे मनमोहन देसाई ने डायरेक्ट किया था। फिल्म अगर आज के समय में बनी होती तो शायद बेस्ट फिल्म फॉर नेशनल इंट्रीग्रेशन के लिए अवॉर्ड जीत जाती। लेकिन जिस दौर में आई थी तब भी खूब नाम कमाया। अमिताभ बच्चन को इसके लिए उनके करियर का पहला फिल्मफेयर और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी को बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का अवॉर्ड मिला था। इसके साथ ही उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म भी बनी। इसके गाने और वन लाइनर्स ने इंडिया में मसाला फिल्मों के लिए एक नया ट्रेंड सेट कर दिया। इस फिल्म के बनने का प्रोसेस ऐसा था कि फिल्म पूरी भी हो गई लेकिन डायरेक्टर को पता ही नहीं चला। उनके बेटे ने बताया तब पता चला। ऐसे ही कुछ और भी मजेदार किस्से इस फिल्म की मेकिंग से जुड़े हैं जिन्हें पढ़कर आपका दिन बन जाए। उसके लिए आपको कहीं जाना नहीं है बस स्क्रीन पर नजर टिकानी है और पढ़ते जाना है।
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दिलचस्प: अमर अकबर एंथोनी के मजेदार किस्से, ऐसे बने अमिताभ मनमोहन देसाई के पंसदीदा कलाकार
Sun, 16 May 2021 03:42 PM IST
शुभांगी गुप्ता
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: शुभांगी गुप्ता
Updated Sun, 16 May 2021 03:42 PM IST
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अमर अकबर एंथोनी
- फोटो : Instagram
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मनमोहन देसाई
- फोटो : सोशल मीडिया
- यह तो आप शायद जानते ही होंगे कि इस फिल्म को बनाने का आइडिया मनमोहन देसाई को अखबार से मिला था। वहीं फिल्म लिखते वक्त अमिताभ बच्चन के किरदार का नाम सबसे पहले एंथोनी फर्नांडीस रखा गया था। उस समय मनमोहन देसाई म्यूजिक के लिए लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और लिरिसिस्ट आनंद बख्शी के साथ बैठे थे। टाइटल सॉन्ग तैयार हुआ, ‘माय नेम इज एंथोनी फर्नांडीस, मैं दुनिया में अकेला हूं।’ यह सुनते-गाते समय सरनेम अटक रहा था और गाने का फ्लो खराब हो रहा था। तब नाम बदलने की बात आई लेकिन सवाल ये था कि नाम रखा क्या जाए? लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने तब बताया कि 1930 के दशक में एक बड़े मशहूर म्यूजिक अरेंजर हुआ करते थे – एंथोनी गोंजाल्वेस। बस फिर क्या था हीरो का नाम बदलकर रख दिया गया एंथोनी गोंजाल्वेस और बन गया आपका टाइटल सॉन्ग।
अमर अकबर एंथोनी
- फोटो : सोशल मीडिया
- ‘अमर अकबर एंथोनी’ में विनोद खन्ना के किरदार के अपोजिट कोई हीरोइन नहीं रखी गई थी। मनमोहन देसाई को लगा कि उनका कैरेक्टर थोड़ा सीरियस किस्म का है इसलिए उनके साथ किसी हीरोइन को रखना ठीक नहीं लगेगा। विनोद खन्ना को जैसे ही ये बात पता लगी, वो पहुंच गए डायरेक्टर के पास। उन्होंने मनमोहन देसाई से कहा कि अमिताभ और ऋषि कपूर के साथ हीरोइन हैं इसलिए उनके साथ भी होनी चाहिए। मनमोहन ने बहुत समझाया लेकिन विनोद मानने को तैयार ही नहीं थे। बाद में विनोद खन्ना के साथ शबाना आजमी को कास्ट किया गया और फिर उनके लिए अलग से एक रोल लिखा गया।
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मनमोहन देसाई
- फोटो : सोशल मीडिया
- मनमोहन देसाई ‘अमर अकबर एंथोनी’ और ‘परवरिश’ की शूटिंग एकसाथ एक ही स्टूडियो में कर रहे थे। दोनों फिल्मों की कास्ट भी लगभग एक जैसी ही थी। वो चाहते थे कि दोनों फिल्मों को जल्द से जल्द रिलीज किया जाए। पहले वो ‘परवरिश’ का एक सीन शूट करते फिर ‘अमर अकबर एंथोनी’ का। लेकिन सारी तैयारी धरी की धरी रह गई जब साल 1975 में आपातकाल लगाया गया और मनमोहन की फिल्में अटक गईं। इसी का नतीजा रहा कि 1977 में उनकी एक के बाद एक चार फिल्में ‘धरमवीर’, ‘चाचा-भतीजा’, ‘परवरिश’, और ‘अमर अकबर एंथनी’ रिलीज हुईं और सब सुपरहिट रहीं।
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मनमोहन देसाई
- फोटो : सोशल मीडिया
- मनमोहन देसाई की एक आदत थी। वो जनता का रिएक्शन देखने के लिए उनके साथ थिएटर में बैठकर फिल्म देखते थे। जैसे ही कोई बीच में उठता उसे रोक देते थे। कई बार तो हाथापाई तक भी बात पहुंच जाती थी। ‘अमर अकबर एंथोनी’ का प्रीमियर चल रहा था। फिल्म का स्टार कास्ट और इंडस्ट्री के जाने-माने लोग बैठकर फिल्म देख रहे थे। जैसे ही एक सीन खत्म हुआ मनमोहन खुद ही उठकर बाहर निकलने लगे। अमिताभ सोच में पड़ गए कि कहां गड़बड़ हो गई। फिर भागते-भागते उनके पास पहुंचे, पूछा क्या हुआ? मनमोहन कहते हैं, अब से मेरी सभी फिल्मों में तुम काम करोगे। इसी फिल्म से मनमोहन देसाई डायरेक्टर के साथ प्रोड्यूसर भी बन गए और फिल्में बनाईं ‘नसीब’ (1981), ‘देशप्रेमी’ (1982), ‘कूली’ (1983), ‘मर्द’ (1985) और ‘तूफान’ (1989)। इन सभी की खासियत थी कि सभी में अमिताभ बच्चन नजर आए।