हर तरफ मौजूद तनाव के दौर में जिस एक किरदार को परदे पर देखते ही दर्शकों के चेहरों पर मुस्कुराहट तैर जाती है, वह हैं दीपक डोबरियाल। पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले दीपक ने हिंदी सिनेमा में बिना किसी गॉडफादर के नाम बनाया है, शोहरत कमाई है। दीपक से अमर उजाला की एक खास मुलाकात।
{"_id":"5e6c5dd98ebc3ea7c05b295d","slug":"angrezi-medium-actor-deepak-dobriyal-interview","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"खास मुलाकात में बोले दीपक डोबरियाल, 'काम वही करना चाहिए जिसमें रस मिलता हो'","category":{"title":"Bollywood","title_hn":"बॉलीवुड","slug":"bollywood"}}
खास मुलाकात में बोले दीपक डोबरियाल, 'काम वही करना चाहिए जिसमें रस मिलता हो'
Sat, 14 Mar 2020 10:01 AM IST
Avinash Pal
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
Published by: Avinash Pal
Updated Sat, 14 Mar 2020 10:01 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
दीपक डोबरियाल
- फोटो : सोशल मीडिया
दीपक डोबरियाल
- फोटो : सोशल मीडिया
रोजमर्रा की समस्याओं से परेशान लोगों को हंसाना कितनी बड़ी चुनौती होती है?
किसी का मूड बदलने के लिए उसका मूड समझना जरूरी है। हालांकि समय ऐसा है कि लोग हंसाने का बुरा भी मान जाते हैं। हंसना और हंसाना मेरी शख्सियत का हिस्सा है। ये हमारे साथ दिल्ली से चलकर यहां तक आया। हमने इसके लिए एक ग्रुप बनाया और हंसने के अभ्यास के अलग अलग तरीके खोजे। किसी की बेइज्जती हो जाए तो भी हंसते थे और किसी किसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने से चूक जाने पर भी हंसते थे। धीरे धीरे ये आदत मेरा हिस्सा बन चुकी है।
किसी का मूड बदलने के लिए उसका मूड समझना जरूरी है। हालांकि समय ऐसा है कि लोग हंसाने का बुरा भी मान जाते हैं। हंसना और हंसाना मेरी शख्सियत का हिस्सा है। ये हमारे साथ दिल्ली से चलकर यहां तक आया। हमने इसके लिए एक ग्रुप बनाया और हंसने के अभ्यास के अलग अलग तरीके खोजे। किसी की बेइज्जती हो जाए तो भी हंसते थे और किसी किसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने से चूक जाने पर भी हंसते थे। धीरे धीरे ये आदत मेरा हिस्सा बन चुकी है।
विज्ञापन
विज्ञापन
दीपक डोबरियाल
- फोटो : सोशल मीडिया
पिछले साल रिलीज हुई आपकी दोनों फिल्मों लाल कप्तान और बाबा दोनों में आपके संजीदा किरदारों की तारीफ हुई। आपको क्या ज्यादा अच्छा लगता है?
