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कभी अमीरी के लिए मशहूर हुआ करते थे भगवान दादा, बाद में तंगी के चलते बेचना पड़ा था बंगला

Mon, 02 Aug 2021 09:10 AM IST
स्वाति सिंह एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: स्वाति सिंह Updated Mon, 02 Aug 2021 09:10 AM IST
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Bhagwan Dada here things you didnt know about Bhagwan Dada India first action and dancing star
भगवान दादा

हिंदी सिनेमा के मशहूर अभिनेता और निर्देशक भगवान दादा का असली नाम भगवान अबाजी पांडव था। खुद भगवान दादा ने भी फिल्मों में आने से पहले मजदूरी तक की थी। उन्होंने मूक सिनेमा के दौर में फिल्म 'क्रिमिनल' से डेब्यू किया। भगवान दादा कॉमेडी के बेताज बादशाह थे। केवल फिल्मों में ही नहीं बल्कि वो असल जिंदगी में भी एकदम मस्त मौला किस्म के इंसान थे। अभिनय के बाद उन्होंने फिल्म निर्देशन में भी आजमाया। साल 1951 में उन्होंने फिल्म 'अलबेला' का निर्माण किया। इस फिल्म के गीत 'शोला जो भड़के' और 'भोली सूरत दिल के खोटे' आज भी याद किए जाते हैं। इसमें उनके अपोजिट गीता बाली लीड रोल में थीं। 



भगवान दादा की पहली बोलती फिल्म 'हिम्मत-ए-मर्दा (1934) थी। फिल्म में मुख्य भूमिका में ललिता पवार थीं। भगवान दादा शेवरले कारों के इतने शौकीन थे। कहा जाता है कि यही कारण है कि उन्होंने 'शेवरले' नाम की फिल्म में भी काम किया था। कभी आर्थिक तंगी से जूझने वाले भगवान दादा ने कमाई के खूब झंडे गाड़े थे। एक वक्त ऐसा भी आया जब उनके पास सात कारें तक थीं। वह हर दिन सेट पर एक नई कार से जाते थे। 

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भगवान दादा

उनके डायरेक्शन की एक फिल्म के एक सीन में पैसों की बारिश दिखानी थी इसके लिए उन्होंने असली नोटों का इस्तेमाल किया था। फिल्म के प्रोड्यूसर भगवान दादा खुद थे। भगवान दादा हॉलीवुड फिल्म एक्टर डगलस फेयरबैंक्स के बहुत बड़े प्रशंसक थे। डगलस से प्रेरित होकर भगवान दादा अपनी फिल्मों में बॉडी डबल के बजाय अपना स्टंट खुद करते थे। उनके द्वारा किए गए स्टंट इतने असली लगते थे कि राज कपूर तो उन्हें इंडियन डगलस कहकर पुकारते थे।

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भगवान दादा

बाद में एक वक्त ऐसा आया जब भगवान दादा की फिल्में कुछ कमाल नहीं कर पा रही थीं। फिल्मों से उन्हें इतना नुकसान उठाना पड़ा कि उन्हें जुहू स्थित बंगला और अपनी कारें बेचनी पड़ीं। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि उन्हें मुंबई के चॉल में गुजारा करना पड़ा। कहा जाता है कि भगवान दादा से एक बार पूछा गया था कि उन्हें अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा खुशी कब होती है या हुई है? इस सवाल के जवाब में भगवान दादा ने एकदम मस्त मौला अंदाज में जवाब दिया। भगवान दादा ने जवाब में कहा, 'मुझे सबसे ज्यादा खुशी उस वक्त होती है जिस वक्त कोई विलेन फिल्म में किसी हीरोइन की इज्जत लूटने की कोशिश करता है। और वो चिल्लाती है "छोड़ो मुझे, छोड़ो मुझे, भगवान के लिए मुझे छोड़ दो।" जब मैं ये सुनता हूं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है।'

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भगवान दादा

ललिता पवार की बॉयोग्राफी ‘द मिसिंग स्टोरी ऑफ ललिता पवार’ में भगवान दादा से जुड़ा एक किस्सा साझा किया है।  साल 1942 में ललिता फिल्म 'जंग-ए-आजादी' के एक सीन की शूटिंग कर रही थीं। इस सीन में एक्टर भगवान दादा को ललिता को थप्पड़ मारना था। उन्होंने ललिता को इतनी जोर से थप्पड़ मारा कि वह जमीन पर गिर गईं और उनके कान से खून बहने लगा। जिसके बाद वह लंबे समय के लिए अस्पताल में भर्ती रही थीं। इतना ही नहीं उनकी दाहिनी आंख इस कारण से छोटी हो गई थी।  इसके बाद से ही ललिता ने निगेटिव रोल करना शुरू किया था। हालांकि भगवान दादा को इस हादसे का ताउम्र अफसोस रहा था। 

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भगवान दादा
भगवान दादा के आखिरी वक्त में ज्यादातर लोगों ने उनका साथ छोड़ दिया। केवल संगीतकार सी रामचंद्र, एक्टर ओम प्रकाश और गीतकार राजेंद्र कृष्ण उनके साथ रहे और उनसे मिलने के लिए चॉल में जाते थे। 4 फरवरी 2002 को हार्ट अटैक से भगवान दादा का निधन हो गया। 
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