लॉकडाउन के बीच हम न सिर्फ आप सभी तक खबरें पहुंचा रहा हैं बल्कि इसके साथ ही साथ आपके मनोरंजन का भी ध्यान रख रहे हैं। चूंकि सिनेमा ठप है और कोई भी नई फिल्म या टीवी शो की शूटिंग नहीं हो सकती है, ऐसे में हम आपको सिनेमा के अलग अलग पहलू से रूबरू करवा रहे हैं। हाल ही में हमने आपको 40 से 60 तक के दशक के चुनिंदा बेहतरीन डायलॉग्स बताए थे, ऐसे में अब इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आपको 60 से 90 तक के दशक के कुछ शानदार डायलॉग्स बताते हैं।
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'जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए', पढ़िए ऐसे ही 25 बेहतरीन डायलॉग्स
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: Avinash Pal
Updated Fri, 08 May 2020 07:27 AM IST
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बॉलीवुड फिल्मों के डायलॉग्स
- फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
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शहंशाह में अमिताभ बच्चन
- फोटो : सोशल मीडिया
डॉन (1978)
अमिताभ बच्चन: डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
शहंशाह (1988)
अमिताभ बच्चन: रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप होते हैं नाम है शहंशाह।
वक्त (1965)
(जब राजकुमार को उनका बॉस चिनॉय सेठ (मदन पुरी) धमकी देता है तो राजकुमार उससे कहते हैं।)
राजकुमार:चिनॉय सेठ, जिनके घर शीशे के बने होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते।
अमिताभ बच्चन: डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
शहंशाह (1988)
अमिताभ बच्चन: रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप होते हैं नाम है शहंशाह।
वक्त (1965)
(जब राजकुमार को उनका बॉस चिनॉय सेठ (मदन पुरी) धमकी देता है तो राजकुमार उससे कहते हैं।)
राजकुमार:चिनॉय सेठ, जिनके घर शीशे के बने होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते।
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मेरा नाम जोकर
मेरा नाम जोकर (1970)
राजू (राज कपूर) ने पद्मिनी की कला को मांजा है लेकिन जब पद्मिनी को फिल्मों में काम मिलने लगा है तो वो राजू को अनदेखा करती है। ट्रेन में राजू खिड़की के सामने खड़ा है।
पद्मिनी: अंधेरे में क्या देख रहे हो
राजू (राज कपूर): स्टेज की चकाचौंध से बाहर आने पर अंधेरे में साफ दिखाई देता है।
मेरा नाम जोकर (1970)
(राजेंद्र कुमार निर्माता हैं और वो राज कपूर से बात कर रहे हैं।)
राजेंद्र कुमार: क्या तुम मीनू (पद्मिनी) से प्यार करते हो।
राज कपूर- सवाल ये नहीं, सवाल ये होना चाहिए कि क्या मैं प्रेम करता हूँ...जवाब है कि मैं नदी, पहाड़, फूल, पत्थरों सबसे प्यार करता हूँ।
राजेंद्र कुमार- क्या इन सब में मीना नाम की लड़की भी है।
राज कपूर- आप बेफिक्र रहें, मैं रास्ते में नहीं आऊँगा।
राजू (राज कपूर) ने पद्मिनी की कला को मांजा है लेकिन जब पद्मिनी को फिल्मों में काम मिलने लगा है तो वो राजू को अनदेखा करती है। ट्रेन में राजू खिड़की के सामने खड़ा है।
पद्मिनी: अंधेरे में क्या देख रहे हो
राजू (राज कपूर): स्टेज की चकाचौंध से बाहर आने पर अंधेरे में साफ दिखाई देता है।
मेरा नाम जोकर (1970)
(राजेंद्र कुमार निर्माता हैं और वो राज कपूर से बात कर रहे हैं।)
राजेंद्र कुमार: क्या तुम मीनू (पद्मिनी) से प्यार करते हो।
राज कपूर- सवाल ये नहीं, सवाल ये होना चाहिए कि क्या मैं प्रेम करता हूँ...जवाब है कि मैं नदी, पहाड़, फूल, पत्थरों सबसे प्यार करता हूँ।
राजेंद्र कुमार- क्या इन सब में मीना नाम की लड़की भी है।
राज कपूर- आप बेफिक्र रहें, मैं रास्ते में नहीं आऊँगा।
आनंद फिल्म
- फोटो : Social Media
आनंद (1971)
(आनंद यानी राजेश खन्ना को कैंसर है जबकि बाबूमोशाय यानी अमिताभ बच्चन डॉक्टर हैं।)
राजेश खन्ना: बाबू मोशाय.. ज़िंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ में है जहाँपनाह। उसे न आप बदल सकते हैं न मैं। हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं जिनकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों में बंधी है। कब कौन कैसे उठेगा ये कोई नहीं बता सकता है।
आनंद (1971)
अमिताभ बच्चन: मौत तू एक कविता है। मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको। डूबती नब्जों में जब दर्द को नींद आने लगे, जर्द सा चेहरा लिए चांद उफक तक पहुंचे। दिन अभी पानी में हो रात किनारे पर, न अंधेरा ना उजाला हो। न अभी रात न दिन, जिस्म जब खत्म हो और रूह को जब साँस आए...मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको।
आनंद (1971)
राजेश खन्ना: बाबू मोशाय जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए
(आनंद यानी राजेश खन्ना को कैंसर है जबकि बाबूमोशाय यानी अमिताभ बच्चन डॉक्टर हैं।)
राजेश खन्ना: बाबू मोशाय.. ज़िंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ में है जहाँपनाह। उसे न आप बदल सकते हैं न मैं। हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं जिनकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों में बंधी है। कब कौन कैसे उठेगा ये कोई नहीं बता सकता है।
आनंद (1971)
अमिताभ बच्चन: मौत तू एक कविता है। मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको। डूबती नब्जों में जब दर्द को नींद आने लगे, जर्द सा चेहरा लिए चांद उफक तक पहुंचे। दिन अभी पानी में हो रात किनारे पर, न अंधेरा ना उजाला हो। न अभी रात न दिन, जिस्म जब खत्म हो और रूह को जब साँस आए...मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको।
आनंद (1971)
राजेश खन्ना: बाबू मोशाय जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए
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पाकीजा
- फोटो : Twitter
पाकीजा (1972)
(राजकुमार, रेलगाड़ी में सोई हुई मीना कुमारी के पैर देखते हैं और एक खत उनके नाम छोड़ जाते है। जिसमें लिखा होता है।)
राजकुमार: आपके पैर बहुत खूबसूरत हैं। इन्हें जमीन पर मत रखिए। ये मैले हो जाएंगे।
बॉबी(1973)
प्रेम चोपड़ा: प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा।
बदला (1974)
ये एक एक्शन फिल्म है, जिसमें शत्रुघ्न सिन्हा भीड़ को कहते हैं, 'खामोश'। आज भी शत्रुघ्न वही डायलॉग दोहराते रहते हैं।
(राजकुमार, रेलगाड़ी में सोई हुई मीना कुमारी के पैर देखते हैं और एक खत उनके नाम छोड़ जाते है। जिसमें लिखा होता है।)
राजकुमार: आपके पैर बहुत खूबसूरत हैं। इन्हें जमीन पर मत रखिए। ये मैले हो जाएंगे।
बॉबी(1973)
प्रेम चोपड़ा: प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा।
बदला (1974)
ये एक एक्शन फिल्म है, जिसमें शत्रुघ्न सिन्हा भीड़ को कहते हैं, 'खामोश'। आज भी शत्रुघ्न वही डायलॉग दोहराते रहते हैं।

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