मुझे कॉमेडी से ज्यादा गंभीर किरदारों में मजा आता है। फिल्म बाबा मेरे दिल के बहुत करीब है। थिएटर में मैंने ये फिल्म दर्शकों के साथ देखी तो उनकी प्रतिक्रिया ने मुझे बहुत भावुक कर दिया। मराठी फिल्म है, सिर्फ महाराष्ट्र में रिलीज हुई इसलिए ज्यादा लोग इसे देख नहीं पाए। लेकिन मैं चाहता हूं कि पूरा देश इस फिल्म को देखे। लाल कप्तान का आपने जिक्र कर ही दिया। इनके अलावा ओमकारा और गुलाल के मेरे किरदार भी काफी अलग रंग के रहे हैं।
और, अब अंग्रेजी मीडियम।
अंग्रेजी मीडियम में मेरा किरदार एक हलवाई परिवार से ताल्लुक रखता है। उसका एक भाई है, जिसके साथ उसका प्यार और तकरार वाला रिश्ता है। इस भाई का किरदार इरफान कर रहे हैं। मैं जब भी उनसे मिलता हूं तो माहौल एकदम खुशमिजाज हो जाता है। वह बहुत वरिष्ठ हैं लेकिन फिर भी हमेशा साथियों जैसा व्यवहार करते हैं। वह कभी किसी बात का बुरा नहीं मानते।
मुझे कॉमेडी से ज्यादा गंभीर किरदारों में मजा आता है। फिल्म बाबा मेरे दिल के बहुत करीब है। थिएटर में मैंने ये फिल्म दर्शकों के साथ देखी तो उनकी प्रतिक्रिया ने मुझे बहुत भावुक कर दिया। मराठी फिल्म है, सिर्फ महाराष्ट्र में रिलीज हुई इसलिए ज्यादा लोग इसे देख नहीं पाए। लेकिन मैं चाहता हूं कि पूरा देश इस फिल्म को देखे। लाल कप्तान का आपने जिक्र कर ही दिया। इनके अलावा ओमकारा और गुलाल के मेरे किरदार भी काफी अलग रंग के रहे हैं।
और, अब अंग्रेजी मीडियम।
अंग्रेजी मीडियम में मेरा किरदार एक हलवाई परिवार से ताल्लुक रखता है। उसका एक भाई है, जिसके साथ उसका प्यार और तकरार वाला रिश्ता है। इस भाई का किरदार इरफान कर रहे हैं। मैं जब भी उनसे मिलता हूं तो माहौल एकदम खुशमिजाज हो जाता है। वह बहुत वरिष्ठ हैं लेकिन फिर भी हमेशा साथियों जैसा व्यवहार करते हैं। वह कभी किसी बात का बुरा नहीं मानते।
दीपक डोबरियाल
- फोटो : सोशल मीडिया
आपने कॉमेडी खूब कर ली, आपका संजीदा अंदाज भी लोगों ने देख लिया, कुछ ऐसा है जिसकी अभिनय में तलाश बाकी है?
दर्शकों ने अभी तक मेरा रोमांस नहीं देखा है। मैं समझता हूं कि मैं परदे पर रोमांस बहुत अच्छा कर सकता हूं। यह बात अलग है कि अभी तक मुझे इसका मौका नहीं मिला लेकिन मैं मौका तलाश रहा हूं। लेकिन, इसके लिए न तो मेरी तरफ से कोई हड़बड़ी है और न ही जल्दबाजी, मुझे सही मौके का इंतजार है। इसके अलावा मेजर ध्यानचंद की बायोपिक में टाइटल रोल करने की भी मेरी दिली तमन्ना है।
किसी भी गैरपरंपरागत क्षेत्र में करियर बनाने के लिए घरवालों का साथ कितना जरूरी है?
अभिनय में अपना करियर बनाने का रास्ता मैंने स्वेच्छा से चुना। घर पर मैं और मेरा भाई कभी कभार रामलीला में छोटे मोटे रोल कर लिया करते थे। थिएटर भी शौकिया ही शुरू हुआ। फिर मेरा मन अभिनय में रमने लगा तो पिताजी को यह उचित नहीं लगा। फिर मैंने पिताजी से बात की। उनको मनाया, मां से मदद ली और दोनों की रजामंदी से ही मुंबई आया। मेरा तो यही मानना है कि काम वही करना चाहिए जिसमें आपको रस मिलता हो।
दर्शकों ने अभी तक मेरा रोमांस नहीं देखा है। मैं समझता हूं कि मैं परदे पर रोमांस बहुत अच्छा कर सकता हूं। यह बात अलग है कि अभी तक मुझे इसका मौका नहीं मिला लेकिन मैं मौका तलाश रहा हूं। लेकिन, इसके लिए न तो मेरी तरफ से कोई हड़बड़ी है और न ही जल्दबाजी, मुझे सही मौके का इंतजार है। इसके अलावा मेजर ध्यानचंद की बायोपिक में टाइटल रोल करने की भी मेरी दिली तमन्ना है।
किसी भी गैरपरंपरागत क्षेत्र में करियर बनाने के लिए घरवालों का साथ कितना जरूरी है?
