अर्जुन हिंगोरानी बॉलीवुड के मशहूर फिल्म डायरेक्टर थे, जिन्होंने अपने करियर में कई बड़ी हिट फिल्में बनाईं। धर्मेंद्र के साथ उनकी काफी गहरी दोस्ती थी। अर्जुन जब भी धर्मेंद्र को फिल्म का ऑफर करते वह तुरंत काम करने के लिए राजी हो जाते। यहां तक कि धर्मेंद्र अपने किरदार और कहानी के बारे में भी उनसे नहीं पूछा करते थे। इसके पीछे एक खास वजह थी जिसके कारण धर्मेंद्र कभी भी अर्जुन हिंगोरानी को इनकार नहीं कर सके।
अर्जुन हिंगोरानी पुण्यतिथि: एक ऐसा डायरेक्टर जिसकी वजह से धर्मेंद्र बने स्टार, 'क' अक्षर से था खास कनेक्शन
धर्मेंद्र हमेशा अपनी फिल्म में मौका देने के लिए अर्जुन के शुक्रगुजार रहे। उन्होंने अर्जुन के बारे में बात करते हुए एक बार कहा था कि वह इस एहसान को कभी नहीं चुका सकते लेकिन थोड़ी बहुत कोशिश करके अपने दिल को थोड़ा सुकून जरूर पहुंचा लेते हैं। दरअसल, यह उस समय की बात है जब लगातार संघर्ष करने के बाद धर्मेंद्र की हिम्मत टूटने लगी थी। तब अपनी पहली फिल्म में अर्जुन ने उन्हें साइन किया था। इस फिल्म का नाम 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' था। साल 1960 में आई इस फिल्म के बाद धर्मेंद्र ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अर्जुन की इस फिल्म से धर्मेंद्र के करियर का ग्राफ ऐसा ऊपर बढ़ा कि वह देखते ही देखते फिल्म इंडस्ट्री में स्टार बन गए।
अर्जुन हिंगोरानी भी फिल्म इंडस्ट्री में अभिनेता बनने के लिए ही आए थे। तब धर्मेंद्र भी फिल्मों में काम की तलाश के लिए पंजाब से मुंबई पहुंचे थे। दोनों अक्सर किसी न किसी प्रोड्यूसर के ऑफिस के बाहर टकरा जाया करते थे। इसके बाद धीरे-धीरे दोनों के बीच जान पहचान बढ़ने लगी और बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। एक दिन जब अर्जुन धर्मेंद्र से मिले तब उन्होंने कहा कि वह एक्टिंग छोड़कर निर्देशन में हाथ आजमाने की सोच रहे हैं। उन्होंने वादा किया कि जब भी वह फिल्म बनाएंगे धर्मेंद्र ही उनके हीरो होंगे। इसके बाद जल्द ही उन्होंने 51 रुपये का साइनिंग अमाउंट देकर धर्मेंद्र को अपनी फिल्म में साइन किया।
वह फिल्म इंडस्ट्री में कई दशकों तक सक्रिय रहे। अपने फिल्मी करियर में उन्होंने धर्मेन्द्र को लेकर साल 1970 में 'कब क्यूं और कहां, 1973 में कहानी किस्मत की, 1977 में खेल खिलाड़ी का, 1981 में कातिलों के कातिल और 1991 में कौन करे कुर्बानी बनाई। फिल्मों के नाम को लेकर वह काफी ज्यादा सावधानी बरतते थे। उनकी फिल्मों में ट्रिपल 'के' जरूर आया करता था। उनका मानना था कि इससे उनकी फिल्में अच्छा प्रदर्शन करती हैं। उनका अंतिम समय यूपी के वृंदावन में गुजरा। साल 2018 में 92 साल की उम्र में यहीं पर उन्होंने अंतिम सांस ली।
