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Bioscope S2: सलीम-जावेद को फिल्मों में पूरे हुए 50 साल, इस फिल्म में दोनों को मिला पहला ‘अधिकार’

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Wed, 28 Apr 2021 01:49 PM IST
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Bioscope with Pankaj Shukla Adhikar Salim Javed Ashok Kumar S M Sagar Sarhadi Lutera Ashok Kumar
अधिकार - फोटो : अमर उजाला

सिनेमा बनाने की सबसे पहली सीढ़ी होती है, एक अदद कहानी। फिर उस पर लिखी जाती है पटकथा यानी जो कुछ परदे पर दिखने वाला है, उसकी एक एक इबारत। और, फिर इसके बाद आते हैं संवाद, इन्हें बोलने वाले सितारे। इन्हें इन दृश्यों व संवादों के हिसाब से नचाने वाले निर्देशक। गाने बनाने वाले गीतकार और संगीतकार। लेकिन, हिंदी सिनेमा में आज भी सबसे निरीह प्राणी अगर कोई है तो वह इसका लेखक ही है। किसी कहानी या कार्यक्रम का मूल विचार सुनते ही उस पर बिना ओरीजनल लेखक से बात किए फिल्म या शो बना देना यहां की फितरत है। ये भी सच है कि इस बेईमानी से काम करने वाले फिल्म निर्माताओं या निर्देशकों का आखिरी समय बहुत बुरा गुजरा लेकिन सूरज जब चढ़ रहा होता है तो इनको हर कोई सलाम कर रहा होता है, बस कभी कभी सलीम-जावेद जैसे लोग भी आ जाते हैं जो सिनेमा अपनी शर्तों पर लिखते हैं। पोस्टरों पर अपने खर्चे पर अपने नाम लिखवा लेते हैं और जताते हैं सिनेमा की हर रील पर अपना ‘अधिकार’। जी हां, सलीम-जावेद के नाम का डंका भले हिंदी सिनेमा में फिल्म ‘जंजीर’ से बजा हो, लेकिन दोनों की साथ लिखी पहली फिल्म ‘अधिकार’ है हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म।

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फिल्म अधिकार का पोस्टर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

जोड़ी जादू और गुल्लू की
बाइस्कोप में आज जिस फिल्म के बारे में हम बात करने जा रहे हैं, उसका सिलसिला हिंदी सिनेमा के दो नौजवानों की पहली बार बनी जोड़ी के किस्से से जुड़ता है। फिल्म है आज ही के दिन यानी 28 अप्रैल को साल 1971 में रिलीज हुई फिल्म ‘अधिकार’, जिसके सितारे हैं, अशोक कुमार, देब मुखर्जी, नंदा, हेलेन और प्राण। हेलेन से इसी फिल्म के दौरान सलीम खान की पहली मुलाकात हुई। तब सलीम खान को लोग गुल्लू कहकर बुलाते थे। यही उनका प्यार से बुलाए जाने वाला नाम था। और, जावेद अख्तर के बारे में तो आप लोग जानते ही हैं। उनका नाम बचपन में घर वालों ने जादू रखा था। शबाना आजमी अब भी उन्हें प्यार से जादू ही कहकर बुलाती हैं।

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फिल्म अधिकार का पोस्टर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

12 दिन में लिख दी पहली पटकथा
खैर, हम तो बात कर रहे थे साल 1971 में रिलीज हुई अधिकार की। इस फिल्म की पटकथा आर एस वर्मा की लिखी एक छोटी सी कहानी सुनने के बाद इसके लेखकों ने सिर्फ 12 दिन में रच डाली थी। फिल्म में इसके लेखकों का नाम भी नहीं गया लेकिन ये पहली फिल्म है जिसे गुल्लू यानी सलीम खान और जादू यानी जावेद अख्तर ने मिलकर एक साथ लिखा। यानी कि आप कह सकते हैं कि सलीम-जावेद की एक साथ लिखी ये पहली फिल्म रही। फिल्म देखेंगे तो इसमें कहीं आपको सलीम जावेद का नाम नहीं मिलेगा। हिंदी सिनेमा में घोस्ट राइटिंग की परंपरा शुरू से ही चलती रही है, लिखता कोई और है नाम किसी और का होता है। मुंबई के शायर ओबैद आजम आजमी मुशायरों के दौरान दोस्तों से जो कुछ कहते हैं, उस पर यकीन करें तो ये सिलसिला बदस्तूर आज भी जारी है। फिल्म ‘अधिकार’ में जावेद अख्तर और सलीम खान ने घोस्ट राइटिंग से अपना करियर शुरू किया था।

Bioscope with Pankaj Shukla Adhikar Salim Javed Ashok Kumar S M Sagar Sarhadi Lutera Ashok Kumar
फिल्म के एक दृश्य में तबस्सुम और ब्रह्मचारी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

बंबई में मुसीबत के दिन
अब आपको बताते हैं वो किस्सा कि आखिर फिल्म ‘अधिकार’ के लिए सलीम और जावेद की जोड़ी बनी कैसे। जैसा कि आप जानते ही होंगे कि जावेद अख्तर के पिता जां निसार अख्तर भी देश के नामचीन शायर रहे हैं। गुरुदत्त के साथ रहकर सिनेमा सीखने का सपना लिए जावेद अख्तर जब बंबई पहुंचे थे, उन दिनों जां निसार अख्तर का कम्युनिस्ट होना उनकी परेशानी बन चुका था। और, उनके खिलाफ दायर तमाम मामलों की वजह से लगातार पुलिस उनके पीछे लगी रहती थी। जावेद अख्तर कुछ दिन रहे अपने वालिद के यहां लेकिन कहते हैं कि अपनी सौतेली मां से उनकी बनी नहीं और एक दिन वह यूं ही बिना बताए घर से निकल लिए।

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सलीम-जावेद - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

गोदाम में बीते संघर्ष के दिन
निर्माता निर्देशक कमाल अमरोही के यहां जावेद अख्तर को बंबई में पहली नौकरी मिली। रहने को कोई जगह थी नहीं तो वह वहीं कमालिस्तान स्टूडियो के गोदाम में सो जाया करते थे। गिनती के तीन जोड़ी कपड़े थे और उन्हीं को अदल बदल कर वह पहना करते। कई बार तो वहीं लॉन्ड्री की दुकान पर भी उन्होंने खड़े खड़े अपने कपड़े बदल लिए। कमाल अमरोही की गोदाम में उन्हें फिल्मफेयर की वो ट्रॉफियां भी पड़ी मिलीं जो मीना कुमारी को उनके बेहतरीन अभिनय के लिए दी गईं थी। गुरबत के दिनों में जावेद को उन ट्रॉफियों से बड़ा हौसला मिलता और वह उन्हें सीने से लगाकर फर्श पर सोया करते। कहते हैं कि इन ट्रॉफियों को हाथ में लेकर जावेद तमाम तरह की तकरीरें भी किया करते थे, जाहिर सी बात है कि ये तकरीरें बाद में कई बार जावेद अख्तर को फिल्मफेयर के मंच पर असली तकरीरें देने के काम आईं।

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