अभिनय में अपना करियर बनाने का रास्ता मैंने स्वेच्छा से चुना। घर पर मैं और मेरा भाई कभी कभार रामलीला में छोटे मोटे रोल कर लिया करते थे। थिएटर भी शौकिया ही शुरू हुआ। फिर मेरा मन अभिनय में रमने लगा तो पिताजी को यह उचित नहीं लगा। फिर मैंने पिताजी से बात की। उनको मनाया, मां से मदद ली और दोनों की रजामंदी से ही मुंबई आया। मेरा तो यही मानना है कि काम वही करना चाहिए जिसमें आपको रस मिलता हो।
विज्ञापन
दीपक डोबरियाल
- फोटो : सोशल मीडिया
अभिनय में रस मिलना आपको फिल्म ओमकारा से शुरू हुआ। ये फिल्म कैसे मिली आपको?
ये उन दिनों की बात है जब मेरा पूरा दिन बस ऑडिशन देते बीतता था। मेरा एक मित्र फिल्म ओमकारा के निर्देशक विशाल भारद्वाज का सहायक था। एक दिन उसका ऑडिशन के लिए फोन आया। जिस किरदार के लिए ऑडिशन हुआ उसके लिए ढाई सौ लोगों का मेरे पहुंचने से पहले ही ऑडिशन हो चुका था और उसमें से चार लोग अंतिम सूची में भी आ चुके थे। मैं तो बहुत घबराया हुआ था लेकिन मेरा ऑडिशन देखने के बाद मुझे उसी दिन ये फिल्म मिल गई।
'तनु वेड्स मनु' के पप्पी के बिना ये बातचीत पूरी नहीं हो सकती। दर्शकों को कहना रहा है कि उस फिल्म में आप मुख्य कलाकारों पर भारी पड़े।
नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। मैं ऐसा नहीं मानता। जब लोग कहते हैं कि आप मुख्य किरदारों पर भारी पड़ गए तो यह सब मैं दूसरी तरह से देखता हूं। मैं समझता हूं कि उस वक्त मैं उस किरदार के लिए ज्यादा भक्ति में था जिससे मैं दूसरे कलाकारों से ज्यादा अच्छा कर पाया। अभिनय में लगन का ही पूरा खेल है और उस वक्त मैं लगन में था। आप किसी की भक्ति को उससे छीन नहीं सकते।
ये उन दिनों की बात है जब मेरा पूरा दिन बस ऑडिशन देते बीतता था। मेरा एक मित्र फिल्म ओमकारा के निर्देशक विशाल भारद्वाज का सहायक था। एक दिन उसका ऑडिशन के लिए फोन आया। जिस किरदार के लिए ऑडिशन हुआ उसके लिए ढाई सौ लोगों का मेरे पहुंचने से पहले ही ऑडिशन हो चुका था और उसमें से चार लोग अंतिम सूची में भी आ चुके थे। मैं तो बहुत घबराया हुआ था लेकिन मेरा ऑडिशन देखने के बाद मुझे उसी दिन ये फिल्म मिल गई।
'तनु वेड्स मनु' के पप्पी के बिना ये बातचीत पूरी नहीं हो सकती। दर्शकों को कहना रहा है कि उस फिल्म में आप मुख्य कलाकारों पर भारी पड़े।
नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। मैं ऐसा नहीं मानता। जब लोग कहते हैं कि आप मुख्य किरदारों पर भारी पड़ गए तो यह सब मैं दूसरी तरह से देखता हूं। मैं समझता हूं कि उस वक्त मैं उस किरदार के लिए ज्यादा भक्ति में था जिससे मैं दूसरे कलाकारों से ज्यादा अच्छा कर पाया। अभिनय में लगन का ही पूरा खेल है और उस वक्त मैं लगन में था। आप किसी की भक्ति को उससे छीन नहीं सकते।
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें मनोरंजन समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। मनोरंजन जगत की अन्य खबरें जैसे बॉलीवुड न्यूज़, लाइव टीवी न्यूज़, लेटेस्ट हॉलीवुड न्यूज़ और मूवी रिव्यु आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
विज्ञापन
विज्ञापन