लंबा चौड़ा कद, दमदार आवाज, डरावने गेटअप और जबरदस्त शख्सियत के जरिए सालों तक दर्शकों के दिल में खौफ पैदा करने वाले अभिनेता अमरीश पुरी ने जब-जब पर्दे पर कदम रखा वो हीरो से बढ़कर ही लगे। सही मायने में विलेन क्या होता है ये अमरीश पुरी ने हिंदी सिनेमा को बताया। अमरीश साहब ने बॉलीवुड में ऊंचाईयों को छुआ लेकिन अपने बेटे को इससे दूर रखा। आज उनकी पुण्यतिथि पर बताते हैं ये किस्सा...
बॉलीवुड पर अमरीश पुरी ने विलेन बनकर किया था राज, इस वजह से बेटे को रखा फिल्मों से दूर
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बीबीसी से बातचीत में अमरीश पुरी के बेटे राजीव पुरी ने फिल्मों में न आने के सवाल पर कहा था, 'उस वक्त बॉलीवुड की स्थिति अच्छी नहीं थी तो उन्होंने मुझे कहा कि यहां मत आओ और जो अच्छा लगता है वो करो। तब मैं मर्चेंट नेवी में गया।' राजीव के मुताबिक अमरीश पुरी ने उन पर कभी अपनी मर्जी नहीं थोपी।
अमरीश पुरी ने 30 साल तक फिल्मों में काम किया। उन्होंने सकारात्मक और नकरात्मक भूमिका निभाईं लेकिन दर्शकों ने ज्यादा उनके निगेटिव किरदार को पसंद किया। नकारात्मक भूमिकाओं को वो इस ढंग से निभाते थे कि हिंदी फिल्मों में 'बुरे आदमी' का पर्याय बन गए।
हम पांच, नसीब, विधाता, हीरो, अंधा कानून, अर्ध सत्य जैसी फिल्मों में उन्होंने बतौर खलनायक ऐसी छाप छोड़ी कि फिल्म प्रेमियों के मन में उनके नाम से ही खौफ पैदा हो जाता था। साल 1987 में आई मिस्टर इंडिया में उनका किरदार मोगैम्बो बेहद मशहूर हुआ। फिल्म का संवाद 'मोगैम्बो खुश हुआ', आज भी लोगों के जेहन में बरकरार है।
अमरीश पुरी ने अपनी एक्टिंग का लोहा देश में ही नहीं विदेशों में भी माना गया। विदेश में लोग अमरीश पुरी को मोला राम के नाम से जानते थे। उन्होंने साल 1984 में स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्मइंडियाना जोन्स एंड दा टेंपल ऑफ डू में मोला राम का किरदार निभाया था। इतना ही नहीं इस फिल्म में अमरीश पुरी ने अपना सिर भी मुंडवा लिया था, लोगों ने उनके नए लुक को खूब सराहा था। जिसके बाद अमरीश ने अपनी निजी जिंदगी में भी यह लुक काफी समय तक अपनाया। बता दें कि स्पीलबर्ग हमेशा से कहा करते थे कि अमरीश पुरी उनके सबसे पसंदीदा विलेन हैं।
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