वैसे तो उत्तर प्रदेश के बहाराइच का नाम इन दिनों वहां आतंक मचाए आदमखोर भेड़ियों के चलते ही चर्चा में है, लेकिन इसी बहराइच के एक दुबले पतले लड़के ने कोई 10 साल पहले जिस अभिनय पथ पर कदम रखा, उस पर चलते हुए वह वहां तक आ पहुंचा है जहां, उसके नाम से लोग बहराइच को पहचानने लगे हैं। आत्म प्रकाश मिश्र नाम है इस बालक का और कैशोर्य में ही इसने तय कर लिया इसे डबलएटीएम से एटीएम बनकर दिखाना है, हालांकि अभिनय में पैसा उनकी प्राथमिकता कभी नहीं रहा। ‘अपना अड्डा’ सीरीज के आज के कलाकार आत्म प्रकाश मिश्र ही हैं, इन्हें अब तक आप ‘जामताड़ा’ और ‘क्रिमिनल जस्टिस’ जैसी लोकप्रिय वेब सीरीज में देख चुके हैं। आत्म प्रकाश की ये आत्मकथा उन्हीं की जुबानी...
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चाचा ने दिखाई जीवन की राह
बहराइच की पयागपुर तहसील के गांव कटेल, सरसा में जन्म के बाद से ही घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल मिला। पिताजी ऋषिकेश मिश्र वहीं के गांधी इंटर कॉलेज में हिंदी और संस्कृत पढ़ाते हैं। अध्यापकों के इस परिवार में मेरे चाचा शिवकेश मिश्र (इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार) ने अलग लीक पकड़ी और मुझे भी उन्होंने परिवार की पारंपरिक धारा से अलग किया। उनकी प्रेरणा से ही मैं भोपाल पहुंचा और मुझे वहां आलोक चटर्जी सर का सानिध्य मिला। अध्यापन वाले परिवार में एक युवक का अभिनय क्षेत्र में निकलना बहुत स्वागत योग्य तो नहीं रहा, लेकिन अब सबको सब समझ आ रहा है। मेरे माता-पिता ने मुझे इसके लिए कभी नहीं रोका। उनका समर्थन मुझे हमेशा ही मिला।
आलोक चटर्जी मेरे नाट्य गुरु
तो अभिनय की शुरुआत मेरी भोपाल मे स्नातक की पढ़ाई के साथ ही हुई। तीन साल आलोक चटर्जी सर के साथ काम किया। माखनलाल चतुर्वेदी का लिखा नाटक ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ रंगमंच पर मेरी पहली प्रस्तुति रही। इसमें मैंने गालव ऋषि के शिष्य शंख की भूमिका निभाई थी। डेढ़ साल पद्मश्री बंसी कौल की रेपेट्री कंपनी रंग विदूषक में भी काम किया। फिर मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय में प्रवेश मिला। यहां अभिनय की बारीकियां सीखने के बाद मुझे एक साल की इंटर्नशिप नाट्यविधा के प्रचार-प्रसार के लिए मिल गई। तो मैं बड़े चाव से नाटक सिखाने बहराइच लौट आया। लेकिन, नाटक शब्द आज भी गांव, देहात यहां तक कि जिला मुख्यालयों पर लोगों के लिए ‘एलियन’ है। बड़ी मुश्किलों और बाधाओं को पार करके बुद्ध पब्लिक स्कूल में बच्चों के साथ एक महीने वर्कशॉप की और इसी दौरान शरद जोशी का व्यंग्य ‘एक चुनाव उर्फ़ मुर्गाबीती’ का नाट्य रूपांतरण भी किया। इसका मंचन इन्ही बच्चों द्वारा किया गया। ये अनुभव अविस्मरणीय है मेरे लिए।
मुंबई मैं आया पढ़ाई करने
और फिर आया वो दिन जब मैंने मुंबई की धरती पर पहले कदम रखे। लेकिन, मेरी ये यात्रा भी अध्ययन के लिए ही थी। मुंबई यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा देने आया था। भोपाल में कॉलेज के दिनों के एक दोस्त समीर खान ने ठिकाना दिया। मेरा चयन हो गया तो फिर मैं परफॉर्मिंग आर्ट्स में एमए करने मुंबई आया। पूरा ध्यान पढ़ाई पर रखा और इस दौरान कहीं हाथ-पैर नहीं मारे। कोर्स पूरा होने के बाद मुंबई में जो पहला काम किया, वह था दानिश खंबाटा का ब्रॉडवे म्यूजिकल प्ले ‘गांधी द म्यूजिकल’।
‘जामताड़ा’ ने मेरा चेहरा फेमस कर दिया
इसके पहले मुझे लेखक-निर्देशक रूमी जाफरी की फिल्म ‘गली गली चोर है’ के लिए भोपाल में रहते हुए ही मौका मिल चुका था। अभिनेता अखिलेंद्र मिश्र के साथ मेरा दृश्य था और वन टेक में ही शॉट ओके हो गया। लेकिन, इसके बाद फिल्म की प्रोडक्शन टीम ने मुझे बुलाया ही नहीं। नियमित तौर से बात करें तो अनगिनत ऑडिशन के बाद मुझे ‘जामताड़ा’ में ही बड़ा मौका मिला। सीरीज की शूटिंग के कोई साल भर बाद जब इसका ट्रेलर आया और लोगों के मुझे फोन आने शुरू हुए तो मुझे बहुत अच्छा लगने लगा कि अब जाकर साधना पूरी हो रही है।
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