हिंदी के शानदार कवि और गीतकार आनंद बख्शी का दुनिया में आगमन 21 जुलाई यानी सावन के महीने में हुआ और, उन्होंने 'आज मौसम बड़ा बेईमान है' जैसे गीत भी लिखे। उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए हर स्वाद के गीत लिखे। खुशी हो, गम हो, जुदाई हो, वफा हो या बेवफाई हो, आनंद में हर भावना को अपने शब्दों से बयां करने का जादू था। जादूगर की एक खासियत यह भी होती है कि वह चुटकियों में दोस्त भी बना लेता है। हालांकि आनंद बख्शी के जो दोस्त हुआ करते थे, वह उनके दोस्त से ज्यादा प्रशंसक होते थे। आनंद बख्शी की याद में उनके करीबियों के कुछ कथन उनके जन्मदिन पर खास आपके लिए हमने संकलित किए हैं।
सुनिए आनंद बख्शी की आवाज में 'मैं कोई बर्फ नहीं हूं जो पिघल जाऊंगा' और यादें साथी दिगग्जों की
सुभाष घई, निर्माता और निर्देशक
"उनके हर जन्मदिन पर मैं आनंद बख्शी साहब के घर जाता था। मैं उनके बहुत परम प्रिय मित्रों में से था। आज मुझे याद आता है उनका आखिरी गीत, जो उन्होंने मेरी फिल्म 'यादें' के लिए लिखा था। 'नगमे हैं, शिकवे हैं, किस्से हैं, बातें हैं। बातें भूल जाती हैं यादें याद आती हैं। ये यादें किसी दिलो जानम के चले जाने के बाद आती हैं।' यह मेरी फिल्म 'यादें' के लिए लिखा था उन्होंने और इसके बाद वह चले गए। जाने से पहले मुझे याद है कि एक नज्म उन्होंने अपने लिए लिखी थी। वह उन्होंने मुझे सुनाई थी और मैंने उनसे उस नज्म को मांग लिया था। हालांकि मुझे आजतक कोई ऐसी कहानी नहीं मिली जहां मैं उसे फिट कर सकूं। वह नज्म है, 'मैं कोई बर्फ नहीं जो पिघल जाऊंगा, मैं कोई हर्फ नहीं जो बदल जाऊंगा, मैं तो जादू हूं चल जाऊंगा।'
खुद आनंद बख्शी की आवाज़ में ये नज़्म यहां सुन सकते हैं, उनके बेटे राकेश बख्शी ने डिजिटल दुनिया में आनंद बख्शी की तमाम यादों को सहेज रखा है।
दिलीप कुमार, अभिनेता
"हम लोगों ने जो वक्त जिंदगी में साथ गुजारा है बस इतना कहूंगा कि जहां महफिल में आनंद बख्शी साहब आए उस महफिल में बहार आ गई। उनके आते ही संगीत के झरने फूट निकलते थे। इन्होंने अपने गीत और संगीत के जरिए हमारी फिल्मों को हुस्न दिया है। यह ऐसी शख्सियत थे जो दुनिया में कभी-कभी जन्म लेती हैं। वैसे तो उन्होंने फौज में काम किया है लेकिन वह एक आशिक थे। हम भी उनसे मोहब्बत करते हैं।"
जावेद अख्तर, गीतकार
"हिंदुस्तान को गीतों का मुल्क कहा जाता है क्योंकि यहां हर भाषा में अलग अलग स्वाद के गीत होते हैं लेकिन मुझे लगता है कि अगर यह अनगिनत गीत न भी होते तो हिंदुस्तान को गीतों का मुल्क कहने के लिए अकेले आंनद बख्शी ही काफी थे। वह जज्बात का कौन सा मोड़ है, वह एहसास की कौन सी मंजिल है, वह धड़कनों की कौन सी रुत है, वह मोहब्बत का कौन सा मौसम है और वह जिंदगी का कौन सा मुकाम है, जहां सुरों के बादलों से आनंद बख्शी के गीत के चांद झलकते न हों। आज कोई माने या न माने लेकिन मैं अपने खून से लिख कर दे सकता हूं कि आज की शायरी और गीतों में आनंद बख्शी ने क्या जोड़ा है। जिस दिन लोग जानेंगे उस दिन उन पर थीसिस भी लिखी जाएंगी और लोग पीएचडी भी करेंगे।"
धर्मेंद्र, अभिनेता
"जब मुझे यह महसूस होता है कि आनंद बख्शी साहब के लिखे हुए गानों पर मैंने अभिनय किया है तो मुझे अपने आप पर फख्र महसूस होने लगता है। शायर तो बहुत हुए हैं लेकिन बख्शी साहब ऐसे शायर थे जो हर मूड में अपने आप को तुरंत ढाल लेते थे। प्यार से मैं उनको किंग कहता था। उनका एहसास कुछ इस तरह का था कि वह तुरंत अपने से लगने लगते थे। मैं उन्हें आज भी याद करता हूं। यकीन नहीं होता कि अब वह हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन, जब यह एहसास होता है तो एक झटका सा भी लगता है।"
